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बाबा रामपाल की काली दुनिया का सच--Pressvarta

 

RAMPAL

 

रामपाल ने ये भीड़ कैसे जुटाई। ये कौन लोग हैं जो रामपाल के लिए मरने मारने पर उतारू हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि रामपाल नाम के जिस इंजीनियर ने जिंदगी में कभी सड़क का पुल नहीं बनाया वो आत्मा और भगवान के बीच का पुल का ठेकेदार कैसे बन बैठा?
आठ साल पहले लेकर चलते हैं आपको। उसके पास तहखाना भी था। यही वो भेद है, जिसमें घुसकर रामपाल को भगवान का चोला ओढ़ रखा था। रोहतक के सतलोक आश्रम का सच दहला देने वाला है। यह सतलोक नहीं है। रामपाल का मायालोक है। इस मायालोक में विज्ञान के अविष्कारों से उसने फरेब का एक ऐसा आभामंडल तैयार किया था, जिसने बर्खास्त जूनियर इंजीनियर रामपाल को बाबागीरी का उस्ताद बना दिया।
इस मायालोक में एक सिंहासन था। वहां से रामपाल अपने भक्तों को दर्शन दिया करता था। इसके चारों तरफ बुलेट प्रूफ शीशा लगा हुआ होता था। किसी को पता नहीं चलता था कि रामपाल इसके भीतर कैसे पहुंचता है। वो नीचे से कहीं से निकलता था। यही नहीं, जब यहां का प्रवचन खत्म हो जाता था तो बिना बाहर निकले वो दूसरी तरफ हाजिर हो जाता था।
यहां भी वो नीचे से ऊपर की ओर निकलता था। लोग ताज्जुब में कि बाबा एक ही जगह में दो जगह कैसे। इसका राज था ये तहखाना। इसी तहखाने से रामपाल दौड़कर दूसरी तरफ भागता था। और इसे एक चमत्कार में बदलने के लिए उसने अपनी सारी इंजीनियरिंग भिड़ा दी थी। ये सिंहासन दरअसल एक हाईड्रोलिक मशीन पर टंगा हुआ होता था।
इस सिंहासन के हत्थे में ही बटन लगे होते थे। बटन दबाते ही बाबा तहखाने से सीधे प्रवचन के डिब्बे में पहुंच जाता था। और प्रवचन खत्म तो बटन दबाया सिंहासन नीचे। अब नीचे ही नीजे बनी हुई थी एक सुरंग। इस सुरंग से रामपाल दूसरे हिस्से में भागता। ये सुरंग सिर्फ रामपाल के फरेब के काम में आती थी।
सुरंग के रास्ते रामपाल एक हिस्से से दूसरे हिस्से में पहुंच जाता। वहां भी बिल्कुल उसी तरह का सिंहासन। हाइड्रोलिक मशीन पर टंगा हुआ। बटन दबाते ही सिंहासन ऊपर की ओर चल पड़ता। जहां रामपाल के भक्त उसका इंतजार कर रहे होते। रामपाल बिना दिखे या चले हुए ऐसे निकलता जैसे जमीन फाड़कर निकला हो। लोगों की आंखें फटी की फटी रह जातीं। उन्हें लगता कि ये तो सचमुच में चमत्कार है। और बाबा भगवान का अवतार है।
2000 से 2006 तक रामपाल करौंथा में रोज ये कलाकारी दिखाता रहा। दूर-दूर तक उसने अपने इस ढकोसले को चमत्कार की तरह बेचा। वो तो एक दिन आश्रम से गोली चली। एक नौजवान की मौत हुई और पुलिस आश्रम में घुस गई। तब जाकर पता चला रामपाल ने अपनी बाबागीरी का बढिय़ा बाज़ार सजा रखा है।
ये उस जमाने की बात है जब रामपाल गोलीकांड में अपने 37 गुर्गों के साथ गिरफ्तार हो गया था। तब रामपाल इतना बड़ा नहीं हुआ था। ये कितनी अजीब बात है कि जिस रामपाल की पोल पट्टी 8 साल पहले खुल चुकी थी वो रामपाल जब दो साल बाद जेल से निकला तो भक्ति की चादर ओढ़कर फिर से घी पीने लगा। अगर भक्तो की दुनिया ने उसके फरेब की तरफ से आंखें नहीं बंद की होती तो एक भयानक विश्वासघात से हम अपनी दुनिया को बचा लेते।(प्रैसवार्ता)

 

 

 

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