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"हे! परम अज्ञात,यदि तू है तो..."संजय कुमार शर्मा

 

 

 

"कभी राम सम रख मर्यादा, पुरुषोत्तम व्यवहार,
कभी लगे मैं नटखट कृष्ण-कन्हैया का अवतार,

 

 

कभी जनार्दन जगत तारता, अवतारों में मैं ढल कर,
कभी ध्वंस-विध्वंस-प्रलय का विष पीता मैं शिव बन कर,

 

 

मेरी शक्ति दुर्गा माता बन, असुरों का वध करती है,
सावित्री-अनुसूईया-सीता बन, जग का ऋण भरती है,

 

 

कभी कान्त का प्रेम बटोरुँ, राधा और मीरा बन कर,
कभी कालिका-चंडी पी लूँ दैत्य लहू, रण में तन कर,

 

 

कभी जगद्कल्याणी गायत्री, जीवन का मंत्र बनूँ,
आदिशक्ति कामाख्या माया, तंत्र-मंत्र और यंत्र बनूँ,

 

 

हे परम अज्ञात यदि तू है तो मेरी नियति लिख।।"

 

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