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अंक: मार्च 2018   


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दिल्ली की आत्मकथा----डॉ० श्रीमती तारा सिंह

 

 

भारत का दिल कही जाने वाली दिल्ली की आत्मकथा भला किसे नहीं सुनना पसंद आयगा । दिल्ली कहती है,’मेरा जन्म प्रागैतिहासिक काल में हुआ । जब-जब देश का शासक चाहा, तब-तब मेरा नाम बदला । अभी का दिल्ली नाम मेरा नौवां है । समय और युग के अनुकूल मेरा रंग –रूप भी बिगड़ा और संवरा । अतुल बलशाली पाण्डवों और कौरवों के महान संघर्ष में मैंने भी भाग लिया । मैं अनेकों मामले में अतिभाग्यशालिनी हूँ । जानते हैं, भगवान श्रीकृष्ण पांचजन्य शंख का उद्घोष यहीं से किये थे ,और कौरवों से विजयी होकर ,राजा युधिष्ठिर यहीं राजसूय यग्य किये थे; उस समय मेरा नाम इन्द्रप्रस्थ था । यह नाम पाण्डवों ने मेरी सुंदरता के आधार पर रखा था । सुना है, उस समय मुझसी सुंदर दुनिया में और कोई दूसरी नहीं थी; अकेली मैं ही थी ।
समय-समय पर हिमालय की तराई से होकर अनेक प्रकार की जातियों के लोग मेरे पास रहने आये, और यहीं का होकर रह गये । कुछ तो मुझे लूटने के ख्याल से भी आये और जाते-जाते मेरे रेशमी वस्त्र व लाल कारपेट अपने साथ लेकर चले गये । बाबर ने तो मेरी छाती पर ही अपना अधिकार जमा लिया । गांधार देश की प्राकृतिक उपत्यकाओं से उतरकर आक्रमणकरी जब तक पंचनद प्रदेश की उर्वर भूमि में प्रवेश करते रहे हैं । यहाँ की अथाह रत्न-राशि को लेने के लिए अपनी जान की बाजी भी लगाते रहे हैं । इस कोष की द्वार रक्षिका मैं ही हूँ । शायद इसीलिए मुझे देहली (चौखट ) भी कहा जाता है ।
अपने जीवन काल में जितना उत्थान - पतन,सुख और दुख, ऐश्वर्य और दीनता मैंने देखा, शायद और किसी ने नहीं देखा होगा । सर्वप्रथम पाण्डवों ने अपने हाथों पाल-पोषकर मुझे बड़ा किया ; बाद उन्हीं के हाथों मेरा शृंगार भी हुआ । देश-देशांतर के बड़े-बड़े शिल्पी मुझे सजाने और संवारने आये । मुझे सजाने और सुंदर बनाने के प्रयास में अपनी कला को चरम सीमा तक पजुँचाये । मैं स्वर्ग –परी सी दीखने लगी । मैं आज भी सुंदर हूँ, लेकिन भ्रष्ट नेताओं के मैले हाथ ,मेरे गोरे अंग को मैला कर दिया है । इस बात का मुझे बहुत दुख है, मैं अपने स्वर्णकाल को यादकर बहुत रोती हूँ । रोते-रोते मेरी सेहत भी खराब हो गई है, अब पहले सी मैं नहीं रही । मेरी सुंदरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है, कि मुझसे इन्द्रपुरी को भी जलन होने लगी थी । समय ने पलटा खाया और धर्मराज युढिष्ठिर के साथ मेरी तकदीर पलट गई । विधि का विधान कहिये, या काल-चक्र की क्रूरता; दो भाइयों के बीच इतनी शत्रुता बढ़ी कि आर्यावर्त की पवित्र भूमि ,(वीरों के ) लहू से लथपथ हो गई । आज भी कुरुक्षेत्र पुराने दुर्ग के रूप में खड़ा, इस बात की गवाही दे रहा है ।
इसके बाद तो मुझे लूट ले जाने वालों का तांता लग गया । शंक,हुण, कुशान जातियों की बर्बरता को याद कर, मेरे रगों में बहने वाला लहू आज भी काँपकर जम जाता है । आँखों से मजबूरी और गुस्से के आँसू निकल आते हैं । इसके बाद चौहान राजाओं की मैं राजधानी बनी । आज भी यमुना-स्तम्भ चौहान राजाओं की निशानी बनकर खड़ा है । पृथ्वीराज ने मुहम्मद गोरी को एक दो बार नहीं, बल्कि सत्रह बार पराजित किये । अगर जयचंद (पृथ्वीराज चौहान का मौसेरा भाई ),आक्रमणकारी का साथ नहीं दिया होता, तो मजाल नहीं था मुहम्मद गोरी का,कि वह मुझे बंदी बना पाता । आखिर में गुलाम वंश के लोग बादशाह बने, पाठानों की स्वेच्छाचारिता, निरंकुशता का नग्न रूप में भी मैंने देखा है । तैमूर और नादिरशाह द्वारा किये गये कत्लेआम में खून की नदियाँ मेरे सीने पर से बहीं; तत्पश्चात मुगल शासकों का यहाँ राज्य शुरू हुआ । बाबर आया; पीढ़ी दर पीढ़ी यहाँ राज किया । मुझे जैसे चाहा,वैसे लूटा, यातनाएँ दी ; मेरे साथ बड़ी घिनौनी बदसलूकियाँ हुईं । फ़िर, उसका बेटा हुमायुँ, बाद अकबर; उसके बाद चौथी पीढ़ी शाहजहाँ और फ़िर औरंगजेब । शाहजहाँ की आकांक्षाओं का साकार रूप लाल किला आज भी मुगलिया शान का प्रतीक बनकर खड़ा है । शाहजहाँ कितना कलाप्रिय था, इसका प्रमाण दीवाने-आम और दीवाने-खास को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है ।
अंग्रेजों के आने से पहले, मुगलों का अंतिम सम्राट बहादुरशाह ज़फ़र था । उसके शासन काल में एक और नई जाति इस देश में आई ,जो कि सुदूर युरोप से आई थी । मैं न चाहती हुई भी ,इनका स्वागत की । धीरे-धीरे वे झूठे हितैषी,मेरी चापलूसी करते-करते, मेरे करीब आ गये और मैं उनकी इस चाल में कुछ जाने,कुछ अनजाने फ़ंसती चली गई , एक दिन उसने मुझे बंदी बना लिया । उन्होंने मेरी छाती पर अनेकों उँची-उँची इमारतें बनबाई ; रायसीना ,इसका प्रमाण स्वरूप आज भी है ।
बाद यहाँ अंग्रेज आये । उनके आने के बाद मेरे पोशाक बदलने लगे । धीरे-धीरे मुझे पाश्चात्य पोशाकों को पहनने की आदत डाल दी गई । मेरे पुराने पहचान भी बदल गये । अब मैं नई दिल्ली कहलाने लगी,बावजूद गुलामी का एहसास,मुझे दुखी बनाये रखता था । हजारों साल तक कराहने के बाद ईश्वर ने मेरी पुकार सुनी और पन्द्रह अगस्त 1947 को मुझे सब दुखों से फ़ुर्सत मिली । मैं आज़ाद हिन्द की राजधानी दिल्ली बन गई । मैं अपनी खुशी का वर्णन शब्दों में नहीं कर सकती । जब हमारे ,प्रथम प्रधानमंत्री, जवाहर लाल नेहरू ने लाल किले पर जाकर तिरंगा फ़हराया । हजारों, लाखों, खुशियों के दीये से मेरा आँगन जगमगा उठा । मानो दीवाली हो; लोग मेरी सुंदरता को देखने फ़िर एक बार दूर-दूर से आने लगे । लेकिन इस बार, कोई फ़िरंगी ,या लुटेरा नहीं था, बल्कि मेरे अपने भाई- बहन, दोस्त से, फ़ूलों की बरसा कराई गई,राजपथ सजाये गये; राष्ट्र के नाम गीत गाये गये । इस प्रकार स्वतंत्र भारत की राजधानी का मुकुट मुझे पहनाया गया । मेरी मिट्टी में कितने ही कलाप्रेमी, दार्शनिक, वैग्यानिक, कवि और लेखक जनम लिये ,जिन्होंने केवल भारत में ही नहीं, दुनिया के कोने-कोने में जाकर, भारत आजाद है, एक प्रभुत्व- सम्पन्न राष्ट्र है,का संदेश पहुँचाये । आज बड़े-बड़े भवन, होटल, मंदिर , शैलानियों के ठहरने के लिए धर्मशाला आदि से दिल्ली का आनन भरा पूरा है । यहाँ यमुना के तट पर , महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू, लालबहादुर शास्त्री जैसे महान आत्माओं की समाधि है ; जिन्हें देखने लोग दुनिया भर से आते हैं । मैं दुनिया की सबसे बड़े जनतंत्र की राजधानी हूँ । मुझे गर्व होता है, जब लोग यह कहते हैं,’भारत की राजधानी, दिल्ली ,भारत देश का दिल है । इसकी साँसों पर भारत जिंदा है । यहाँ की ईंटों और पत्थरों के भग्नावशेष, इतिहासकारों, कवियों, लेखकों को भावनाओं का कोष प्रदान करते हैं’ ।

 

 

 

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