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अंक:  जून 2018   


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मौसम ----डां नन्दलाल भारती

 

 

सुना था आदमी मे बेगानापन होता है
यह सच नहीं है यार
मौसम भी देता है बेगानापन की मार
ऐसा भी होता है
समय भाग जाता है आगे
घड़ी हो जाती है झूठी गवाह
सच मे ऐसा नहीं होता
घड़ी थम सकती है
झूठ भी बोल सकती है
वह पराधीन होती है
बैटरी के अधीन होती है
बैटरी के कमजोर पड़ते ही
मंद पड़ने लगती है
आखिर मे थक कर थम जाती है
आदमी की तरह
हड़बडाहट मे आदमी सच मान लेता है
मंद अथवा थमी घड़ी के इशारे को
कभी कभी आदमी भ्रमवश
इशारे को सही मानकर कर जाता है गलती
समय नहीं करता है गलती और
नहीं देता है रिटेक का समय
आदमी गलती की एहसास करता है जब
सही अथवा गलत का पता चलता है तब
यह तो सच है समय नहीं होता गलत
हां कभी कभी मौसम की अंगडाई कर देती है भ्रमित
समय लगने लगता है आगे
इसी भ्रम मे सही घडी भी लगने लगती है आगे
आदमी खा जाता है गच्चा
समय का पाबंद कर लेता है उपयोग अच्छा
मौसम की पहली बारिश हो तो
कलमकार के हृदय से फूट पडती है
शब्दो की सरिता
वह लिख देता है कविता।

 

 

 

 

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