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mar 2017
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अंक:  जून 2018   


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आओ ! हम एक दूजे से लगकर बैठें---डॉ. श्रीमती तारा सिंह

 

 

आओ ! हम एक दूजे से लगकर बैठें
जिंदगी की ढ़हती दीवार को पकड़कर बैठें

 

दम लिया था कयामत ने कभी जहाँ
उस वक्ते-सफ़र को संवार कर देखें

 

रिजवा1 से हमारी लड़ाई नहीं, क्यों न हम
उससे खुल्द2 के घर की बात कर देखें

 

जीस्त3 की कराह से फ़जा4 बेकरार है, आँख
जागती है क्यों,आदमी की मौत पर,पूछकर देखें

 

जो वो न चाहे, कौन उठा सकता हमें
चलो उसके दर पर मुश्तमिल5 होकर बैठें

 



1.स्वर्गाध्यक्ष 2. स्वर्ग 3. जिंदगी 4. हवा
5.मिलकर

 

 

 

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