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अंक:  जून 2018   


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"कैसे जी लेते हैं लोग" ---- शबाना के. आरिफ़

 

 

कैसे जी लेते है लोग मोहब्बत किये बिना
ज़िंदगी बे-नूर है जाम-ऐ-मोहब्बत पीए बिना

 

 

शिक़वा, ज़िद्द-बहस, शक़-हक़, दर्द-तौहीन
रूठना-मनाना, फिर बाहों में सिमट जाना

 

 

बिस्तर में लेटे हुए एक-दूसरे की आँखों में खोये
तकिये के गिलाफ़ में दिलों के जज़्बात पिरोना

 

 

कभी तन्हा माज़ी यादों में अश्क़ बहाना और
रंग-ए-इश्क़ की भीगी चादर में सिमट के छुप जाना

 

 

रिश्ते की गवाही देती दीवारों से गुफ़्तगू करते
मस्जिद-ए-दिल में इश्क़ की नमाज़ों का याद आना

 

 

उफ्फ़..कैसे फ़तेह पाते हैं लोग शिकस्त खाये बिना
ज़िंदगी बे-नूर है जाम-ऐ-मोहब्बत पीये बिना

 

 

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