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अंक: जून २०१७


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वृद्धाश्रम--डॉ० श्रीमती तारा सिंह

 

 

वृद्धाश्रम अर्थात अपने ही घर से, अपनों द्वारा प्रताड़ित हुए हमारे बुजुर्गों का वह वासस्थल, जहाँ अपनों से दूर रहकर बुजुर्ग अपनी मौत का इंतजार करते हैं । वृद्धाश्रम हम इसलिए कहते हैं , क्योंकि हम इसे वेदना-क्लेशहीन अक्षय-लोक नहीं कह सकते , कहें भी तो कैसे , यहाँ रहकर तो वे अपने उस दिन को याद कर रोते हैं, जिस दिन वे अपने संतान के माता-पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त किये थे । उनका कहना है, ’क्या हमने इसी दिन के लिए अपने संतान को, अपना निवाला खिला-खिलाकर बड़ा किया था, कि मेरी जिंदगी के अंतिम पड़ाव पर जब वेदना का गहन तुषारवृत अंधेरा छाने लगे , तब अपने बाहुबल से मेरा हाथ पकड़कर , मुझे घसीटकर दरवाजे के बाहरकर फ़ेंक देना और जो मैं न जाने की जिद्द करूँ , तब अपनी पत्नी से कहना कि, बाकी काम तुम्हारा है । देखना जो काम तुम नहीं कर सके, बखूबी मिनटों में वह कर लेगी; क्योंकि बदलते समाज की यही सच्चाई है ।’
आज हमारे समाज में बहुत कम ऐसे भाग्यशाली माता-पिता हैं , जिन्हें अपने संतान से प्यार और स्नेह , जिंदगी की अंतिम साँस तक मयस्सर हो पाता है । यह समाज की सच्चाई है, कि मकड़े के जाल-सा चेहरा प्राय: संतान के बेरूखी का शिकार रहा है । जिस तरह तट पर का पानी किसी काम का नहीं होता है, ठीक उसी तरह साँझ का मुसाफ़िर अपने ही घर में बेकार हो जाता है । उगते संरज के सामने हर कोई नतमस्तक रहता है, लेकिन डूबते सूरज की ओर लोग देखना भी पसंद नहीं करते । आज की नई पीढ़ी यह कहकर बुजुर्गों को अपने पीछे असहाय छोड़कर आगे निकल जाते हैं,क्योंकि हमारे साथ वे चल नहीं सकते । वे हमेशा अपने पुराने रीति-रिवाज से जुड़े रहते हैं और वही घिसा-पिटा रिवाज अपने बच्चों पर भी लादना चाहते हैं , और न मानने पर घर को अशांति का अखाड़ा बना देते हैं । मैं कहती हूँ, ’यह सब आरोप-मात्र है, इसमें सच्चाई नहीं है । सच्चाई तो यह है कि आजकल एकल परिवार का फ़ैशन चल गया है , जिसमें पति-पत्नी और एक बच्चा होता है । ये लोग नहीं चाहते, कि अपने बुजुर्ग के साथ रहकर अपनी स्वतंत्रता नष्ट करें । वे सोचते हैं , इनके पीछे अपना समय बर्बाद कर अब हमें क्या मिलेगा ? इस तरह के अविवेकी और स्वार्थी संतान चाहे कुछ भी हो , अपने सुख-सुविधा के लिए कैसे भी बुरे काम हो, अपनाने में हिचकते नहीं । हर प्रकार से अपने महत्वाकांक्षा की पूर्ति का प्रयत्न करते हैं ।
वे हर कदम पर , अपने बुजुर्गों का अपमान करते हैं ; भले ही उनका अपयश ही क्यों न हो । अपने बुजुर्गों का तिरस्कार करने में, वे मानवता के ऊँचे सिद्धांतों की हत्या करने में भी संकोच नहीं करते । अपने आश्रीतों को दुखी रखकर , अपनी पत्नी-बच्चों को खुश रखना आज के समाज में इसी प्रवृति की प्रधानता है । अतिशय स्वार्थी –प्रवृति के लोग भले-बुरे का विवेक नहीं रखते, न ही धर्म-अधर्म से डरते । वे तो मानवता के स्थायी मूल्यों की हत्या करते हुए झिझकते तक नहीं । जिस माँ-बाप का वे उँगली पकड़कर चलना सीखते हैं, उसी को बात-बात पर उँगली दिखाते हैं । जब कि बुजुर्ग हमारी धरोहर हैं ; हमें समाज के रीति-रिवाज , धार्मिक अनुष्ठानों के नियम-कायदे आदि वही हमें सिखलाते हैं । भले ही युवा पीढ़ी इन सब बातों को गुरुत्व न दे, मगर बुजुर्ग हमेशा अपने तजुर्बे से निकालकर कुछ न कुछ हमें देने की कोशिश करते हैं । दूसरी ओर नई पीढ़ी ,अपने ही सिद्धांत को सही मानते हुए , उनको ठुकरा देते हैं, जिसके कारण आज धरोहर हमसे दूर होता चला जा रहा है ; जिसके कारण अधिकतर बुजुर्गों का घर वृद्धाश्रम बना जा रहा है । उनकी झुर्रियों के बीच अटके हुए आँसू को अपने ही संतान समझने के लिए तैयार नहीं हैं । उनकी उपेक्षित दृष्टि में कोई दयाभाव नहीं रहता ।
दुख होता है, जिसके ऊपर संस्कार को बचाने का भार था, वही उसे खत्म करने में लगा हुआ है । एक जमाना था, जब संतान माँ-बाप के वचन को पूरा करने के लिए घर-द्वार , राज-पाट छोड़कर जंगल चले जाते थे । आज वही अपनी स्वतंत्रता के लिए बिना उनकी मनोव्यथा को जाने , उन्हें वन (वृद्धाश्रम) को भेज देते हैं । पहले तो यह कलंक बड़े-बड़े शहरों तक ही सीमित था, लेकिन अब तो इनकी गिरफ़्त में ,छोटे-छोटे शहर भी आ गये हैं । जिस तरह यह प्रचलन बढ़ रहा है और संतान के मन में अपने बुजुर्गों के प्रति संस्कृत और सम्मान सिकुड़ता जा रहा है ; वह दिन दूर नहीं, जब समाज में बुजुर्ग ढ़ूँढ़कर भी नहीं मिलेंगे । उन्हें देखने के लिए ’वृद्धाश्रम’ जैसे आजायब –घर जाना होगा , क्योंकि आजायब-घर ही एकमात्र वह जगह है , जहाँ हम अपनी पुरानी चीजों को जाकर देख पाते हैं । अगर उतना भी जहमत उठाने की इच्छा नहीं हुई, तो फ़िर तस्वीरों में दिखा दिये जायेंगे । जब कि लाखों-करोड़ों सालों से भारत देश की यह परम्परा रही है , कि घर के मुखिया, युवा नहीं बल्कि बुजुर्ग हुआ करते हैं । परिवार के सारे अचछे-बुरे फ़ैसले, वे अकेले ही लेते थे , लेकिन ये पश्चिमी सभ्यता, बहुत हद तक हमारी संस्कृति में सेंध लगा चुकी है , जिस कारण अनेकों बार हमें यह देखने मिलता है, कि बुजुर्ग अपने ही संतान की अनदेखी और तिरस्कार का शिकार होकर मंदिर के बाहर, रास्ते पर,या फ़िर सिनेमा हॉल के बाहर भीख माँग रहे हैं । । बावजूद वे अपने संतानों को भूलने के लिए या अभिशाप देने के लिए तैयार नहीं होते । पूछने पर बस इतना कहते हैं , सारा दिन तो भीख माँगने में गुजर जाता है , लेकिन जब शाम होती है, तब उन सबों की बड़ी याद आती है । यह कहकर अपनी बूढ़ी आँखों के आँसू को पल्लव की तरह काँप रहे हाँथों से पोछने का असफ़ल प्रयास करते हुए, फ़िर मुस्कुराने भी लगते हैं । उनके इस मुस्कुराहट में कितने दर्द की दरिया बहती है ; यह अंदाजा , काश कि उनके संतान लगा सकते ।

 

 

 

 

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