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अंक: जून २०१७


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सुख का उदगम माँ की गोद है--डॉ० श्रीमती तारा सिंह

 

 

संतान की इच्छाओं का ,स्तर -स्तर हर्षित रहे
माता-पिता सर्वस्व लुटाने बरबस रहते तैयार
सुरपुर का सब मीठा फल रखते उसके लिए संभाल
धिक्कार है ऐसे संतान को , बावजूद इसके
अपने बूढे माता -पिता से , विमुख होकर जीता
रखता नहीं उनका खयाल,तब भी पिता चाहता
नहाते वक्त भी न टूटे, मेरे पुत्र का बाल
न ही पाँवों में पड़े कंकड़ी का दाग

 

व्यर्थ है उसकी साधना , पूजा -पाठ , सन्यास
कर में धर्मदीप न हो , तो सब है बकवास
चित्त प्रभु के चरणों में,चाहे जितना लगा ले
जितना कर ले दान - पुण्य , तप , उपवास
नहीं मिलने वाला सुख - शांति का आवास
क्योंकि सुख का उदगम माँ की गोद है
पिता का प्यार है और है सेवा-धर्म प्रयास

 

इसलिए दायित्व ग्रहण कर एक अच्छी संतान का
क्या है माता- पिता की इच्छा , जान चिंता कर
किसी भी बुरे कर्म के लिए चरण उठाने से पहल्रे
सोचो कहीं तुम्हारी पद- ध्वनियाँ , तुम्हारी आने-
वाली पीढियों के कानों तक तो नहीं पहुँच रही
क्योंकि जैसा संदेश , भूमि से अम्बर को जायगा
वहाँ से आने वाला , वैसा ही तो आयगा





हो कोई दुनिया में ऐसा कोई माता-पिता तो
दिखा,जो हाथ जोड़कर,देवी- देवताओं से कहे
हे देव ! हमें जीने दो , मरे हमारे बच्चे सगहे
वे तो चाहते , बरसे रंग रिमझिम कर गगन से
भीगे मेरे संतान का स्वप्न निकलकर मन से

 

एक पापी भी सजग पुत्र के हित जीता
सोचता , त्रिलोक में जो भी सुख सुंदर है
सब समेटकर अपने पुत्र के हाथों पर रख दूँ
विधु की कोमल रश्मि,तारकों की पवित्र आभाओं-
को दूध संग मिलाकर , गिलास में भर पिला दूँ
जिससे मेरा पुत्र रोगरहित ,शोकहीन होकर जीये
यौवन की शिरा-शिरा में सुख-उल्लास नाचते रहे

 

 

लेकिन संतान ऐसा नहीं सोचता , वह तो खुद
अमृत को पी , गरल तृषित पिता को पिलाता
लगातार संतान के अत्याचार की तीव्र आँच पर
पिता का अपमानित मन , अकुलाता रहता
सोचता, दीन-दानवों से लड़कर जब निर्द्वंद्व हुए तब
धमनियों को बंद करने अपने ही खून चले आए

 

लाचार पिता मन ही मन सोचता , पुत्र
यही तो है परिवर्तन का घूमता हुआ चक्र
जो आज मेरी तरफ है,कल तुम्हारी तरफ होगा
आज जिस जगह मैं हूँ , कल यहाँ तू होगा

 

 

 

 

 

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