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अंक: जून २०१७


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नीड़/घोंसला/तृण---प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

 

 

01.
आंधियाँ चलीं
नीड़ के निर्माण में
पाखी न हारी ।
☆☆☆
02.
नन्हीं सी पाखी
नीड़ के सृजन में
तृण चुनती ।
☆☆☆
03.
डालियाँ टूटीं
नीड़ उजड़ गया
चिड़िया रूठी ।
☆☆☆
04.
डाली में बैठी
उदास दिखी पाखी
नीड़ की लुटी ।
☆☆☆
05.
मन पंछी रे !
मैं तो बस तिनका
प्रकृति नीड़ ।
☆☆☆
06.
नीड़ अपना
रोज बनाए पाखी
हवा ले उड़ी ।
☆☆☆

 

 

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