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अंक: जून २०१७


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धैर्य की गागर छलकने दीजिये--डॉ. रंजना वर्मा

 

 

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धैर्य की गागर छलकने दीजिये
अश्रु - मुक्तायें ढलकने दीजिये ।
नयन पी लेंगें समंदर पीर का
सूर्य आँखों में झलकने दीजिये ।।
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सुधा सम बोल सब को ही लुभाते
भला कटु बोल हैं किस को सुहाते ?
सरस स्वर स्नेह के मधु में डुबाती
तभी तो कोकिला के बोल भाते ।।
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सजी जो स्वर्ण मुक्ता से वो मूरत भी तुम्हारी है
जिसे नित अर्घ्य देते हैं वो सूरत भी तुम्हारी है ।
बहुत दिन रह लिये घनश्याम धन के मंदिरों में तुम
जगत के दीन - दुखियों बीच अब रहने की बारी है ।।
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दरश को साँवरे तेरे हमारी आँख प्यासी है
विचारो तो न कुछ मुश्किल कृपा करनी जरा सी है ।
निगाहों मे सदा हैं डोलते अनुराग के सपने
इन्हीं नयनों में देखो छा गयी कैसी उदासी है ।।
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न हो यदि भावना तो देह में कम्पन नहीं होता
न हो अनुराग तो मन भी कभी उन्मन नहीं होता ।
किया करते हैं बात विराग की सन्यास की तप की
जगत को छोड़ देने से विरागी मन नहीं होता ।।
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