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अंक: जून २०१७


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valrose

भैया का आँगन--डॉ० श्रीमती तारा सिंह

 

 

हाड़-मांस कंपा देने वाली पौष की ठिठुरती रात में,रोज की तरह आज भी बुधना अपने छोटे-छोटे बच्चों को ,एक कोने में छाती से चिपकाये, सिकुड़ा-सिमटा सुबह का इंतजार कर रहा था, तभी उसका तीन साल का बेटा, बुधना जाग गया । चाँदनी रात थी, चाँद पूरे शबाब पर था । घर के टूटे ठाट से जब बुधना की नजर चाँद पर पड़ी, तो खिलखिलाकर हँस पड़ा और पिता का मुँह छूते हुए बोल पड़ा,’ बाबू ! बाबू ! देखो न,ऊपर क्या चमक रहा है ?
पिता वीरेन्द्र ने अनमना सा मुँह बनाकर कहा,’हाँ,हाँ, ठीक है, मगर तुम सो जाओ । काफ़ी ठंढ़ है और रात भारी है; लेकिन बुधना को नींद कहाँ, जो वह सोता । वह तो चाँद को आसमां से उतार कर अपने हाथ में पाना चाहता था । पिता के लाख मना करने पर भी, एक ही रट लिये था, मुझे वह चमकता हुआ खिलौना चाहिये । मुझे ला दो न ! जब वीरेन्द्र से उसकी जिद्द नहीं संभाली गई, तब बुधना के गाल पर एक थप्पड़ जड़ते हुए कहा,’ तुमको कब से कह रहा हूँ, सो जा, तू सोता क्यों नहीं ?’
तभी बुधना की माँ जो अलाव तापते-तापते कब नींद में आ गई, उसे पता भी नहीं था । मगर वीरेन्द्र की झल्लाहट भरी तेज आवाज उसकी नींद खोल गई । उसने आँख मलते हुए पति से पूछा,’क्या हुआ,क्यों चिल्ला रहे हो ?’
वीरेन्द्र अपनी आवाज और ऊपर करता हुआ बोला, इसे चाँद चाहिये ।
पत्नी कमला,आँख मलती हुई बोली---’ तो उसे समझा दो न; इसके लिए मारने की क्या जरूरत है,बच्चा है, उसे क्या पता, जो वह चाह रहा,उसे पाना कभी संभव नहीं है ? वीरेन्द्र पत्नी से,क्रोधित हो बोला--’ बहुत समझाया,पर यह मानता कहाँ है ? आज इसे क्या हो गया है,क्यों यह ऐसी जिद्द करता है’ ?
पत्नी ,वीरेन्द्र की ओर देखती हुई, ठीक है, इसे मैं बहलाती हूँ ; तुम सो जाओ ।’ पत्नी कमला,बुधना को गोद में लेकर बहला ही रही थी कि बुधना की नजर मुखिया के महल पर पड़ी ,जो रंग-विरंगी बिजलियों से सराबोर, चाँद से भी ज्यादा प्यारा दीख रहा था ।
बुधना एक बार फ़िर रोते हुए चिल्ला उठा, माँ, माँ ! देखो वह क्या है, मुझे वहाँ ले चलो न । कमला ने बहुत समझाया ,’ बेटा सो जाओ, जब तुम बड़े होवोगे, तब खुद से चले जाना ; मैं नहीं जा सकती । लेकिन उसे पता कहाँ था, गरीबी के झरोखे से चाँदी के महल को देखना गुनाह है ; मैले हो जायेंगे । वह रोता रहा, और न जाने कब माँ के आँचल की गरमी ने नींद लगा दी, सो गया । सुबह उठा, तो देखा, न चाँद था, न ही रंगीला वह महल ।
बीतते दिनों के साथ,बुधना बड़ा हो गया । एक दिन अपनी पत्नी कमला से, वीरेन्द्र ने बातों-बातों में कहा,’ मैं अकेला मजदूरी कर,कैसे इतने जनों का पेट भरूँगा । तुम तो बीमार ही रहती हो, दिन-काल ठीक नहीं, इसलिए विद्या (बेटी) को किसी के घर रखना ,मैं उचित नहीं समझता हूँ । क्यों न हम बुधना से कहें, समझदार है, वह हमारी मजबूरी को समझता है’ । ।
पत्नी कमला, बुधना की ओर देखती हुई बोली -—अभी तो बच्चा है, 8-10 साल के बच्चे से क्या काम होगा ?”
वीरेन्द्र ---मुखिया जी के यहाँ पशुओं को दाना-पानी लगाने के लिए ,एक बच्चा नौकर चाहिये । मुखिया का मैनेजर आज मुझको बुलाकर पूछ रहा था । ’ पत्नी कमला---ठीक है, उसके बचपन के सपने भी पूरे हो जायेंगे ।’
वीरेन्द्र ने पत्नी से पूछा,’कौन सा स्वप्न ?’
कमला--- आँखें पोछती हुई, याद है तुमको, जब वह तीन साल का था, तब चाँद के साथ, मुखिया का घर देखने के लिए रात भर रोया था ।
वीरेन्द्र ---हाँ, हाँ, याद है, और मैंने उसे थप्पड़ भी मारा था ।
कमला--- बीती बातों को छोड़ो, और जाकर मुखिया से बात करो । अगर कहे तो बुधना को वहाँ पहुँचा दो । यहाँ बेचारा दो वक्त की रोटी के लिए तरसता रहता है, वहाँ भर पेट अनाज मिलेगा ; और तो और , महीने के अंत में चार पैसे भी आ जायेंगे । सबसे बड़ी बात होगी कि पढ़े-लिखे लोगों का संग मिलेगा, तो आगे भविष्य उज्ज्वल होगा ।
वीरेन्द्र ---- वहाँ तुम्हारे बेटे के साथ कोई दोस्ती करने नहीं बुला रहा; वह सिर्फ़ मुखिया के घर के चार कुत्तों में पाँचवां कुत्ता होगा. जो जूठा खाकर दरवाजे पर पड़ा रहेगा ।
कमला---हम गरीब के लिए बड़े घर के कुत्ते की हैसियत रखना, भी तकदीर की बात होती है, जो सभी गरीबों को नसीब नहीं होता ।
वीरेन्द्र की आँखों से दुख के आँसू निकल पड़े , बोला--- कहाँ है बुधना ?
बुधना, पास ही खड़ा,सब सुन रहा था; बोल पड़ा ---मैं आपके पास हूँ बाबू ! मुझे कहाँ जाना है ?
पिता वीरेन्द्र, उसके सर के बाल को सहलाते हुए बोला ---बेटा, तुझे मुखिया के घर पशुओं को सानी-भूसा लगाने के लिए रहना है ।
बुधना जब घर से जाने लगा; माँ कमला ने समझाया--- बेटा ! बड़े भाग्य से तुझे यह मौका मिला है । तुम्हारे उम्र के इसी गाँव में और भी बच्चे हैं, मुखिया का मैनेजर, उन्हें न बुलाकर ,तुझको बुलाया है । वहाँ पहुँचकर कोई ऐसी गलती न करना कि वे लोग तुझको वहाँ से भगा दे । मालिक- मालकिन, यहाँ तक कि उनके घर के छोटे-छोटे बच्चों की बातों का सम्मान करना । वे लोग, जो काम दे, उसे खुशी-खुशी करना ;जिससे कि वे लोग तेरे चाल-व्यवहार से खुश रहें ।
बुधना, सर नीचा कर बोला-—ठीक है माँ, कहकर पिता के साथ,मुखिया के घर चला गया ।
वीरेन्द्र,मुखिया के घर बेटे को सौंपकर, जब घर वापस आया, बरामदे की दीवार से पीठ टिकाकर गुमसुम बैठ गया । तभी पत्नी, कमला बगल में बैठती हुई, पूछी---क्यों जी ,वे लोग बुधना को रखने से इनकार कए दिये ।
पति वीरेन्द्र, डबडबाई आँखों से पत्नी की ओर देखते हुए पत्नी से बोला---नहीं, नहीं ; बुधना को देखते ही मुखियाजी पसंद कर लिये ।
पत्नी कमला--- तो फ़िर रोते क्यों हो,बगल में ही तो है, उधर से आते-जाते बुधना से मुलाकात हो जायगी; कौन दूर देश गया है ।
पति वीरेन्द्र, निराश हो बोला---उतना भाग्यशाली कहाँ हूँ कमला, जो बेटा दूर-देश नौकरी करने जायगा । उसे तो इसी गरीबी के दलदल में, यहीं जीना और मरना है । पति की बात सुनकर , कमला रो पड़ी । मगर हिम्मत जुटाते हुए कही --- छोड़ो यह सब चिंता, जिंदगी का तीन हिस्सा बीत गया, एक हिस्सा बाकी, वह भी बीत जायगा । मेरे बाद बुधना का क्या होगा, नहीं होगा,हम अभी से सोचकर क्यों रोयें ? हम जन्मदाता हैं, तकदीर दाता नहीं ; इसलिए जो मेरे वश में नहीं है , उसके लिए सोचना या मातम मनाना व्यर्थ है ?
बुधना को मुखिया का मैनेजर,दिन भर का काम समझाकर कहा--- तुम अपना काम अभी से शुरू कर दो । बुधना अपने काम में लग गया । लेकिन मुखिया के पोते को स्कूल जाते देख, रोज यही सोचता रहा---मैं कब स्कूल जाऊँगा ? मेरे माता-पिता स्कूल न भेजकर, यहाँ क्यों भेज दिये ; क्या मैं स्कूल कभी नहीं जा पाऊँगा ? इसी तरह मुखिया के दरवाजे पर जिंदगी भर,पशुओं के साथ जीऊँगा ; नहीं-नहीं, मैं भी स्कूल जाऊँगा ,पढ़ूँगा-लिखूँगा और बड़ा आदमी बनूँगा । लेकिन कैसे स्कूल जाऊँगा—बुधना इसी सोच में डूबा रहा । सुबह होते ही सारे पशुओं को जल्दी-जल्दी चारा डालकर,मुखिया के पोते के पीछॆ-पीछॆ ,खुद को छिपते-छिपाते स्कूल पहुँच गया । जब स्कूल के गुरुजी ने देखा,कि एक मैला-कुचैला कपड़ा पहने एक बच्चा कुछ कहना चाहता है; तो गुरुजी उसके पास गये । पूछा--- तुझे क्या चाहिये ? बुधना (हाथ जोड़ते हुए) बोला ---मुझे कुछ नहीं चाहिये ।
गुरुजी---तो तू यहाँ क्या करने आया है ?
बुधना,बिना कुछ सोचे-समझे बोल गया--- पढ़ने ।
सुनते ही गुरुजी गुस्सा से तिलमिला उठे और बोले --- भागो यहाँ से, नहीं तो एक थप्पड़ दूँगा । बड़ा आया है ,पढ़ने । गुरुजी के इस व्यवहार से बुधना टूट गया ,लेकिन जिद्द बरकरार रखा । उसने तय कर लिया कि उसे पढ़ना है; पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनना है, नहीं तो ऐसी दुतकारें जिंदगी भर उसे सहनी पड़ेगी ।
दूसरे दिन सुबह होते ही, बुधना पशुओं को सानी-भूसा लगाकर स्कूल के लिये रवाना हो गया । आज गेट से नहीं घुसा, बल्कि स्कूल के पिछवाड़े की खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया । गुरुजी जब क्लास में आये, बुधना कान लगाकर सुनने लगा । गुरुजी कैसे और क्या पढ़ाते हैं; बुधना को गुरुजी की सारी बातें समझ में आने लगी । जो नहीं समझ में आती थी, उसे मुखिया के पोते से,अकेले में पूछ लिया करता था । इस तरह बुधना. रोज स्कूल जाने लगा । एक दिन गुरुजी की नजर पढ़ाते-पढ़ाते खिड़की के बाहर पड़ी, देखा ,कोई बच्चा वहाँ खड़ा है और बड़ी गौर से उनकी बातों को सुन रहा है ।
गुरुजी एक पिउन भेजकर उसे अपने पास बुलबाये । बुधना डर गया; सोचने लगा---ये तो वही गुरुजी हैं,जिनके हाथों मैं मार खाते-खाते बच गया था । आज बचने वाला नहीं ; अत: गुरुजी के पास आते ही गिरगिराने लगा ---मुझे माफ़ कर दीजिये , मुझसे गलती हो गई ।
गुरुजी, बुधना को पुचकारते हुए बोला --- गलती तुझसे नहीं, गलती मुझसे हुई है । मुझे पहले दिन ही तुझे यहाँ पढ़ने की इजाजत देनी चाहिये थी ; तू पढ़ेगा ?
बुधना ,आँसू पोछते हुए कहा--- हाँ ।
गुरुजी --- तो तुम यह बताओ कि इस दो साल में खिड़की के बाहर से सुन-सुनकर ,मुझसे क्या-क्या सीखा ?
बुधना----पूछिये गुरुजी !
गुरुजी , एक-एक कर सभी विषयों पर सवाल करते गये । बुधना,सब का जवाब बारीकी से देता गया । गुरुजी अपने सभी सवालों के सठीक उत्तर पाकर,आश्चर्यचकित हो गये और कहे----ठीक है,तू कल से पिछवाड़े में नहीं, मेरे क्लास-रूम में बैठेगा, मैं तुझे पढ़ाऊँगा ।
बुधना को स्कूल जाते-आते दो-तीन साल गुजर गये । इस बीच, सैनिक स्कूल के एडमीशन हेतु परीक्षा की घोषणा की गई । गुरुजी,बुधना और अन्य बच्चों को भी अपने साथ चलने को बोले । गुरुजी, बुधना से कहे-- तुम मेरे साथ चलो,तुम्हारी परीक्षा ली जायगी; अगर तुमने अच्छा किया, तो भारत सरकार तुमको पढ़ने-लिखने का खर्च, और बड़ा होने पर नौकरी देगी । सुनकर बुधना ने गुरुजी के पैर छुआ और गुरुजी के साथ ,सैनिक स्कूल परीक्षा देने चला गया । लगभग तीन घंटे की परीक्षा थी ; बुधना मन लगाकर हर प्रश्न को पढ़ा, फ़िर उसका उत्तर लिखा । परीक्षा खतम होने पर स्कूल पहुँचकर,गुरुजी से मिलने आया । गुरुजी ने पूछा---क्या, सब ठीक है ?
बुधना, सर नीचा कर बोला--- जी गुरुजी !
लगभग पन्द्रह दिन बाद रीजल्ट आया; बुधना ( दिनेश ) प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ । यह समाचार,जंगल की आग की तरह पूरे कसबे में फ़ैल गया । दिनेश के माँ-बाप को बेटे की इस खबर पर पहले तो विश्वास नहीं हुआ; जब हुआ तो रोने लगे । तब गाँव के और लोगों ने चुप कराते हुए कहा, तुमलोग रो रहे हो; जब कि यह समय खुशी मनाने की है । माँ उठकर बेटे को गले से लगाकर बोली--- बेटा ! जिस गुरुजी की दया से तुमने इतना कुछ हासिल किया, उनकी तस्वीर अपने पास, भगवान की जगह रखना ।
तभी पिता ने रोते हुए कहा--- हे ईश्वर । तुम्हारी बहुत दया है, हमारे परिवार पर । अन्यथा बेटी विद्या 20 साल की हो गई; पैसे के अभाव में कुँवारी है । अब देर ही सही, बेटा आज न सही,कल उसके हाथ पीले करवायेगा ; वो भी अच्छे घर के लड़के के साथ । चार साल बाद दिनेश की नौकरी हो गई । वह घर के सभी लोगों का आशीर्वाद लेकर ,दिल्ली नौकरी करने चला गया । देखते ही देखते ,दिनेश के घर की दशा भी सुधर गई । सभी भाई-बहन को, जो जहाँ नौकर थे, घर बुलवा लिया । कहा--- मैं जो कमाता हूँ, तुम सबों के लिए ज्यादा तो नहीं है, लेकिन दूसरों की गुलामी करनी पड़े, ऐसा भी नहीं है । धीरे-धीरे पैसे जमा होंगे, तब तुमलोगों की कुछ न कुछ व्यवस्था करूँगा । विद्या दीदी की शादी भी बैंड पार्टी के साथ दूँगा ।
इधर गाँव में इतना अच्छा नौकरी-पेशा वाला कुँवारा लड़का मिलना मुश्किल था । अत: एक से एक बड़े घर से लोग अपनी बेटी का रिश्ता लेकर आने लगे । पहले तो दिनेश (बुधना) अपनी शादी से मना कर दिया ; कहा--- मेरी बड़ी बहन कुँवारी है,मैं छोटा होकर शादी कैसे कर सकता हूँ । लेकिन माँ-बाप के बहुत समझाने-बुझाने पर, फ़िर तैयार हो गया । पिता ने कहा--- बेटा ! तुम्हारी माँ अब बूढ़ी हो चुकी है और कमजोर भी काफ़ी है । एक बेटी की शादी ,अकेले जान नहीं दे सकती ; बहू आ जायगी,तो सब संभाल लेगी । दिनेश काफ़ी सोच-विचार के बाद, कहा--- जैसी आप सबों की मर्जी । आखिरकार , दिनेश की शादी एक खाते-पीते परिवार में, एक पढ़ी –लिखी लड़की से तय हो गई ।
शादी कर दिनेश ,अपनी पत्नी के साथ जब घर लौटा, बूढ़ी माँ, तिलकाकर ,बहू को घर में लाई । बहना विद्या भी, भाभी के इंतजार में,जो थक चुकी थी;राहत की साँस ली । राहत इसलिए, कि अब जल्द ही शादी की बारी उसकी थी । लेकिन तकदीर का लिखा,कब-कौन मिटा सका; जो विद्या, अपने भाई की अमीरी से अपनी गरीबी की रेखा मिटा लेती । महीने भर में,दिनेश की भाषा शैली बदल गई । अब तो वह वही बोलता था,जो उसकी पत्नी बोलने कहती थी । माँ-बाप अपनी आशा को टूटते देख,फ़िर एक बार उदास रहने लगे । सोचने लगे----अब क्या होगा ? काश कि हमने विद्या की शादी,बेटे से पहले दे दी होती,तो आज कुछ और होता । बड़ी भूल हुई,जो हमलोग,लोगों के कहने में आकर, विद्या की शादी टाले ।
विद्या पहले की तरह,घर का सारा काम,खाना बनाने से कपड़े धोने तक, अब भी करती रही ;यह सोचकर कि भैया-भाभी खुश रहेंगे । मेरे लिए अच्छा वर ढ़ूँढ़कर मेरी शादी दे देंगे ; लेकिन भाभी की मंशा कुछ और थी । उसे तो मुफ़्त की,वह भी गाय जैसी सीधी नौकरानी चाहिये थी । भला ऐसी नौकरानी काम छोड़ चली जाये,यह कैसे संभव था ; सो उसने ,दिनेश को समझाया, देखो, विद्या के लिए, तुम पढ़ा-लिखा वर खोजते हो । तो तिलक लगेगा और तिलक के पैसे आयेंगे कहाँ से, क्योंकि तुम्हारी तो अभी-अभी नौकरी लगी है; इतने पैसे हैं कहाँ ? दिनेश (बुधना) ने कहा---प्रिये ! तुम इन सब बातों की चिंता छोड़ दो ; मैं आफ़िस से लोन ले लूँगा । अपने प्लान पर पानी फ़िरता देख, नीलम (दिनेश की पत्नी) के होठों परेक विषैली हँसी दौड़ गई । जब दिनेश ने पूछा----तुम हँसती क्यों हो, क्या सोचती हो, लोन नहीं मिलेगा ? नीलम और जोर-जोर से ठहाका देती हुई कही---अरे नहीं भाई, लोन तो तुमको मिलेगा ही; मैंने कब कहा कि लोन नहीं मिलेगा । लेकिन चुकता कैसे करोगे; इतने सारे लोगों का खाना-कपड़ा,दवा आदि खरीदने के बाद लोन चुकता करने के लिए पैसे बचेंगे,तभी तो । पत्नी की बात सुनकर दिनेश सोचने लगा—अरे, इसकी बात तो सोलह आने सही है । लोन चुकता होगा कैसे ? आखिर पैसे कहाँ से आयेंगे ? पुर्वजों का दिया कोई जमी-जगह भी तो नहीं है,जिसे बेचा जा सके ।
आखिर एक दिन दिनेश ने तय किया,जितनी लम्बी चादर,उतना ही पैर फ़ैलाना ठीक होगा । दोनों पति-पत्नी ,आमदनी का हिसाब करने बैठ गये । अंत में देखा गया कि नीलम जो कह रही थी ; रीजल्ट वही आया ; वीरेन्द्र सोचने लगा-- विद्या को किसी गरीब के हाथ सौंप देना भी तो ठीक नहीं होगा । बेचारी की जिंदगी, बचपन से बुढ़ापे तक गरीबी की चक्की में पीसकर रह जायेगी । आखिर क्या किया जाये,जिससे विद्या एक सुखी परिवार में जा सके ।
पत्नी नीलम से दिनेश ने जब अपनी चिंता बताई; नीलम ने कहा--- चिंतित होने की क्या बात है ? इतनी बड़ी दुनिया है,कुछ न कुछ तो होगा ही । तुम मुझपर छोड़ दो । दिनेश ने पत्नी की
ओर से ढ़ाढ़स पाकर, राहत की साँस ली । कहा--- मगर जो भी करना है, जल्द करो । लोग मेरी ओर उँगली उठा रहे हैं । कहते हैं ---अपनी शादी कर ली और बड़ी बहन को कुँवारी रख दिया ।
एक दिन आफ़िस से आते ही दिनेश ने देखा, दरवाजे पर कुछ कुटुम्ब बैठे हुए हैं और घर के लोग उनके आवभगत में लगे हुए हैं । दिनेश घर के भीतर आँगन में आया और माँ से पूछा--- माँ ! ये लोग कौन हैं ? माँ ने कहा—विद्या से रिश्तेदारी की बात करने आये हैं । दिनेश--- समझ गया, नीलम जो कहती है ,निभाती भी है । भगवान का शुक्र है जो मुझे ऐसी होनहार , होशियार ,और ईमानदार पत्नी मिली ; वरना आजकल का जो युग आया है । भाभी को ननद से छत्तीस का आंकड़ा रहता है । सचमुच मैं क्या, विद्या भी खुशनसीब है जो ऐसी भाभी पाई । तभी नीलम आकर विद्या को अपनी एक सुंदर साड़ी पहनने के लिए देती हुई कही ---दीदी , इसे आप जल्दी से पहनकर तैयार हो जायें । लड़के वाले एक झलक ,आपको देखना चाहते हैं । यह सब देखकर, दिनेश की माँ की आँखों में पानी भर गया । उसने पहली बार अपनी बहन को, इतनी महंगी साड़ी पहने देखा ।
लड़के वाले को , विद्या का गोल-गाल चेहरा, गेहुँआ रंग और बातों मे नरमी तथा सादगी भा गया ,उनलोगों ने देखते ही शादी के लिए हामी भर दी । यह सब एक झटके में होता देख दिनेश की खुशी का ठिकाना न रहा । तभी लड़के वाले के तरफ़ से कहलवाया गया कि अब आपलोग भी आकर लड़के को देख जायें ; तो अच्छा होगा । दिनेश, अपने पिता से जब पूछा कि हमें कब जाना है, लड़का देखने । ठीक कर दिन इन्हें बता देते तो अच्छा होगा । दिनेश के पिता, वीरेन्द्र सोचने लगा------जहाँ बेटी को रोटी नहीं मिलती थी, खाकर जिंदा रहने । वहाँ दोनों वख्त रोटी मिलेगी, भर वदन कपड़े मिलेंगे; वहाँ जाकर और हमें क्या देखना ? लड़के वाले को बोल दो, हमारी तरफ़ से और कोई देखने जाने की रस्म नहीं होगी । आपलोग शादी का दिन तय कर हमलोगों को खबर भिजवा दें । हमलोग पान नहीं तो पान का डंठल लेकर आपलोगों के स्वागत में तैयार रहेंगे । फ़िर क्या था, लड़के वाले राम-सलाम कर खबर शीघ्र भिजवाता हूँ, कहकर विदा हो गये ।
लगभग 10 दिनों बाद लग्न की तारीख तय हुई, खबर आई कि ’हमलोगों को लड़कीवाले से कुछ नहीं चाहिय” । दिनेश, बहन की बिदाई तथा शादी में कोई कोताही न हो । इसके लिए, नीलम को सचेत कर दिया । गहने-कपड़े,सभी सुंदर और थोड़ी कीमती हो ; अन्यथा,दीदी के ससुराल वाले,कहेंगे---क्या दिनेश बाबू की औकाद बहन बिदाई की भी नहीं है ।
नीलम----दिनेश से हाथ जोड़ते हुए बोली---मेरे पतिदेव ! आप चिंता छोड़ दें । दीदी, कैसे और किन कपड़ों में विदा होगी,ये दायित्व मेरा है,आपका नहीं । आप विश्वास रखिये,जहाँ कपड़े कम पड़ेंगे ; मेरे पास है न,मैं वो सब उनको दे दूँगी । पत्नी की बात सुनकर ,दिनेश फ़िर एक बार अपने भाग्य पर गर्वित हो उठा ।
बारात आई , बैंण्ड-बाजे के साथ उनकी अगुवाई हुई । रात ठीक 12 बजे, शादी के मंडप में ब्राह्मण मंत्र उच्चारण करते हुए, अग्निदेव को प्रणाम कर बैठ गये । शादी की सारी सामग्रियों को अचछी तरह देखने के बाद,दिनेश से बोले ---यजमान ! लड़का-लड़की को मंडप में बुलवाइये । दिनेश दरवाजे पर लड़के वालों से बताने ही जा रहा था,कि वर पाँव तक का मुकुट (मोर) पहने ,अपने बहनोई के साथ,आ पहुँचे । दिनेश हँसते हुए हाथ जोड़कर, उन सबों से बैठने का आग्रह करते हुए ,कन्या को लाने,नीलम से कहने चला गया । नीलम, लाल रेशमी साड़ी में लिपटी, विद्या को पकड़ती हुई मंडप की ओर ही बढ़ी आ रही थी । विद्या को दुल्हन के कपड़ों में देखकर, दिनेश ,रोऊँ कि इतराऊँ; कुछ ठीक नहीं कर पा रहा था । बस इतना ही कह पाया---नीलम ,जरा जल्दी पहुँचो , पंडित जी इंतजार कर रहे हैं । नीलम—बस, हमलोग पहुँच गये ।
शादी की सारी रश्म अदा की गई,लेकिन जब सिंदूर देने की बारी आई, तब लड़का उठकर खड़ा नहीं हो पा रहा था;एक बूढ़ी औरत ( जो कि साथ आई थी ) सहारा देकर उठाने की कोशिश कर रहीथी । यह सब देखकर, दिनेश घबड़ा गया । नजदीक जाकर ,उस औरत से पूछा---- क्या हुआ, दुलहे बाबू की तबीयत ठीक नहीं है ? बूढ़ी औरत-- – ना,ना सब ठीक है, आप चिंता मत कीजिये । आखिर दुल्हा किसी तरह उठकर दुल्हन के माथे में सिंदूर भरा । हँशी- खुशी से शादी सम्पन्न हो गई । मुहल्ले की औरतें, जाकर जब दुल्हे के सिर पर से मुकुट हटाई, तो आँखें उनलोगों की, फ़टी की फ़टी रह गईं । जो लोग वहाँ मौजूद थे,सभी चिल्ला उठे ---दिनेश , यह तुमने अच्छा नहीं किया । एक गरीब लड़की का इतना निर्मम मजाक । दिनेश दौड़ता हुआ आया और उसने भी जो कुछ देखा,उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था । अरे ! यह तो 80 साल का एक बूढ़ा है; यह सब कैसे हुआ ? जरूर कोई धोखा है ?
गुर्राती हुई नीलम ने कहा-- तो क्या हुआ, इसके पास जमीन है, घर है, गाय है,सालों भर आपकी बहन ,धन, दूध से नहाती रहेगी । उम्र से क्या होता है,आप देखेंगे ,दीदी ,एक साल के बाद माँ भी बनेगी ।
दिनेश का गुस्सा सातवें आसमान पर था, सो उसने कह दिया---- मैं इस शादी को नहीं मानता, मेरी बहन इसके घर नहीं जायेगी । मैं अच्छा लड़का ढ़ूँढ़कर शादी दूँगा । मैं समझ गया---तू, एक नागिन है, तेरा काटा पानी तक नहीं माँगेगा । भगवान तुमको कभी माफ़ नहीं करेगा और अगर उसने किया भी तो, मैं माफ़ नहीं करूँगा ।
नीलम, दिनेश का बाँह पकड़ती हुई,आप खामखा गुस्सा कर रहे हैं । आप बैठिये, मैं आपको सब बताती हूँ । दिनेश---अब तुम मुझे क्या बताओगी ? मेरी बहन के मांग में सिंदूर नहीं ,तुमने राख दिलवा दिया । यह शादी नहीं, धोखा है ; धोखा । तभी विद्या ,दुल्हन के कपड़े में ,दिनेश के पास आकर, खड़ी हो गई । दिनेश पाँव से सर तक बहन की दुर्दशा को अपनी सरसरी निगाह से देखकर ,आँखें झुका लिया और कपस-कपस कर कहा---दीदी ! तुम्हारे साथ धोखा हुआ है; लेकिन भगवान साक्षी है, मैंने नहीं किया है, यह सब नीलम का खेल है ।
विद्या---गम की हँसी होठों पर लाती हुई कही --- यह मेरे तकदीर का खेल है; यही बात ,मैं माँ को भी समझाकर आ रही हूँ । भाभी ने कुछ नहीं किया,लेकिन अब जो होने का, हो चुका । अब तुम तथा भाभी चलकर हँसी –खुशी से मुझे विदा कर दो कि मैं अपने पति के घर जा सकूँ । उनकी तबीयत ठीक नहीं है, दिन चढ़ता जा रहा है, गर्मी बढ़ती जा रही है ; जो उनके लिये ठीक नहीं होगा । दिनेश, विद्या के मुँह की ओर टकटकी लगाये उसकी बातों को सुने जा रहा था और अपनी पत्नी को कोसे भी जा रहा था ।
ने रखा और ,कहा--- देरी होने से, गाँव पहुँचने में रात हो जायगी । आजकल रास्ते में चोर-उचक्के भी कम परेशानी नहीं करते हैं । आये दिन हमलोग, छोटी पुलिया के पास लूट-पाट की खबर सुनते रहते हैं । इसलिए अच्छा होगा कि हमलोग शाम ढ़लने के पहले गाँव पहुँच जायें । नीलम ने भी हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा ---- आप ठीक कहते हैं ,हमलोग २ बजे तक आपलोगों को विदा कर देंगे । ठीक २ बजे विद्या को बिदा कर दिया गया । विद्या बिना आँसू गिराये,दुल्हन के कपड़े में घर के बड़े बुजुर्गों के पाँव छुई और दहलेज से बाहर, जहाँ उसका पति बैठा था, वहाँ जाकर खड़ी हो गई । मानो कह रही हो,देर किस बात की, लो मैं मन-तन लेकर तुम्हारे साथ चलने आ गई हूँ ।
दिनेश खड़ा-खड़ा, यह सब देखता रहा,और मन ही मन ,माफ़ करने की भी गुहार
लगाता रहा । विद्या दीदी चली गई अपने घर, कहता हुआ फ़फ़क-फ़फ़क कर रोने लगा । वहाँ खड़े लोगों ने उसे चुप कराया ; समझाया; जो होने का,वह तो हो गया । अब तुम्हारे रोने से उसकी तकदीर नहीं बदलने वाली; इसलिए रोना छोड़कर वह खुशी कैसे रहे, इसकी सोचो । दिनेश ,जैसे-तैसे खुद को संभाला, और तय किया --- उनलोगों को ज्यादा से ज्यादा अपने पास ही रखने की कोशिश करूँगा ,जिससे उसका मन लगा रहे । उधर विद्या सब कुछ समझ चुकी थी---- अगर दिनेश की इच्छा ऐसी शादी की नहीं थी ,तो उसने शादी को रोका क्यों नहीं । शादी के बाद ,उसका रोना, एक दिखाबा है । मेरी तकदीर में अगर जवानी में विधवा होना लिखा है, तो मैं क्या कर सकती । मैं तो यही मान लूँगी, सब मेरी कर्म का फ़ल है; जरूर उस जनम में, मैं बुरी औरत रही होऊँगी, तभी आज उसका फ़ल मिला है । इससे भाग कर मैं कहीं नहीं जाऊँगी । सब कुछ मैं यहीं रहकर सहूँगी । मेरे पति उम्र से बूढ़े भले ही हैं, मगर कोई बीमारी तो नहीं है । फ़िर ये दश बीघे जमीन के मालिक हैं । घर का खाना-पीना,किस चीज की कमी है,जो मैं रोऊँ, या नैहर जाने की सोचूँ । खुशियाँ केवल महलों में नहीं पलतीं , पेड़ के नीचे रहने वालों के पास भी होती हैं ।
धीरे-धीरे विद्या सब कुछ मान ली,और पति को इतना प्यार करने लगी; जैसे बता रही हो, मैं तुम्हारे बगैर नहीं जी सकती , इसलिए तुमको मेरे लिए जीना होगा । लेकिन वह भूल गई,जिंदगी के चार दिन में से साढ़े तीन दिन उसके पति गुजार चुके हैं, बाकी है ,आधा दिन ,जो पूरे स्वप्न सजाने नहीं देगा और वही हुआ जिस बात से विद्या जानकर भी अनजान बनी हुई थी । उसके पति की तबीयत खराब रहने लगी, कभी बुखार,कभी खाँसी ; कमजोरी इतनी कि बिना विद्या के सहारे करवट भी नहीं फ़ेर सकते । विद्या के पति बीमार हैं; खबर जब दिनेश को और विद्या के माँ-बाप को मिली, तो मानो सर पर पहाड़ ही गिर गया । विद्या की माँ, पछाड़ खाकर गिर गई । बस एक ही रट, बेटी, एक साल भी पति का सुख न भोग सकी । जिसने भी तेरे साथ ऐसा किया, उसे भगवान माफ़ नहीं करेगा । यहां विचार तेरा किसी ने नहीं किया ; विचार ऊपर वाला करेगा । विद्या का पिता, पत्नी से विद्या को अपने पास बुला लेने की बात बोला; तो पास खड़ी नीलम, गुस्से में आ गई । उसने अपनी सास को समझाते हुए कहा---माँ जी, दुख और सुख औरत को अपने घर सहना ठीक होता है; जितना भी हो,यह घर अब दीदी का नहीं है । दीदी का घर तो वह है ,जहाँ वो रहती हैं । इसलिए यहाँ लाने की बात आपलोग न करिये । फ़िर उनको जाल-जमीन है, कौन देखेगा ? लोग लूट लेंगे । सुनी हूँ, उनका दो महीने से पाँव भारी है ,कल उनके बच्चे को आपलोग कैसे संभालेंगे ? चुपचाप सुनती जा रही, विद्या की माँ , अपने पति की ओर देखती हुई कही --- हाँ, यह बात भी ठीक है । यहाँ लाना ठीक नहीं होगा । इतना ही है ,तो तुम एक बार उसे देख आना कि वह किस हाल में है ।
विद्या के पिता, बेटी के घर रवाना होने से पहले , सभी देवी-देवताओं को प्रणाम कर, आह्वान कर कहा---हे ईश्वर ! मैं जब वहाँ पहुँचूँ ,तो देखूँ, वहाँ सब ठीक है; अन्यथा इस बुढ़ापे में , मैं टूटकर बिखर जाऊँगा । पिता ( वीरेन्द्र) के आने की खबर पाकर विद्या पहले तो खुश हुई, लेकिन फ़ौरन स्वाभाविक होते हुए ,पिता को पैर छूकर प्रणाम की और पूछा---अचानक कैसे आना हुआ ? पहले से कोई खबर नहीं, अचानक, घर पर सब कुछ ठीक है तो, लीजिये पानी,पैर धोइये । मैं आपके लिए कुछ जलपान लेकर आती हूँ । विद्या बोलकर आँगन की तरफ़ जाने के लिए मुड़ी ही थी, कि पिता ने रोकते हुए कहा--- विद्या, मैं तो जामाई के बीमार होने की खबर पाकर यहाँ दौड़ा आया हूँ । चाय –बाय छोड़ो बेटा, बल्कि मुझे यह बताओ, वो कैसे हैं, क्या तबीयत ठीक हुई ? विद्या (मन ही मन मुस्कुराती हुई, जैसे कुछ हुआ ही नहीं या हुआ भी तो )--- आपलोग क्यों चिंतित हैं, यह सब तो शादी देने के पहले सोचना था, न कि शादी के बाद । यही तो आपलोगों ने चाहा था, कहकर चाय बनाने चली गई । ठीक दश मिनट भी न हुआ कि कीचन से पति के कराहने की आवाज सुनी । चाय छोड़कर दौड़ती हुई पति के पास पहुँची; जो उसने देखा, उसके पाँव के नीचे से जमीन खिसक गई । उसके पति की आँखें बंद थीं और कराह रहे थे । जब तक विद्या आकर ,अपने पिता से कहती,कि चलो पापा, चलकर अपने जामाई को देख लो ,फ़िर कभी नहीं देख पाओगे । वह दौड़ती हुई ,पिता से कहने आ ही रही थी,कि पति की अंतिम साँस एक हाय के साथ टूट गई । विद्या उल्टे पाँव ,पति के कमरे में गई , बोली--- बस , इसी दिन के लिए मेरी मांग में सिंदूर भरे थे आप । साल भर भी न साथ निभा सके और चल दिये । अग्नि के सात फ़ेरे लेते वख्त की वादे-कसमें, सब झूठे थे आपके । आपने कहा था ---अब जीना-मरना, दोनों तुम्हारे साथ है, तुमसे बिना कहे ,मैं और बात तो छोड़ो,मरूँगा भी नहीं ; लेकिन आज बिना कहे चल दिये । कुछ देर ,पति की छाती पर अपना सर रखकर. बिलखती रही; फ़िर उठी, अपनी चूड़ियों को तोड़ी, मांग धोई; आँख का आँसू पोछी और दौड़ती हुई अपने पिता के पास (जो बाहर बंगले में बैठे हुए थे) गई; कही --- पिताजी, चाय बनाने में थोड़ी देर होगी, तब तक आप चलिये, अपने जामाई से मिल लीजिये । पिता( वीरूराम) पीछे-पीछे, विद्या आगे-आगे, जब जब कमरे के पास पहुँची,बोली--- वे भीतर सो रहे हैं,आप उन्हें जगा दीजिये और बातें कीजिये । मैं चाय लेकर आती हूँ ; बोलकर विद्या कमरे के बाहर निकली,मगर, कीचन तक पहुँच भी न सकी । पछाड़ खाकर गिर गई ।
इधर वीरेन्द्र जी ने अपने जामाई (सूरज) को ,नाम लेकर बुलाते हुए,जगाने की कोशिश करने लगे, जब बहुत बार आवाज लगाने के बावजूद, सूरज कोई जवाब न दिये, तो वे आगे बढ़कर,उनके सर पर अपना हाथ बुलाते हुए बोले--- बहुत गहरी नींद में हैं । शाम ढ़ल आई, उठ जाइये । मैं आप से ही मिलने आया हूँ, मुझे लौटना भी है । घर पहुँचने में रात हो जायगी ; लेकिन इसके बावजूद जब सूरज आँखें नहीं खोला,तब उसको हाथ पकड़कर हिलाया । पैर छूआ, देखा,ठंढ़ा पर चुका है ; पंक्षी पिंजड़े से उड़ चुका था । वीरेन्द्र बाबू ,अपने सर और छाती को पीटते हुए बाहर निकलकर विद्या को आवाज लगाने लगे । लेकिन जब उधर से भी कोई जवाब नहीं मिला,तब बाहर आँगन की ओर लपके । देखा,विद्या धरती पर गिरी बेहोश पड़ी है । हाथ में ना चूड़ियाँ हैं,न माँग में सिंदूर, वीरेन्द्र बाबू समझ गये ; यह सब उनके पहुँचने के पह्ले ही घट चुकी है । उसे समझ में नहीं आ रहा था कि आगे क्या होगा ? फ़िर अपने को संभालते हुए ग्लास में पानी लेकर विद्या के मुँह पर छींटे मारे, जब विद्या की आँखें खुलीं,उसे होश आया । देखी उसके पिता, सामने खड़े रो रहे हैं,विद्या उठकर खड़ी हुई , बोली --- पिताजी, अब आगे मुझे क्या करना चाहिये; बोल देते क्योंकि मैने आपके घर रहते हुए यह सब देखी नहीं थी । पिता वीरेन्द्र ,रोते हुए बेटी को गले लगाकर,सूरज के कमरे में ले गये और बोले --- बेटा ! जो होना था, हो गया ; होनी को कोई टाल नहीं सकता । दुनिया में जो आया,उसे जाना है ; बस कोई आज,कोई कल जायेगा । विद्या, पिता के मुँह की तरफ़ देखती हुई बोली---पिताजी, जो आज जाने के लिये लाइन में खड़े थे, उनके हाथ में मेरी जिंदगी की डोर क्यों थमा दिया ?
पिता (वीरेन्द्र) के पास इसका कोई जवाब नहीं था ; इसलिए बस इतना कहकर कमरे से निकल गये ----अब इनके अंतिम संस्कार की तैयारी करनी होगी ।
कुछ देर बाद, पास-पड़ोस के सभी लोग जमा हुए । अरथी सजाकर तैयार की गई; लाल चादर ओढ़ाया गया और राम-नाम सत्य है के नारे के साथ सूरज के देहावशेष को लेकर लोग श्मशान चले गये । अंतिम संस्कार कर जब पिता, विद्या के घर लौटे, देखा विद्या अकेली ,एक अंधेरे कोने में बैठकर, सिसक-सिसक कर रो रही है । कोई चुप कराने वाला भी नहीं था, यह सब देखकर पिता का कलेजा फ़ट गया । उसने धीरे से बेटी को आवाज देते हुए कहा---बेटा , उठो ; जिंदगी लम्बी है, उसके बाद उसकी अमानत ,जो तुम्हारे कोख में पल रही है, उसकी सोचो । तुमको अब ,इस दुनिया में उसके लिए जीना होगा । बेटा, हर रात की सुबह होती है, इसे मत भूलो, और उठो, चलो मेरे साथ, अपनी माँ के पास । वहाँ पाँच लोगों के बीच रहोगी, तो जी बहलता रहेगा ; यहाँ अकेले-अकेले यही सब सोचती रहोगी ,इससे आने वाला तुम्हारा संतान भी अस्वस्थ जीयेगा ।
इधर पिता को सारी रात वापस नहीं लौटने पर दिनेश चिंतित हो उठा । उसने माँ से यह कहकर कि पिता जी को रात में ही खबर लेकर लौट आना था, लौटे नहीं । इसलिए मैं दीदी के ससुराल पिताजी को ढ़ूँढ़ने जा रहा हूँ ; पता नहीं क्या बात है ? माँ ने भी दिनेश की बातों में हाँ से हाँ मिलाती हुई बोली—हाँ,बेटा, मैं इसी चिंता में रात भर सोई नहीं । तुम अभी चले जाओ,जिससे शाम ढ़लने के पहले घर वापस लौटकर आ सको । दिनेश जल्दी-जल्दी तैयार होकर विद्या के घर जाने निकल पड़ा; रास्ते भर चिंतित रहा, सोचता रहा---पिताजी को तो कल शाम ही लौट आना था । आखिर क्या मजबूरी हो आई, जो उन्हें रूकना पड़ा । रूकने का प्रोग्राम तो था नहीं, अगर होता ,तो अपने कुछ कपड़े वगैरह तो ले लेते । जरूर कुछ अनहोनी हुई है,क्योंकि जीजाजी बीमार है । उम्र भी लगभग 80 है, स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता है ; कमजोर इतना, कि शादी के दौरान देखनेवालों के आँखों से आँसू निकल पड़े थे, जब वे शादी में रस्म के दौड़ान बेहोश होकर गिर पड़े थे । फ़िर मन ही मन दिनेश खुद को धिक्कारते हुए, कहा---मैं कितना नालायक हूँ ,अरे, बीमार तो सभी पड़ते हैं; इसमें किसी अनहोनी का प्रश्न कहाँ से उठता है, कौन होगा जो कभी बीमार नहीं पड़ा । अरे, जिंदगी सुख-दुख को मिलाकर ही तो बनी है; इसलिए थोड़ी हिम्मत से काम लो । चलकर तो देखो, पहले से बुरे स्वप्न क्यों देखते हो ?
दिनेश, सोचता-सोचता विद्या के घर पहुँचा, आवाज लगाई---दीदी,दीदी ! भीतर से आवाज आई, आ जाओ बेटा, अंदर आ जाओ । पिता की आवाज थरथरा रही थी, और दर्द भरी थी, जिसे सुनकर दिनेश समझ गया; आखिर वही हुआ, जिस बात का मुझे डर था । वह काँपता हुआ, आँगन में आया और मौन कोने में बैठे पिता से पूछा--- पिताजी, यह सब कब हुआ,दीदी कहाँ है ? जीजाजी का अंतिम संस्कार का क्या हुआ ?
वीरेन्द्र ने इशारे से कहा--- पहले बैठ जाओ; मैं सब कुछ बताता हूँ ; लेकिन एक वचन दो, दीदी के पास जाकर तुम रोना नहीं ; अन्यथा वह अभागन रोते-रोते मर जायगी । बड़ी मुश्किल से उसे मैंने संभाला है । दिनेश ,पिता की ओर डबडबाई आँखों से देखते हुए बोला ---पिताजी, ये लीजिये ,मैं अपना आँसू पोछ लेता हूँ । अब बताइये, दीदी कहाँ है ?
पिता ने इशारे से कहा---उस घर में, शायद रोते-रोते सो चुकी है । दिनेश, धीरे-धीरे कमरे में गया ; जो कुछ उसने देखा, देखकर पत्थर दिल कलेजा भी चूर-चूर हो जाय । उसने देखा, विद्या अपनी शादी के एलबम में अपने पति के चेहरे को ढ़ूँढ़ रही थी ; जो सर से पाँव तक (उम्र छिपाने के लिए) सिर मुकुट से ढ़ँके हुए था । पन्ने-पन्ने को उलट रही थी,जब कहीं मुँह खुला नहीं मिला,तब सूरज तुम कहाँ हो, बोल-बोलकर रोने लगी । दिनेश खड़ा-खड़ा सब देख रहा था,दौड़कर विद्या को अपनी बाँहों में थामकर,गले से लगा लिया । दोनों भाई-बहन मिलकर तब तक रोते रहे,जब तक उनके पिता (वीरेन्द्र) आकर,दोनों को अलग नहीं किया ।
विद्या की आँखें सूज गई थीं,हल्का बुखार भी था; सो वह ,दिनेश से बोली—भैया, अब दीदी के पास तुम क्यों आये हो ? तुम्हारी दीदी पहले की तरह तुमको उठा नहीं सकेगी । बहुत कमजोर है, भगवान ने दीदी का सहारा भी छीन लिया । किसके बूते कहूँ, उनकी देख-रेख में मैं शीघ्र अच्छी हो जाऊँगी ? मैं अकेला जान, उस पर अनपढ़-गंवार, कैसे जीऊँगी ? पहाड़ सी जिंदगी कैसे कटेगी, उस पर एक और का भार ? दिनेश आश्चर्यचकित होते हुए ,विद्या से पूछ बैठा, और किसका भार तुम्हारे ऊपर है दीदी, बोलो,’मैं तुम्हारे साथ उसे भी संभाल लूँगा,तुम चिंता छोड़ दो । बल्कि सुबह तुम मेरे साथ अपने घर चलो ।’ विद्या, दिनेश की बातों को सुनकर मुस्कुरा उठी; बोली--- भैया अब तो यही मेरा घर है,जो कि आज उजड़ गया । जहाँ तुम रहते हो, पिताजी रहते हैं, वो तो तुम्हारा, और तुम्हारे पिता का घर है । विद्या की बातों में छिपे दर्द को समझ रहा था ; लेकिन चुप था । जब विद्या का बोलना खतम हुआ,तब दिनेश फ़िर से विद्या से अपने साथ चलने का आग्रह किया ; पर विद्या कब मानने वाली थी और मानती भी कैसे, पीहर से मिले जख्म का दर्द तथा उस दर्द से लहू जो टपक रहा था ।
दिनेश,विद्या की मनोदशा को भांपते हुए, अपने घरवालों की तरफ़ से हाथ जोड़कर कहा----जो हो गया,उसे माफ़ करो दीदी ; विद्या को पकड़कर खड़ा किया । पिता रोते हुए, विद्या से पुन: एक बार साथ चलने की विनती करने लगा । भोगने के लिए कुछ भाग्य भी चाहिये, शायद मेरे भाग्य , सुख के दिन ऊपर वाले लिखना भूल गये; तो आपलोग उसके लिखे को कैसे मिटा सकते हैं,लेकिन आगे के लिये मुझे पिता के पास चलना चाहिये । अकेले यहाँ रहना मुश्किल है,जमाना भी पहले सा नहीं रहा । अब तो, औरतों को अकेला, पुरुष जीने कहाँ देते हैं ? विद्या दिनेश की ओर देखती हुई,साथ चलने की हामी भर दी । घर के सभी सामानों को ,जो ले जाने लायक था, विद्या वह सब कुछ अपने साथ ले ली और अपने पिता के घर ,अपनी माँ के साथ रहने अपने गाँव चली आई ।
माँ, भाई, बहनों के बीच विद्या, जल्द ही खुद को संभाल ली ,और तो और जब वह अपने बढ़ते पेट की तरफ़ देखती थी, तो मानो, कुछ हुआ ही नहीं, खुशी से मुस्कुरा उठती थी । बच्चा स्वस्थ और सभी अंगों से कुशल रहे; इसकी चिंता कर विद्या की, माँ उस पर पूरा ध्यान देती थी । इस तरह विद्या के पति को गुजरे दश महीने हो गये, और पति की अमानत को भी पेट में पलते दश महीने हो गये । एक दिन विद्या अपनी माँ से ,पति के साथ गुजारे दिनों की चर्चा शुरू की ही थी कि कराह उठी । माँ जल्दी-जल्दी विद्या को सहारा दी और पूछी ---क्या बात है बेटा , अगर यादें इतना दर्द भरा है ,तो तू क्यों याद करती है । भूल जा कि तेरी जिंदगी में कोई आया था । लेकिन जब विद्या रोते हुए अपने पेट की तरफ़ इशारा की, तब कमला (विद्या की माँ) को समझ में आया,कि दरासल विद्या माँ बनने जा रही है । इसलिए आवाज देकर, नीलम से कही, बहु जल्दी आना, और एक टेम्पू वाले को संग लेते आना । नीलम दौड़ती हुई आई,लेकिन जो कुछ देखी,उसके बाद और कुछ बात नहीं कर, टेम्पू लाने चली गई । विद्या को हास्पीटल ले जाया गया । लगभग, दो घंटे बाद ,विद्या ने एक बेटे को जनम दिया । खबर पाकर ,सभी की खुशी का ठिकाना न रहा । विद्या भी काफ़ी खुश थी । प्रसूति के दो दिन बाद विद्या, अपने नवजात के साथ घर आ गई । बच्चे को पाकर उसके पिता, भाई सभी खुश थे ।
छ: महीने भी न गुजरा, कि विद्या पर एक और मुसीबत आ पड़ी । इस बार था, मूसलाधार बारिश में,पिता का मिट्टी का मकान लगभग पूरी तरह गिर गया । एक कमरा, जो कि रसोई घर से लगा हुआ था, किसी तरह बचा रहा । कमला ने विद्या को बच्चे के साथ, उस कमरे में रहने की व्यवस्था कर दी । घर के बाकी सदस्य, उस पर भी दो महीने बाद ही ठंढ़ का मौसम होगा; अभी तो जैसे-तैसे कट जायेंगे,पर तब क्या होगा ? सोच-विचारकर दिनेश ने तय किया---क्यों न ईंट का चार कमरा बनवा लें ,लोन तो मिल ही जायगा; धीरे-धीरे शोध कर दूँगा । पिता से जब , अपना प्लान बताया, वे भी खुश हो गये, बोले--- मैं भी यही सोच रहा था । लगभग तीन महीने में ,दिनेश का चार कमरा और एक रसोई घर बनकर तैयार हो गया । अब, बारी आई, कौन किधर रहेगा ? नीलम ने कहा--- मैं बिल्कुल किनारे वाले कमरे में रहूँगी; एक में माँ-बाबूजी , और पास के कमरे में दीदी । बाकी बचे एक कमरा, घर का अनाज, वगैरह रखने के लिए रहेगा । सभी खुशी-खुशी रहने चले गये । दिनेश को लोन की रकम थी,इसलिए उसके दरवाजे और खिड़कियों के लिए लकड़ियाँ खरीदना नहीं हो सका । फ़लत: बांस का बेड़ा बनाकर खिड़कियों तथा कमरों के दरवाजे में लगा दिया ।
बातों-बातों में एक दिन यूँ ही निकल पड़ा कि धीरे-धीरे खिड़कियों में ढ़ंग का पल्ला लग जाता; तो अच्छा होता । तभी नीलम बोल पड़ी----आज दीदी के गाँव से एक आदमी आया था । उसने बताया कि दीदी के आम के पेड़ में फ़ल तो बहुत आया था, ;लेकिन लोग बड़ा होने से पहले तोड़कर खा गये । इसलिए , मेरी सलाह है , अगर दीदी को आपत्ति न हो तो,बताऊँ ? कमला, नीलम की ओर देखते हुए ---कुछ अच्छी सलाह हो तो बताओ, इसमें आपत्ति का क्या है ? नीलम ---दीदी यहाँ रहती है,लोग आम को पकने देते नहीं हैं । अर्थात वह पेड़ रहा न रहा बराबर । कमला ने बिना सोचे-समझे तपाक से बोल पड़ी --- हाँ, तो बिल्कुल सही बात है ; लेकिन इससे बचने का उपाय ? नीलम--- इसे दीदी बेच दे तो बेहतर होगा । विद्या,जो कि खड़ी-खड़ी माँ और भाभी के बीच हो रही बातों को बड़े ध्यान से सुन रही थी; उसने भी ,भाभी के सुर से सुर मिलाते हुए ,बेचना ही ठीक होगा । कुछ पैसे आ जायेंगे । नीलम अपने प्लान को चौपट होता देखा, तो विद्या की गोद से उसके बच्चे को अपनी गोद में लेती हुई कही---पैसे तो आते-जाते रहेंगे; अच्छा हो दीदी ,शीतकाल भी आ रहा है,उसके पहले, उस पेड़ को कटवाकर घर की खिड़कियाँ और कीवाड़ बन जाय । तो मेरे इस छोटू को ठंढ़ परेशान नहीं कर सकेगा ।
विद्या अपने बच्चे के प्रति भाभी के उमड़ते प्यार में बह गई और उसने कहा---- वही करो न, यह तो अच्छी प्लानिंग है । इसमें मुझे क्यों आपत्ति होने लगी भला । तीर निशाने पर लगता देख, नीलम मन ही मन भगवान का शुक्रिया अदा की और कही –हाँ, दीदी, तो वही होगा । दूसरे ही दिन,दो आदमियों को काम सौंपा गया । तीसरे दिन ,दोनों ही पेड़ कटकर दरवाजे पर आ गये । मिस्त्री रखा गया; चारो कमरे की खिड़कियाँ और दरवाजे की कीवाड़ बनकर सब जगह फ़िट कर दी गई । पर नीलम के दिमाग का घोड़ा यहीं तक आकर रूकने वाला कब था ? अब उसकी नजर विद्या के घर पर जाकर गड़ गई । बिना ल्पास्टर का घर कब तक चलेगा ? इसे प्लास्टर करना जरूरी था,लेकिन पैसे कहाँ से आयेंगे ? जब-जब विद्या को अपने पास बैठी देखती, तब-तब दीवार को छूकर,बस एक ही रटी आवाज में बोलती, काश कि प्लास्टर हो जाता !
आखिर एक दिन विद्या पूछ बैठी---अच्छा भाभी , प्लास्टर करवाने से तुमको किसने रोका है, करवा लो ।
नीलम (डबडबाई आँखों से छलकते आँसू के साथ) बोली---दीदी, इच्छा तो है,पर पैसे कहाँ हैं ? आपके ससुरालवाला घर भी तो, मिट्टी का है; देखिये किस दिन वह भी बारिश में गिरकर ध्वस्त हो जाये । विद्या---वो तो ठीक है, लेकिन, बचाने का उपाय ?
नीलम--- दीदी, मिट्टी का घर कैसे बचाया जायगा, वह तो आँधी में भी गिरने लगता है । इसका एक ही उपाय है,कि फ़िर से ईंट का बनाया जाय लेकिन बनाकर भी आप करेंगी क्या? वहाँ तो आप रहेंगी नहीं,बल्कि अगर बनाया भी जायगा, तो चोर –उचक्कों का अड्डा बन जायेगा । इसलिए ,कोई खरीदे तो बेच लीजिये ।
विद्या--- हाँ नीलम, तुमने सही कहा; देखो अगर कोई ले तो बेच दूँ । इतना सुनने के बाद अब नीलम को चैन कहाँ था,और उसने घर बेचवा दी ।
बेचकर पैसे विद्या को देती हुई बोली---दीदी ,इसे संभालकर रखीयेगा ।
विद्या--- मैं कहाँ रखूँगी ? एक काम करो ,दिनेश को दे देना, वही जहाँ उचित समझेगा,रख देगा ; कहती हुई नीलम को पैसे लौटा दी । रात दिनेश के आफ़िस से लौटते ही, नीलम सारी घटनाओं को दिनेश से बतलाती हुई पैसे को सुरक्षित रखने की बात कही ।
दिनेश , पैसे को हाथ में लेते हुए---ठीक है देखता हूँ, कहाँ रखना संभव है ; ऐसे तो अभी पैसों की घर में ही अधिक जरूरत थी, प्लास्टर के बिना ,घर का बुरा हाल है ,वर्षा का पानी घुस-घुसकर दीवार को कमजोर बना दे रहा है ; लेकिन पैसे तो दीदी के हैं ।
नीलम--- तो क्या हुआ,दीदी से पूछ लो; दीदी के पैसे बाद में लौटा दिया जायगा । फ़िर दीदी पैसे लेकर करेंगी क्या? हमलोग तो उनके अच्छे-बुरे समय के लिए तो हैं ही ।
दिनेश ,पत्नी की बात को सुनकर, मन ही मन कहा (तुम्हारी बातों में दम है)--- देखता हूँ पूछकर, अगर मना की ,तो छोड़ दूँगा । नीलम --- मना कैसे करेगी ? हमलोग उनको रहने के लिए अपने खर्च से कमरे बनवा दिये हैं । वो प्लास्टर के पैसे देने में मना कर देंगी; करने दो, इस समय तो समझ में आ जायगा कि हमलोग उनको जितना अपना समझते हैं, क्या वे भी समझती हैं ? दिनेश--- बेकार की बातें पहले से क्यों सोचती हो, ऐसा भी तो हो सकता है,कि दीदी खुश हो जाये । इसलिए अच्छा हो कि उनसे एक बार बात किया जाय ।
शाम के बख्त जब माँ-बाबूजी इकट्ठे बैठेंगे, तब बात छेड़ूँगा और ऐसा संयोग रविवार के पहले नहीं होने वाला । नीलम रविवार का इंतजार ,बड़ी व्यग्रता से करने लगी । रविवार आया, सभी एक साथ बैठकर खेती गृहस्थी की बातें कर रहे थे, तभी दिनेश ने मौका देखकर इस बात को रख दिया । पहले तो,दिनेश के माँ-बाप, दोनों ने मना कर दिये । फ़िर कहा---विद्या बेटी से पूछकर देखो । उसने बिना पूछे ही कह दिया ---- पिताजी ! इसमें मुझसे पूछने का सवाल कहाँ उठता है, आपलोग जो भी सोचेंगे, वह मेरे लिए अच्छा ही होगा । इसलिए आप जो चाहें, करें । मेरी देख-रेख करने वाले तो रहे नहीं, जो भी हैं, आपलोग ही हैं ।
वीरेन्द्र ,बेटी की हाँ सुनकर , गदगद हो गये और दिनेश से बोले----तो प्लास्टर करवा लो । एक सप्ताह में चारो कमरे प्लास्टर हो गये । विद्या भी खुश थी, यह सोचकर कि ये लोग रहने के लिए मुझे घर दिये । मैंने उन घरों को प्लास्टर करवा दिया । हिसाब दोनों तरफ़ से बराबर हो गया । चलो, भविष्य के लिए अच्छा ही हुआ । लेकिन विद्या को कहाँ मालूम था; भविष्य को लोग जानते कहाँ ? नीलम जैसे लोग भविष्य के भविष्य को खराब करने में तुली रहती हैं । आज भी वही हुआ, कैसे विद्याके भविष्य को आग के हवाले कर, उसमें हाथ सेंका जाय, जुट गई । रोज दिन की तरह विद्या, अपने नन्हें बच्चे के साथ आँगन में टहल रही थी ।
तभी नीलम ,विद्या के साथ टहलती हुई बोली --- दीदी ! मेरा एक विचार है । विद्या, बड़ी धैर्यता के साथ --- तो दे दो ।
नीलम --- दीदी, इस तरह टहलने से आपका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहेगा । थोड़ा-बहुत घर का काम कर लीजिये ।
विद्या मुस्कुराती हुई ---बच्चे को टहलाना क्या काम नहीं है ? फ़िर घर का काम क्या है; खाना तुम बना ही लेती हो और माँ बाकी काम संभाल लेती है । मुझे फ़ुर्सत कहाँ मिलती है ।
नीलम को विद्या की बात पसन्द नहीं आई, वह झुंझला उठी और अपने कमरे में लौट आई । विद्या को इस प्रकार परेशान देखकर, दिनेश हँसते हुए पूछा---क्या हुआ आज, तुम्हारी कोई प्लानिंग फ़ेल हो गई, क्या; क्योंकि जब तक तुम्हारी कोई प्लानिंग सफ़ल होते रहेंगे, तभी तक तुम चुप बैठने वालों में से नहीं हो; अन्यथा, तुम परेशान हो जाती हो । बोलो---आज का प्लानिंग क्या था ? नीलम--- अनमने ढ़ंग से दिनेश को जब बताई, दिनेश ने कहा---एक काम करो; तुम बच्चे को संभालो, दीदी खाना बनायेगी । नीलम तपाक से बोल पड़ी---नहीं कभी नहीं, ऐसा नहीं हो सकता ; जिसका बच्चा है, वह संभालेगी । अभी ससुराल में होती तो क्या खाना बनाकर नहीं खाती ; नौकर खाना बनाकर देता । दिनेश को नीलम से इस कदर की बातों की उम्मीद नहीं थी, उसने कमरे से बाहर निकल जाने में ही भलाई समझा । पर नीलम को पति के नाराज होने का असर कहाँ पड़ने वाला था , इसलिए बता दी—खाना नहीं बनायेगी,तो खाना नहीं मिलेगा । एक तो जिंदगी भर के लिए सर पर आकर बैठ गई ; उस पर नबाब की पत्नी बनती है ।
नीलम का उतरा-उतरा व्यवहार, और बातों की बेरुखी ,विद्या को समझने में देर नहीं लगी,लेकिन उसने भी सोच लिया ,’ घर—खेती—बागीचा,सब बेचकर मैंने इस घर को पूरा करवाया है , उसके बाद इसने एक कमरा रहने के लिए दिया । मैं कमरा छोड़ दूँगी ,वशर्ते मेरे पैसे ये लोग लौटा दें । अब तक जो गुस्सा दिल में था, अब नीलम की बातों में भी झलकने लगा । एक दिन विद्या भाई दिनेश को सब कुछ खोलकर बता दी,बोली --- मैं कहीं चली जाउँगी,मेरे पैसे लौता दो । इस पर दिनेश झल्ला उठा, बोला--- पैसे-पैसे, कहाँ से दूँ, सब तो घर में लग गया, घर तोड़ दूँ ? ऐसे भी विवाहिता स्त्री को नैहर में नहीं रहना चाहिये ; उसे सुख-दुख जो भी भाग्य में है, अपने पति के घर भोगना चाहिये ।
दिनेश की बातों को सुनकर विद्या के होश उड़ गये, लेकिन अब उसके बस में कुछ नहीं था । सब कुछ तो पहले ही माँ-बाप—भाई को बेचकर दे चुकी थी । वह बिना कुछ किसी से बताये,अपने नन्हे बच्चे को गोद में लेकर घर से निकल गई । आज भी वहीं है, दूसरों के खेत में काम कर दिन गुजारती है । मालिक का भला हो, जो उसने बगल के एक स्कूल में बच्चे को पढ़ने की व्यवस्था करवा दी है । मैं जब विद्या से मिली, तो उसने एक राखी अपने झोपड़े से लाकर मुझे देती हुई बोली---कल रक्षा –बंधन है, दिनेश को दे देना । मैंने जब पूछा कि तुम अब क्या कभी गाँव नहीं जाओगी ? उसने कहा ---हाँ, जाऊँगी, मगर अभी नहीं । उसने अपनी आँखों के आँसू अपने मिट्टी लगे आँचल से पोछते हुए बोली----जब मेरा बेटा कुछ बन जायगा । उसकी दर्द भरी बातें ,जो लाखों गम संजोये हुई थीं, मुझे भी रुला दीं । मैं बिना रुके वहाँ से चल दी ; मगर जाते-जाते मैं उससे कह गई----मेरा आशीर्वाद है कि तेरी तपस्या का फ़ूल, एक दिन खिलकर महकेगा,जरूर महकेगा । वह टकटकी निगाह से मुझे जाते हुए निहारती रही ॥

 

 

 

 

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