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अंक: जून २०१७


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आनंद--डॉ० श्रीमती तारा सिंह

 

सुख से अनंत गुना एवं उससे भी परे की सर्वोच्च अवस्था, आनंद है । यह किसी बाहरी उत्तेजना से संबंधित नहीं है, बल्कि आनंद आत्मा से संबंधित एक अनुभूति है , हमारे विचार का एक भाग है, जो हमारी भावनाओं से जुड़ा होता है । यही कारण है, आनंद , मन को मिलने वाले सुख की तुलना में उच्चस्तरीय एवं अधिक सुख का अनुभव देता है । जब हम आत्मा से आनंद अनुभव करते हैं , तब वह सबसे उच्चतर का सुख होता है तथा अनंतकाल तक बना रहता है । इसकी व्याख्या शब्दों में करना नामुमकीन है, इसे तो केवल अनुभव किया जा सकता है । शब्दों की मर्यादा जानने के लिए हम शक्कर की मिठास का उदाहरण देते हैं ; लेकिन जिन्हें जिह्वा नहीं है, उन्हें हम शक्कर जैसे शब्दों के माध्यम से उसके मिठास के बारे में अनुभव नहीं करा सकते । ठीक उसी तरह आनंद को समझाने के लिए उसे अनुभव नहीं करना पड़ता है, जो केवल साधना के माध्यम से संभव है ।
आनंद का तात्पर्य होता है, दैहिक पीड़ा से मुक्ति और आत्मा की शांति पाना, तो क्या इस आनंद सुख का अनुभव पशु भी करते हैं, या सर्वथा मानव जाति का ही गुण-धर्म है । इस बात से बेथिडक्सन सहमत तो हैं, मगर इसे बड़ी ही सतर्कता के साथ कहते हैं कि कुछ लोगों का मानना है, कि सगुणवाद में सुख सहित किसी भी मानवीय अनुभूति को पशुओं की विशेषता नहीं मानना चाहिये , क्योंकि उनमें यह मात्र प्रतिक्रिया के रूप में देखे जाते हैं, इसलिए इस बात की पुष्टि हम नहीं कर सकते, कि पशु आनंद अनुभव करते हैं या नहीं ।
मनुष्य को तीन प्रकार की अनुभूति होती है ---- दुख, सुख और आनंद । सुख और दुख की अनुभूति बाहर से होती है, जैसे मनचाहे फ़ल की प्राप्ति करना सुख और न करना दुख होता है, लेकिन आनंद की अनुभूति बाहर से नहीं होती । कारण , आनंद , सुख नहीं है, बल्कि आनंद , सुख और दुख ,दोनों का अभाव है अर्थात जहाँ सुख और दुख दोनों में से कोई नहीं है । वैसे चित्र की परिपूर्ण शांत स्थिति,आनंद की स्थिति है , अर्थात आनंद का अर्थ है , जहाँ बाहर से सुख-दुख ,कोई भी आंदोलन, हमें प्रभावित नहीं कर रहा । सुख एक संवेदना है, तो दुख भी संवेदना है , दोनों हमें बेचैन करते हैं । दोनों अशांतियाँ हैं, फ़र्क इतना है कि दुख की अशांति अप्रीतिकर और सुख की शांति प्रीतिकर है । दोनों ही समान रूप से उत्तेजित अवस्थाएँ होती हैं; अत्यधिक दुख में उत्तेजित हो लोग मर सकते हैं, तो अत्यधिक सुख भी जानलेवा होता है । मगर, आनंद अनुत्तेजना है, इसमें कोई उत्तेजना नहीं होती । उत्तेजना का अर्थ होता है, अपने से बाहर विराजमान होना, उदाहरण के लिए , झील में जो उठ रही लहरें दीखती हैं, दरअसल वे झील में नहीं उठती हैं । लहरें हवाओं में उठती हैं, और झील, कंपित होती है । लहरों का अर्थ है, झील अपने बाहर किसी चीज से प्रभावित हो रही है, अन्यथा वे शांत रहतीं । ठीक उसी तरह जब हमारा चित्त बाहर से प्रभावित होता है, तब सुख या दुख की लहरें उठती हैं, और जब बाहर से प्रभावित नहीं होता है तब जो स्थिति है, उसी का नाम आनंद है । सुख और दुख छीने जा सकते हैं, लेकिन आनंद कोई नहीं छीन सकता, क्योंकि सुख और दुख बाहर से आये हुए हैं, इसलिए इन्हें छीनना संभव है । मगर आनंद बाहर का अनुभव नहीं, बल्कि अपना अनुभव है; इसलिए सुख-दुख दोनों में कोई भी चिरस्थाई नहीं होता, ये क्षणिक होते हैं । ये दोनों ही मानव –मन के बंधन हैं, लेकिन आनंद मुक्ति है, कारण आनंद मन के चैतन्य में स्थित रहने का नाम है । सुख और दुख किसी न किसी के द्वारा मिलती है, आनंद मिलता नहीं, मौजूद रहता है । स्मरण रहे, पाई हुई या दी हुई चीज कभी स्थायी नहीं होती, लेकिन आनंद पाया नहीं जा सकता, इसलिए खोता भी नहीं है और स्थायी होता है ।
दुख से हर आदमी दूर रहना चाहता है, लेकिन सुख से दूर कोई नहीं रहना चाहता । जो सुख से दूर हटने लगता है या हट जाता है, वही आनंद को अपने पास पाता है । जब तक सुख की आकांक्षा रहती है, तब तक दुख से मुक्ति पाना कठिन है । सुख के पीछे दुख होता है; जो सुख से दूर हटेगा, वह तत्क्षण सुख को पायेगा । जो दुख से मुक्ति पाने की इच्छा लिए जीता है, वह जिंदगी भर दुखी रहता है; इसलिए दुख से मुक्ति पाने का एक ही उपाय है, सुख का त्याग । दुख और सुख दोनों के छूटने के बाद जो शेष रह जाता है, वह आनंद है, जो अनंतकाल तक स्थायी होता है । सुख और दुख दोनों मन और शरीर से रहते हैं ; आनंद का संबंध अंतरात्मा से है । इसकी प्राप्ति नि:स्वार्थ भाव से दूसरों की सहायता, तथा सभी छोटे-बड़े जीवों के साथ स्नेह और दया करने से होती है । परोपकार---यह गुण, आदमी को पशुओं से अलग करता है, प्रकृति के कण-कण में परोपकार की शिक्षा समाई हुई है । नदियाँ, वृक्ष, बादल, सूरज, चाँद, वायु आदि इस चाराचर को बनाये रखने के लिए खुद को बनाये रखे हैं । वृक्ष अपना फ़ल खुद खा लेता, नदियाँ जीवों की प्यास नहीं बुझातीं, बादल धरती पर नहीं बरसता, हवा जिंदा रहने के लिए प्राण-शक्ति नहीं देती , तब आज हमारी यह दुनिया रेत का सागर होती, जहाँ न जीव होता, न फ़ूल खिलते ।
भारत के इतिहास और पुराण में परोपकार के ऐसे कई उदाहरण पढ़ने मिलते हैं, जिन्होंने परोपकार के लिए अपना सर्वस्व दे डाला । उदाहरण के लिए, कहते हैं राजा रतिदेव को जब चालीस दिन के बाद भोजन मिला, तो उन्होंने उस भोजन को खुद न खाकर भूखों को खिला डाली , दधीचि ने देवताओं की रक्षा के लिए अपनी अस्थियाँ दे डाली, शिव समुद्र-मंथन से निकला विष खुद पान कर गये , कर्ण ने अपना कवच-कुंडल याचक बने इन्द्र को दे दिया; इस तरह परोपकार के अनेकों उदाहरण हैं, जिससे व्यक्ति दूसरों का परोपकार कर आनंदित होते हैं । महर्षि व्यास ने कहा है, परोपकार ही पुण्य है, और दूसरों को सताना पाप है । परोपकार से बढ़कर कोई धर्म नहीं होता ,जब व्यक्ति मन, वचन, और कर्म द्वारा नि:स्वार्थ परोपकार करता है । गीता में भगवान कृष्ण ने अर्जुन से कहा है--- जो शुभ काम करते हैं, वे मरकर भी नहीं मिटते : युगों-युगों तक जिंदा रहते हैं । चाणक्य ने कहा है---- परोपकार ही जीवन है, जिस शरीर से धर्म नहीं हुआ, परोपकार नहीं हुआ, वह शरीर किस काम का । एपिकुरुस और उनके अनुयायियों के अनुसार ---- सर्वोत्तम आनंद, पीड़ा की अनुपस्थिति है । आनंद का अर्थ है, दैहिक पीड़ा से मुक्ति एवं आत्मा की अशांति से मुक्ति । इसलिए आनंद की अनुभूति बाहर से नहीं होती , बल्कि हृदय के भीतर चैतन्य में स्थित है, सिर्फ़ इसे ढ़ूँढ़ने की जरूरत है ।

 

 

 

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