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अंक: दिसम्बर २०१७


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सुख का सौदागर----डॉ० श्रीमती तारा सिंह

 

छोटी-छोटी पहाडियों से घिरा नीमका गाँव, और गाँव के बीचो -बीच नदी का रूप लेकर बहता ,पहाडियों की तलहटी से कल-कलकर निकलता , कलनाद करता, पानी सदियों से गाँव के लोगों की प्यास बुझाता आ रहा है | लहलहाते खेत, खिला-खिलाते बच्चे , सब के सब इस नदी की देन है , वरना यहाँ के लोग इतने सुखी-सम्पन्न नहीं होते | यही कारण है कि , गाँव वाले इस नदी को भगवान का साक्षात रूप मानकर इसकी पूजा करते हैं | हर चतुर्मासी को यहाँ मेला लगता है | बड़ा ही रमणीय जगह है यह गाँव ; नदी तट के दोनों किनारों को जकड़े ,खड़े, रंग-विरंगे खुशबूदार जंगली फूलों की कतारें , गाँव को अपने सौरभ से चौबीसों घंटे नहलाती रहती हैं | शाम के बख्त तो यहाँ का दृश्य देखते बनता है , जब संध्या अपना रंगीला पट, पहाड़ियों पर फैला देती है , और ऊपर आकाश में विहंग पंक्तियाँ बाँधकर कलरव करते अपने घोसले को लौट रहे होते हैं , तब उनके कोमल परों की लहर के झोकेदार समीर से, नदी के पानी में तरंगें उत्पन्न होती हैं , जिससे दोनों किनारे खड़े खुशबूदार फूल गाँव पर और अधिक सौरभ लुटाते हैं | मगर , जब रात की काली चादर , इनको पूरी तरह ढक लेती है ; दिन का यह लुभावना दृश्य तब भयावह रूप ले लेती है | ये सभी काले दैत्य समान खड़े दिखाई पड़ते हैं , मानो गाँव को जब कभी निगल लेंगे; ज्यों पृथ्वी की तरह धैर्यवान ‘मालती’ को निर्मम नियति निगल गई | जब तक जीवित रही , उसका जीवन दीप ऊपर की ओर जाने के लिए तड़फडाता रहा | अपनों की ठोकरें उसके शांति-संपन्न ह्रदय को विक्षिप्त बना दिया था | उसके मानसिक विप्लवों में किसी ने उसकी सहायता नहीं की | उसकी शारीरिक चेतना , मानसिक अनुभूति से मिलकर जब भी उत्तेजित हुई ,उसने अपने ह्रदय-द्रव्य को आँखों की निर्झरिणी बनाकर धीरे-धीरे बहा दिया |
रात के अँधेरे में जब भी उसकी आँखें कुछ ढूढती थी, तब उसे घर के पिछवाड़े के नदी-जल में भसता हुआ, अपना ही प्रतिबिंब दीख रहा प्रतीत होता था , जिसे देख वह सहम जाती थी | उसकी उखड़ी -उखड़ी मनोस्थिति को समझने की किसी ने कोशिश नहीं किया, कोई नहीं सोचा , उसे पेट भर अनाज के सिवा और भी कुछ चाहिए | वह एक गृहस्थ लड़की थी, मगर खुद उसके जन्मदाता ने उसकी गृहस्थी को अपने सुख की खातिर उजाड़ दिया | शादी के बाद उसके माता-पिता , उसे पति के साथ जाने नहीं दिये , यह कहकर कि, कुछ दिन हमारे साथ रहने दीजिये | अचानक उसका दूर जाना , हमलोग सह नहीं सकेंगे |
दिन भर छाती फाड़कर माँ, सुनयना उससे काम लेती थी , और जब रात वह सोने के लिए विस्तार पर जाती थी कि माँ ‘सुनयना’ कराहने लगती थी | माँ का कराहना सुनकर मालती ,एक नव -दीक्षिता , धर्मपरायण मनुष्य की तरह दौड़ती हुई , माँ के पास जाकर पूछती थी --- माँ तुमको क्या हुआ, तुम क्यों कराह रही हो ? सुनयना (मालती की माँ) , अपनी बातों में मिश्री घोलकर, मगर बड़ी ही कठोरता से कहती थी --- ‘मालती’ बेटा ! निगोड़ा घुटने का यह रोग अब साथ ही जायगा | जा तू ,जाकर सो जा, रात के दश बज चुके हैं ; सुबह तुम्हारे पिताजी को शहर जाना है, उनका खाना-टिफिन भी जल्दी चाहिए | तब मालती, बड़ी ही संयमित हो उत्तर में कहती थी---- माँ, तुमको कराहती छोड़ भला मैं कैसे सो सकती हूँ ? तुम चौबीसों घंटे दर्द से कराहती रहती हो, क्यों नहीं डॉक्टर दिखा लेती हो | हो सकता है , दवा से ठीक हो जाय , मालिश से तो जाने से रहा, तब सुनयना, मालती की आत्मा को भेदने के लिए कहती थी --- बेटी ! कभी तुझे गोद में उठाकर इसी पैर पर , दो मील दूर तुझे स्कूल छोड़ने जाया करती थी | सदा से यह पैर ऐसा नहीं था , यह तो बीते दश सालों से ऐसा हुआ है | सुनकर, माँ के प्रति मालती का प्यार और बढ़ जाता था | उसके अंग-अंग में वात्सल्य फूट पड़ता था ; ऐसे पुलक उठता था, कि वह माँ के चरणों को अपने माथे से लगाकर कहती थी---‘माँ , तुम बुरा मान गई ? माँ ! मेरे सीने में जो ये साँसें चल रही हैं , यह तुम्हारा ही तो दिया है | मेरे इन साँसों पर तुम्हारा और सिर्फ तुम्हारा अधिकार है | उत्तर में सुनयना कहती थी ---- बेटा ! मैं भी तो आज दश वर्षों से तुम्हारी ही सेवा-सुश्रुषा की बदौलत जिन्दी हूँ | तू जो ससुराल , अपने पति के साथ चली गई होती, तो मैं कब की मरी होती | माँ की मीठी बोली और अपनत्व पाकर मालती, अनुराग की मूर्ति बनी बैठी , माँ का पैर दबाती रहती, तब तक , जब तक कि सुनयना सो नहीं जाती थी | इस तरह वह मातृसेवा को अपने जीवन-तप का वरदान समझने लगी थी |
संध्या ढल रही थी ,सूर्य भगवान किसी हारे सिपाही की तरह मस्तक झुकाये कोई आड़ खोज रहे थे | प्रकाश , अंधकार के पाँव तले कुचलता जा रहा था ; सहसा किसी के पैर की आहट पाकर वह चौक गई, मुड़कर देखी तो देखा --- दरवाजे पर , आम के पेड़ के ऊपर सिमटकर बैठे तोते पर कोई पत्थर मार रहा है और वह तोता हिलने का नाम नहीं ले रहा | वह दौड़कर पेड़ के पास गई, और उस पत्थर मारने वाले से कही ---- इस निरीह पक्षी को पत्थर क्यों मार रहे हैं आप, रात के बख्त ये कहाँ जायेंगे ? नीचे उतरते ही इन्हें कुत्ते-बिल्लियाँ मार डालेंगे , इन पर दया कीजिये | सहस्त्रों बार ये शब्द मालती के मुख से निकले, पर मालती का धार्मिक भाव उस आदमी के अंत:करण को स्पर्श नहीं कर सका | जैसे बाजे से राग निकलता है, उसी प्रकार मालती के मुँह से यह बोल निकलता रहा | मगर सब निरर्थक , प्रभावशून्य, उस पर कोई असर नहीं पड़ा | वह आदमी पत्थर मारता ही रहा, तब तक, जब तक कि तोता, डाली छोड़कर उड़ नहीं गया | यह सब देखकर मालती की आँखें डबडबा आईं | यूँ तो ऋषि-मुनियों के जितने गुण हैं, वे सभी मालती में कूट-कूटकर भरे हुए थे, पर इन्हीं गुणों के चलते लोग उसे बेवकूफ भी समझते थे | लोग कहते थे, यह लड़की अर्ध-पागल है, ससुराल न जाकर माँ-बाप का घर चुनी ? लेकिन ऐसा कोई नहीं सोचता कि ऐसी सोच के लिए , मालती नहीं बल्कि उसका अशिक्षित होना है, जिसके कारण वह अपने स्वाभाविक जीवन-तत्व के सिद्धांतों की अवहेलना कर चुपचाप सजीवता विहीन जीव की तरह जिन्दी रहती है | पिता जरूरत से ज्यादा तुनुक-मिजाजी थे | उनका कहना था---- अपना-अपना दृष्टिकोण है, पति के पीछे-पीछे पालतू जीव बनकर चलना, यह भी कोई जिंदगी है, हमारे पास है, तो आजाद है | इसका बच्चा भी अंग्रेजी स्कूल में पढ़ता है, वहाँ उस चंठ के पास जाकर क्या करेगी , जिसे उठने-बैठने तक का अक्ल नहीं है | लेकिन वे भूल गये कि , फुल से नाजुक,औरत का ह्रदय होता है, मगर उसमें अपने माता-पिता के सामने अपने भावों को व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं होते | वह यह नहीं बता सकती कि कौन सी कमी का काँटा उसके ह्रदय को घायल कर रहा है | मालती भी गुमानी घरवालों की ऐसी-ऐसी बातें सुनकर , पति से द्वेष करने लगी थी | मालती का अपना कोई घर नहीं था, माँ-बाप के घर का हित-अनहित ही उसके लिए प्रधान था | वह भी अपने घरवालों की आँखों से ही अपनी समस्या को देखने लगी थी |
एक दिन तालाब में स्नान करते , मालती ने देखा --- उसका पेट बड़ा हो रहा है | वह स्नान कर जब घर आई , अपनी माँ, सुनयना से कहा ---- माँ ,मैं दुबारा माँ बनने जा रही हूँ | सुनते ही सुनयना का मुँह सूख गया | वह चकरा गई, लेकिन वह बड़ी ही वाक्य निपुणा औरत थी , उसे मालती जैसी गंवार से ऐसी आशा नहीं थी, क्योंकि वह बार-बार चेता चुकी थी, ‘ मालती’, दूसरा बच्चा घातक होगा , इससे सतर्क रहना |
मालती आँखें नीची कर सहमती हुई बोली--- मैं क्या करूँ , वे तो मानते ही नहीं हैं |
यह सुनकर सुनयना का धैर्य टूट गया, उसने आँखें तरेरकर कहा ----- पति का कहा मानना, पत्नी का धर्म होता है , लेकिन यहाँ तो तुम धर्म के रूप में , पति के भय की उपासना कर रही हो | तुम इतना डरती क्यों हो, तुम उसकी क्रीतदासी तो नहीं है ; तुम्हारे गृहिणीत्व का अधिकार केवल तुम्हारा पदस्खलन ही छीन सकता है , जो कि कभी संभव नहीं है |
मालती के पिता, तोडलमल ने भी पत्नी की बात का समर्थन करते हुए कहा--- क्यों मालती बेटा , तुम्हें भी यही मंजूर है ?
सुनयना, खिसियाती हुई बोली--- अभी क्या बिगड़ा है, चाहे तो इसे नष्ट कर आजाद हो सकती है ; जामाई को काम नहीं , चाम प्यारा है | इसको कुछ होने पर दूसरा ब्याह कर लेगा ; उसका क्या जाता है , जाएगा तो हमलोगों का !
मालती में धैर्य की कमी नहीं थी , इस कान से सुनकर , उस कान से उड़ा देना , उसका स्वभाव बन चुका था | मगर, ऐसी ज्ञान -मुरीदी बेटी , उसके माता-पिता को पसंद नहीं था , इसलिए क्रोधित हो सुनयना बोली --- जो मर्जी करो | मेरे भाग्य में चैन से जीना नहीं लिखा है, तो उसमें तुम्हारा क्या दोष ? आज मुझे समझ में आ रहा है , कि वह कौन सा मनहूस क्षण था, जब मैंने तुझे अपने पास रखने का निर्णय लिया और अपना सर ओखली में दे दिया |
मालती झुंझलाकर बोली--- आपलोग क्यों मेरे पीछे पड़े हुए हैं ; आपलोग अपनी-अपनी फ़िक्र कीजिये | मुझे छोड़ दीजिये ; अगर तकदीर में मरना ही लिखा होगा, तो मर जाऊँगी |
थोड़ी देर बाद माता-पिता के मन की ज्वाला तो शांत हुई , मगर ह्रदय की आग धधकते रही ; क्योंकि उन दोनों के हाथ से तोते जो उड़ गए थे | किसी तरह का दाँव-पेंच काम जो नहीं आ रहा था | वे लोग सच पर विश्वास जताकर, मालती के बच्चे को नष्ट कराना चाहते थे | इस विवाद में दश महीने गुजर गए | एक दिन पिता टोडरमल चारपाई पर लेता हुआ था, माँ सुनयना , उन्हें मालती चालीसा सुना रही थी, तभी मालती का बेटा दौड़ता हुआ आया और बताया--- नानी ! माँ रो रही है , दोनों पति-पत्नी दौड़कर मालती के पास पहुंचे | देखे ---मालती दर्द से कराह रही है , बिना देरी किये वे लोग गाँव के एक वैद्य को बुला लाये , काफी उपचार के बाद भी मालती का कराहना बंद नहीं हुआ और वह बेहोशी कि हालत में चली गई, हाथ-पानव ठंढे पड़ने लगे | वैद्य ने देखा, कहा----मालती की हालत गंभीर बन आई है | सुनकर दोनों पति-पत्नी सर पटक-पटककर रोने लगे | रोने की आवाज सुनकर आस-पड़ोस के लोग दौड़कर जमा हो गए | सभी अचम्भित और हैरान थे, यह देखकर कि जब पहला बच्चा ऑपरेशन से हुआ, तब दूसरे बच्चे में ये लोग मालती को शहर के अस्पताल क्यों नहीं ले गए इसलिए कि वहाँ पैसे खर्च करने होंगे | एक नवसिखवा वैद्यके हवाले कर,उसके मरने का इंतज़ार करते रहे | इनलोगों ने मालती को जान-बूझकर मार दिया | किसी ने कहा ---- मालती के माँ-बाप की आंखें कितनी भी रोयें , दिल के दोनों ही पिशाच हैं | ये लोग अब तक बेटी के पैसे पर अपने पेट पाल रहे थे, जो पाप है ; कोई कहता --- मुफ्त की नौकरानी मिल गई थी | कोई कहता---यह बात कौन नहीं जानता ,कि इन दोनों पति-पत्नी का , पैसों से रिश्ता , कुत्ते और मांस के टुकड़े जैसा है |

 

 

 

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