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mar 2017
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अंक: दिसम्बर २०१७

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“माँ गांव चलो”-----कश्मीर सिंह    

 

 

माँ मुझे मेरे

गांव ले चलो

अपने उसी घर

जहां मैं खुश था।

उसी पाठशाला में पढ़ाओ

जहां थे गांव के ही

भोले-भाले बाकी बच्चे।



माँ वहां तुम्हारा वक्त

मेरी देखरेख में

ज्यादा नहीं बीतता था।



माँ इस शहर में

बहुत तंग गलियां हैं

बहुत ऊँचे मकान हैं

कहने को लोग

शहरी हैं; सभ्य हंै

व्यावहारिकता में संवेदनहीन हैं।



माँ हम गांव के हैं

गांव के लिए हैं

गांव ही तो

शहर का पेट पालता है।



तुम मुझे क्या सिखाने

क्या पढ़ाने यहां ले आई

मेरा बचपन गांव में पलने दो

फिर मैं शहर और गांव

दोनों संभाल लूंगा।

 

कश्मीर सिंह

 

 

 

 

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