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न्यायिक सेवा सुधार-एम.वाई. सिद्दीकी

 

देश भर के हाईकोर्ट में कुल जजों के सृजित पदों की संख्या 1044 है, 443 पद हैं खाली
निचली अदालतों में 20358 न्यायिक पदाधिकारियों, जजों के हैं पद सृजित, 4998 पद रिक्त
न्याय नहीं मिल पाने की राह में सबसे बड़ा रोड़ा हैं न्याय बेंच और वकीलों की सांठगांठ

 

 

एम.वाई. सिद्दीकी
पूर्व प्रवक्ता, विधि व न्याय एवं रेल मंत्रालय, भारत सरकार

 

 

आजादी के 70 वर्षों बाद भी भारत में सुगम एवं सस्ते न्याय की आस करना एक सपना ही है। कई न्यायिक सुधारों की घोषणाएं हुईं लेकिन जमीनी हकीकत अब भी गरीबों, आम नागरिकों के लिए दूर के चांद की तरह है जो न्याय की आस में दशकों से मुकदमें की मकड़जाल में जकड़े हुए हैं। आम नागरिक के लिए अब भी न्याय पाना आसान नहीं है क्योंकि महंगे वकालत की फीस और उलझे हुए न्यायिक तंत्र की बेड़ियों को पार करते करते दो पीढ़ियां खप जाती हैं। यह देश की न्याय व्यवस्था के लिए विडंबना ही कही जाएगी कि लोकतंत्र में आम नागरिक को बेकार पड़ चुके कानूनों, वकीलों और पेशकारों समेत अन्य न्यायिक सेवकों की उलझनों में न्याय की आस छोड़नी पड़ जाती है। यह पूरे देश की कड़वी सच्चाई है जहां का निवासी अपने को संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र का निवासी कहता है। न्यायिक सेवा सुधार का कोई लाभ आम नागरिक तक क्यों नहीं पहुंच पाता इसके लिए बेंच और वकीलों के बीच की सांठगांठ सबसे बड़ा कारक है, जिसे तोड़ना होगा, केंद्र और राज्य सरकारों के लिए यह मजबूरी नहीं जरूरी है। गरीबों को सस्ता और सुगम न्याय नहीं मिल पाने की राह में सबसे बड़ा रोड़ा भी न्यायिक बेंच और वकीलों की सांठगांठ ही है। इसे कौन तोड़गा? जज की कुर्सी पर बैठे लोगों को तो पहले सोचना होगा?
सुगम न्याय की राह में दूसरा बड़ा रोड़ा विभिन्न उच्च न्यायालयों, जिला न्यायालयों समेत अन्य निचली अदालतों में जजों के पदों का रिक्त होना है। यह संख्या बहुत बड़ी है जो देश की न्याय व्यवस्था को बहुत ज्यादा प्रभावित कर रही है। विधि व न्याय मंत्रालय के अनुसार देश भर के हाईकोर्ट में कुल जजों के पदों की संख्या 1044 है जबकि इसमें से 443 पद रिक्त पड़े हैं यानी कि हाईकोर्ट में जजों की संख्या क्षमता से 43 प्रतिशत कम है। वहीं निचली अदालतों में 20358 न्यायिक पदाधिकारियों, जजों के पद हैं इसमें 4998 पद रिक्त हैं। यह कुल संख्या का 25 प्रतिशत है। जब तक न्याय सेवा में जटिलताएं रहेंगी आम नागरिक को न्याय के लिए दर-दर भटकना ही पड़ेगा। यह एक तथ्य है जिस पर केंद्र और राज्य सरकारें गंभीरता से विचार करें ताकि निचली और उच्च अदालतों में रिक्त पड़े जजों के पदों को भरा जाए। इससे यह भी प्रमाणित होता है कि सरकार देश मे जज बनाम जनसंख्या का अनुपात भी गड़बड़ है जिसे सरकारें सही नहीं कर पा रही हैं।
इस संदर्भ में भारत सरकार विधि आयोग द्वारा जुलाई 1987 में जारी अपनी 120वीं रिपोर्ट में यह रेखांकित किया गया था कि 2000 तक भारत में जज-जनसंख्या अनुपात 107 अनुपात 10 लाख होना चाहिए। यानी 10 लाख की जनसंख्या पर 107 जज होने चाहिए। यह अनुपात 1981 में संयुक्त राज्य अमेरिका में था। हालांकि 2002 में उच्चतम न्यायालय ने अखिल भारतीय न्यायाधीश एसोसिएशन के एक मामले में यह व्यवस्था दी थी कि 10 लाख की जनसंख्या पर 50 जज होने चाहिए। जबकि भारत में 10 लाख की जनसंख्या पर 17 जज हैं।
जजों की संख्या कम होने का सबसे बड़ा प्रभाव देश की विभिन्न न्यायालयों में लंबित भारी संख्या में केसों का होना है। भारत में लंबित मामलों की संख्या 3 करोड़ 50 लाख है। यह देश के विभिन्न निचली से लेकर उच्च न्यायालयों समेत उच्चतम न्यायालय में लंबित मामलों की संख्या को प्रतिबिंबित कर रहा है। केंद्र और राज्य सरकारों को इस गंभीर मामले को समय रहते निपटाना होगा नहीं तो लोकतंत्र में न्याय पाने का अधिकार आम नागरिक के लिए सपना ही बना रहेगा।
सरकार चाहे तो किसी भी केस के निपटारे के लिए अपने तंत्र को ज्यादा चुस्त दुरूस्त बनाकर लंबित मामलों का निपटारा समयबद्धता में करा सकती है। इसमें सबसे बड़ा कारक जांच प्रक्रिया का समय से पूरा नहीं होना भी है जो विभिन्न सरकारी एजेंसियों की अकर्मण्यता को प्रदर्शित करती है। कोई भी न्यायालय केस के निपटारे के लिए जिन पांच कारकों से प्रभावित होता है । जांच एजेंसियों पर निर्भरता, साक्ष्य की प्रकृति, सरकारी तंत्र का सहयोग, वकील, जांच एजेंसियां, गवाह और मुदई, भौतिक संरचना, पेशकार से लेकर कोर्ट के बाबू का सहयोग के साथ ही वर्तमान परिस्थितियों में लागू होने वाले कानून तथा कानूनी कार्यवाही सबसे बड़े कारक हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 2002 में पी. रामचंद्र राव बनाम कर्नाटक सरकार के मामले में यह व्यवस्था दिया है कि हमारे न्याय व्यवस्था में यह संभव नहीं है कि किसी अपराधिक केस की सुनवाई के लिए समयबद्धता निश्चित किया जा सके। यह न तो न्यायिक व्यवस्था और न ही वास्तविकता के धरातल पर और न ही कानूनी रूप से संभव है कि केस की कार्यवाही को निश्चित समय में निपटारे का आदेश दिया जा सके। कोर्ट की कार्यवाही के स्थगन से संबद्ध 2009 के केस में भी इस बात का उल्लेख किया गया है कि असहयोग के कारण ही मामले स्थगित होते हैं। यही कारण है कि केसों की संख्या में कमी नहीं हो पा रही है।
इस तरह यह स्थापित तथ्य है कि लंबित मामलों के निपटारे के लिए सरकारी मशीनरी और जजों को आपसी सहयोग से काम करना पड़ेगा तब ही लंबित मामलों का निपटारा समय से हो सकेगा और आम नागरिक को भी न्याय पाने में देरी का रोना नहीं रोना पड़ेगा। अंतत: सरकार और उसका तंत्र ही लंबित मामलों को जल्द सुनवाई का अवसर और शीघ्र न्याय दिलाने के सिद्धांत को अमली जामा पहना सकते हैं।
देश भर में 2001 से लेकर 2011 की अवधि के दौरान 11वें वित्त आयोग के वित्त पोषण से 1734 फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन विभिन्न राज्यों में किया गया थ। इस दौरान इन फास्ट ट्रैक कोर्ट में कुल 38.99 लाख मामले स्थानांतरित किए गए जिसमें से 32.93 लाख मामलों का निपटारा फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा कर दिया गया। 9 अप्रैल 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने ब्रिज मोहन लाल बनाम केंद्र सरकार और अन्य के मामले की सुनवाई में यह स्पष्ट व्यवस्था दी है कि फास्ट ट्रैक कोर्ट का मामला राज्य सरकारों के अधीन हैं जो चाहे तो इसे आगे बढ़ा सकती हैं या फिर उसे वहीं खत्म कर सकती हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश भी दिया था कि राज्य में न्यायिक सेवा के पदों की संख्या में 10 फीसदी बढ़ोतरी की जाए जिसका खर्च राज्य-केंद्र के बीच अनुपातिक बंटवारे पर आधारित होगा। केंद्र सरकार ने इस आदेश के आलोक में 80 करोड़ रुपये 13वें वित्त आयोग के माध्यम से जारी कर दिए जो कि 31 मार्च 2015 तक खर्च होना था।
वर्तमान समय में देश के विभिन्न राज्यों में 1192 फास्ट ट्रैक कोर्ट कार्य कर रहे हैं। अभी 14वें वित्त आयोग ने राज्यों की राशि में बढ़ोतरी कर दी है अब यह राज्यों की मर्जी पर निर्भर है कि वे इस राशि में से कितनी राशि न्यायिक सेवा में निवेश करती हैं? अब भी लंबित मामलों की संख्या में कोई कमी नहीं आई है। हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा कानूनी सेवा अधिनियम 1987 के तहत 3 लाख रुपये प्रतिवर्ष आय वाले नागरिकों को मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करने का आदेश दिया है जिसका असर न्यायिक व्यवस्था पर पड़ा है। यह राशि पहले 1.50 लाख प्रतिवर्ष था।
कानून मंत्रालय का कहना है कि केंद्र और राज्य सरकारों के सहयोग से फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन, जनसेवा को समय पर पूरा करने संबंधी कानूनों के बन जाने, नई नीतियों के आने से न्याय मिलने में आसानी होगी। मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायधीशों के बीच बैठक हो ताकि समय पर न्यायिक सेवा की रिक्तियों को भरा जाए और सरकारी मशीनरी लंबित मामलों के निपटारे में विशेष रूचि दिखाए तो संभव है लोगों को समय पर न्याय भी मिलने लगेगा ओर लंबित मामलों की संख्या भी कम हो जाएंगी।
आलम यह है कि एक श्रम मामले की सुनवाई में तीन से पांच साल लगना सरकारी मशीनरी की अकर्मण्यता और जाहिली का सबसे बड़ा उदाहरण है। यहां तक कि कड़कड़डूमा कोर्ट का लेबर ट्राईब्यूनल भी साल भर में एक तारीख देकर तीन-तीन माह की तारीखें लगाता है, ऐसे में एक श्रमिक को न्याय कब तक कहां तक मिलेगा? इस बात को रेखांकित करना होगा क्योंकि जिस न्याय की आस में कोई श्रमिक न्यायालय जाता है तो पांच साल की तारीखें उसका मनोबल और धन अपव्यय उससे न्याय की छीन लेती हैं। उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को ऐसे मामलों के शीघ्र निपटारे का आदेश निचली अदालतों को देना चाहिए ताकि ऐसे मामलों में सुगम न्याय मिले। लोगों की आशाएं सुप्रीम कोर्ट से ज्यादा हैं। सरकार तो बहरी गूंगी है ही लंबित मामलों में अनावश्यक देरी न्याय प्रदान का कर्तव्य और नागरिकों को न्याय पाने का अधिकार दोनों का हनन हो रहा है।

 

 

 

अंग्रेजी से अनुवाद-शशिकान्त सुशांत, पत्रकार

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