TOP BANNER

TOPBANNER







flower



july2015
कविताएँ 

आलेख

गज़ल

गीत

मुक्तक

हाइकु

कहानी





संस्थापिका एवं प्रधान सम्पादिका--- डॉ० श्रीमती तारा सिंह
सम्पादकीय कार्यालय--- --- 1502 सी क्वीन हेरिटेज़,प्लॉट—6, सेक्टर—
18, सानपाड़ा, नवी मुम्बई---400705
Email :-- swargvibha@gmail.com
(m) :--- +919322991198

flower5

rosebloom





 

दलितों की कविता में दर्द और वेदना --आनंद दास

 

वर्तमान समय में अस्मिताओं के संघर्ष में दलित विमर्श एक ज्वलंत विषय है। ‘दलित’ शब्द एक वर्ग विशेष का ही द्योतक नहीं है बल्कि संसार में जितने भी शोषित हैं जिनपर अत्याचार और शोषण हुआ हो वे सभी दलित हैं। दलित साहित्य धरती के लोगों से सीधा जुड़ा है। दलित सदियों से वर्ण व्यवस्था, जात-पात, ऊंच-नीच, भेदभाव और धार्मिक अन्धविश्वास और मान्यताओं के शिकार हुए हैं और जिन पर मनुस्मृति की सामाजिक, धार्मिक व राजनैतिक व्यवस्थाओं के आधार पर अमानवीय व्यवहार, असह्य उत्पीड़न, अकल्पनीय अपमान और असीम अन्याय किया गया था। दलित साहित्य का वैचारिक आधार अंबेडकरवादी दर्शन ज्योतिबा फुले तथा महात्मा बुद्ध के ‘अहिंसा परमाधर्म’ जैसे भाव को एकाकार करता हुआ सद्भावना, एकता की भावना को सुदृढ़ करने का ही प्रयास है।


दलित साहित्य के फलक को विस्तृत करने में आत्मकथाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है क्योंकि आत्मकथाओं में उनके भोगे हुए यथार्थ का संचित अनुभव होता है। आत्मकथाओं और कहानियों का जिक्र हमेशा दलित साहित्य के अंतर्गत आता है पर देखा जाए तो दलित चेतना को विकसित करने में कविताओं ने भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दलित चिंतक ‘कंवल भारती’ दलित कविता की चेतना को व्याख्यायित करते हुए कहते हैं – “दलित कविता उस तरह की कविता नहीं है, जैसे आमतौर पर कोई प्रेम या विरह में पागल होकर गुनगुनाने लगता है। यह वह भी नहीं है, जो पेड़-पौधों, फूलों, नदियों, झरनों और पर्वतमालाओं की चित्रकारी में लिखी जाती है। वह किसी का शोकगीत और प्रशस्तिगान भी नहीं है। दरअसल यह वह कविता है, जिसे शोषित, पीडि़त दलित अपने दर्द को अभिव्यक्ति करने के लिए लिखता है। यह वह कविता है, जिसमें दलित कवि अपने जीवन संघर्ष को शब्दों में उतारता है। यह दमन, अत्याचार, अपमान और शोषण के खिलाफ युद्धगान है। यह स्वतंत्रता, समानता और मातृभावना की स्थापना और लोकतंत्र की प्रतिष्ठा करती है। इसलिए इसमें समतामूलक और समाजवादी समाज की परिकल्पना है।’’1 दलित कविता में सबसे पहला नाम हीरा डोम का आता है जिनकी कविता ‘अछूत की शिकायत’ 1914 में सरस्वती में छपी थी।। नामदेव ढसाल की कविताओं में भी दलित चेतना के स्वर ज्वलंत रूप में दिखाई पड़ते हैं। ओमप्रकाश वाल्मीकि की ‘सदियों का संताप’ शीर्षक कविता संग्रह के ‘चोट’ कविता में दलितों की दयनीय और कारुणिक स्थिति का चित्रण हुआ है। आत्मसजग,आत्मचेतना की भावना को जागृत कर शोषण रूपी अंधकार से बाहर निकलकर सूर्य की ओर मुख अर्थात अंधेरे से प्रकाश की ओर कदम बढ़ाते हुए एकजुट होकर अपने अधिकार बोध, स्वतंत्रता, समानता की भावना को विकसित करें। जयप्रकाश कर्दम की कविताओं में सामाजिक शोषण के विरुद्ध आक्रमक स्वर देखने को मिलता है।

 

 

डॉ. धर्मवीर ने सामाजिक विषमताओं के माध्यम से आर्थिक विपन्नता की विद्रूपताओं का मार्मिक अंकन कर दलितों के संघर्षमय जीवन को वाणी दी है। गीत केवल रोमांचित या मनोरंजित नहीं करती बल्कि स्वयं के ऊपर घट रही सामाजिक यथार्थ को भी प्रस्तुत करती है और अपनी व्यथा व वेदना को भी बया करता है। जब दलित शोषित होता है और सामाजिक कुरीतियों का शिकार होता है तब उसे अंदर से झकझोर देता है। दलित अपने जीवन संघर्ष को चित्रण करते हुए कहते हैं –

 


'हरिजन जाति सहै दुख भारी हो।
हरिजन जाति सहै, दुख भारी।।
जेकर खेतवा दिन भर जोतली,
अहै देला गारी हो, दुख भारी ।।
हरिजन जाति सहै, दुख भारी।।’2

 

 

दलित लेखकों ने अपनी कविताओं में अत्यंत मारक ढंग से समाज के अनछुए पहलुओं को चित्रित कर अपने निजी दुखों को शब्दबद्ध किया है।‘दलित साहित्य’ कोरी कल्पनाओं, अन्धविश्वासों पर आधारित या देव प्रदत्त साहित्य नहीं है। यह वैज्ञानिक सत्य पर आधारित,धर्म, कर्म, भाग्य, भगवान, जन्म-मरण व पूर्वजन्म के सिद्धांतों को नकारता हुआ, धरती से जुड़े लोगों के भोगे गये जीवन से जुड़ा साहित्य है जिसमें उत्पीड़न, असमानता, अन्याय, अपमान के विरुद्ध खुला विद्रोह है, धर्मान्धता में डूबे अविवेकी लोगों की संकीर्णता दूर कर, उनकी संवेदना जगाकर, उनमें स्वाभिमान जाग्रत करने की ऊर्जा है, वहीं समाज में समरसता, भ्रातृभाव, समादरता स्थापित करने के लिए तथाकथित उच्च वर्ग के लोगों के अन्दर असमानता, अन्याय और सामाजिक व धार्मिक विषमताओं के विरुद्ध अहसास जगाने की शक्ति है। यह बंधन मुक्ति के लिए आवश्यक वैचारिक क्रांति की बारुद है। डॉ. अंबेडकर दलितों के उत्थान को राष्ट्र के उत्थान से जोड़ते हुए साहित्यकारों को संबोधित करते हुए कहते हैं- “उदात्त जीवन मूल्यों एवं सांस्कृतिक मूल्यों को अपने साहित्य में स्थान देना चाहिए। साहित्यकार का उद्देश्य संकुचित न होकर विस्तृत एवं व्यापक हो। वे अपनी कलम को अपने तक ही सीमित न रखें, बल्कि उनका प्रखर प्रकाश देहाती जीवन के अज्ञान का अंधकार दूर करने में हो। दलित उपेक्षितों का बड़ा वर्ग इस देश में है। इस बात को सदा याद रखें। उनका सुख-दुख एवं उनकी समस्याएं समझ लेने की कोशिश करें। साहित्य के द्वारा उनका जीवन उन्नत करने के लिए प्रयत्नरत रहें। यही सच्ची मानवता है।’’3 निष्कर्षत: दलित साहित्य-दलितोत्थान साहित्य यानी दलितोत्थान हेतु लिखा गया यह एक ऐसा साहित्य है जो भोगे हुए सच पर आधारित है, जमीन से जुड़े दलित, शोषित, उपेक्षित, सर्वहारा वर्ग से संबंधित है, जो दशा और दिशा को इंगित करता है और जिसमें विद्रोह और उद्बोधन के साथ संवेदना जाग्रत करने की ऊर्जा है।

 

 

HTML Comment Box is loading comments...