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बहार बन के आईं,वो यादें तुम्हारीं---रवीन्द्र गोयल

 

 

बहार बन के आईं , वो यादें तुम्हारीं,
गुलज़ार ज़िंदगी है, गिरफ़्त में तुम्हारी ।

 

 

ख्वाबों में उमड़ना, औ' ख्यालों में रहना,
अदा तेरी दिलकश , या मुहब्बत हमारी ।

 

 

पलटना तेरा और, वो पलक का झपकना,
बनी दिल्लगी तेरी, औ' ज़िन्दगी हमारी ।

 

 

ख़ार सी चुभती है, ख़लिश भरी महफ़िल
मज़रूह हो गई है, अब मुहब्बत हमारी ।

 

 

महकता तसव्वुर में , गुल तेरी याद का,
मेरी है ये क़िस्मत , या रहमत तुम्हारी ।

 

 

 

' रवीन्द्र '

 

 

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