रिश्ते !– -विश्वनाथ शिरढोणकर

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-रिश्ते आदमी को जन्म से ही अपने आप मिल जाते है । भले ही रिश्तों का कोई आकार प्रकार ना हो , परन्तु रिश्ते धीरे धीरे अपने आप जुड़ते जाते है और श्रृंखलाबद्ध हो जाते है । अटूट बंधनों में बंध जाते हैं।कुछ रिश्ते अचानक कोई लॉटरी खुल जाए ऐसे भाग्योदय जैसे उस लॉटरी में खुले इनाम की तरह मिल जाते है। जैसे परिवार में किसी की शादी तय होती है और वरमाला पड़ते ही अचानक कई सारे रिश्ते जुड़ जाते है।कुछ रिश्ते पुष्प जैसे होते है , खिलते जाते है , बहार लाते रहते है , महकते जाते है और हमेशा खुशबूं ही बिखेरते रहते है । गुलाब की पंखुड़ियों में अक्षरों से लिपट जाते है । -कुछ रिश्ते पत्थर जैसे जडवत रहते है। अक्षरशः गले में पत्थरों की माला जैसे बोझा बन लटकते रहते है और उन्हें जबरन ढोते रहना पड़ता है।कुछ रिश्ते मन में चिडचिडाहट पैदा करने जैसे होते है। बिलकुल हैरान परेशान कर जाते है। कुछ रिश्ते मिठास लिए होते है। कुछ रिश्ते भावनाओं का अम्बार होते है। कुछ रिश्ते निर्मित होने के पहले ही विश्वास के संकट से रूबरू हो जाते है और ख़त्म हो जाते है तो कुछ रिश्ते जबरन ख़त्म कर दिए जाते है।कुछ रिश्तों की हमें सदैव लालसा रहती है तो कुछ रिश्ते हमें नापसंद रहते है। कुछ रिश्तों के लिए मृत्यु को भी आव्हान देने के लिए कोई आगा पीछा नहीं सोचता तो कुछ रिश्तों को मृत्यु के मुह में धकेलने से भी किसी को कोई संकोच नहीं होता। कुछ रिश्ते मैत्री का अपनापन देकर जाते है तो कुछ रिश्ते कट्टर दुश्मनी में बदल जाते है। कुछ रिश्ते हल न हो सकने वाले गणित की तरह होते है और कितना भी प्रयत्न करले आखिर तक रिश्तों का गणित हम हल नहीं कर पाते और उस गणित का उत्तर हमें मालूम ही नहीं होता । कुछ रिश्ते जिन्दगी में उलझन बन जाते है और लाख प्रयास कर ले रिश्तों की उलझी डोर को हम सुलझा नहीं पाते और वे ज्यादा ही उलझते जाते है । कुछ रिश्ते खोज कर सामने लाना पड़ते है और रिश्तों को परवान चढ़ने में भी समय देना पड़ता है । इसमें अधीरता नहीं चलती और तत्काल परिणाम की आशा करना मुनासिब नहीं होता ।
-हर एक रिश्ते का महत्त्व समझने में भी समय लगता है और उसका महत्व समझे तब तक वह रिश्ता ही कालबाह्य होकर न जाने कहाँ खो जाता है और अपना महत्व ही खो बैठता है । फिर शेष रहती है सिर्फ यादें।कुछ रिश्तों की यादें हमें हैरान परेशान कर जाती है। कुछ रिश्तों की यादें आग का दरिया बन जाती है। हमेशा जलाती रहती है । एक दर्दनाक अंत तक हमें जीने नहीं देती । कम्बख्त इन रिश्तों का रंग भी अलग अलग परिस्थितियों में अलग अलग होता है ।
– ‘ मैं था मैं नहीं था ‘ इस उपन्यास का बाल नायक उसके जन्म से ऐसे ही सभी स्थायी रिश्तों की खोज में है । उसके एक रिश्ते की खोज पूरी हो भी नहीं पाती कि उसके सामने दूसरा ही कोई नया चेहरा रिश्ता बन कर खड़ा रहता है । रिश्ते जीवन के प्रवाह में प्रारब्ध के साथ बहते हुए किसी स्थायी मजबूत किनारे का काम भी करते है । कुछ रिश्ते खुद खोजने पड़ते है तो कुछ रिश्तों की पहचान करवानी पड़ती है ।
– ‘ मै था मै नहीं था ‘ का बालनायक अपने रिश्तों की खुद होकर ही पहचान करने में जी जान से लगा हुआ है । जिन्दगी के इस सफ़र में उसे जीवन की कठोर खुरदरी राह पर ओर सुलझे अनसुलझे रिश्तों का परिचय करवाने के लिए उसके अपने भी साथ है। उसे रिश्तों की गर्माहट , रिश्तों का रूखापन , रिश्तों की चंचलता , और रिश्तों के ठंडेपन से समय समय पर रूबरू करवा रहें हैं । वैसे भी रिश्तों का भावनाओं से नजदीक का संबंध रहता है और व्यवहार से शायद थोड़ी दूरी । व्यवहार के लिए योग्यता और पात्रता जरुरी है . इस हाथ दे उस हाथ ले का समान व्यवहार जरुरी है , और इस अबोध उम्र में ये कैसे संभव है ? परन्तु भावनाएं जन्मजात ही हमें मिलती है । ‘ मैं था मैं नहीं था ‘ का बालनायक अबोध मासूम और निर्लिप्त उम्र में ही खुद की भावनाओं में लिप्त खुद की ही भावनाओं से और व्यवहार के साथ दो चार हो रहा है । परन्तु उसके साथ होने वाले व्यवहार का अर्थ समझने में वो असमर्थ है ।
– ‘ मै था मै नहीं था ‘ का बाल नायक बिलकुल अपने जन्म के पाहिले ही क्षण से जीवन के लिए संघर्ष कर रहा है । उसका अस्तित्व है परन्तु उसके अस्तित्व का एहसास औरों को नहीं है और उसके परिस्थितियों के बारे में भी सब अनभिज्ञ है । एहसास के लिए रिश्तों को समझना और उन रिश्तों से वैसी अपेक्षाएं रखना , और अपनी ओर से उनकों समझना एवं वैसा आचरण तथा व्यवहार करना और वैसे ही खुद के जीवन में अंगीकृत करना , रिश्तों के छक्के पंजे , इन सब का गहराई से अध्ययन करना जीवन के लिए भी उपयोगी होता है । इसलिए रिश्तों की दुनिया में व्यवहार में भी समझदार होना बहुत जरुरी होता है ।
– रिश्तों के खेल में हर एक के स्वभाव का अपना एक ख़ास ऐसा महत्व होता है । एक जैसे स्वभाव के लोग मिलते ही अक्सर जल्द ही मित्र बन जाते है । बाहर की दुनिया में एक जैसे स्वभाव , समान पसंद नापसंद के लोग खोजने से मिलते है , परन्तु जीवन के सफ़र में हर एक घर में रिश्तों का हार, हर एक के गले में अपने आप आ जाता है । और रिश्तों के फूलों वाला यह हार काँटों सहित प्रत्येक व्यक्ति को जीवन से मृत्यु तक ढोते रहना पड़ता है । अक्सर गले में पड़ा रिश्तों का यह हार ताजा भी नहीं रहता और उसका निर्माल्य भी नहीं बन पाता । कुछ समय के लिए निकाल कर उसे खूंटी पर भी नहीं रख सकते। गले से निकाल कर फेंक भी नहीं सकते । समय और जरुरत के दों फूलों से निर्मित रिश्तों का यह हार हम अस्वीकार भी नहीं कर पाते , और अपनी सुविधा के अनुसार स्वीकार करना स्वार्थ कहलाता है । सब कुछ बहुत मजेदार ही है ,लेकिन दुनिया तो इसी पर टिकी है ? -रिश्तों की वेदनाए बहुत कष्टप्रद होती है । वेदनाओं के कारण अक्सर रिश्ते झुलस जाते है । कभी कभार एखाद रिश्तें के कारण सभी रिश्तों को भी अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है ।
– ‘ मै था मतलब अस्तित्व होना और मै नहीं था मतलब अस्तित्व होकर भी उस अस्तित्व को सभी के द्वारा नजरअंदाज कर देना । सच तो यह है कि यह उपन्यास भले ही आत्मकथनात्मक हो परन्तु वास्तविकता को कल्पना का आवरण थोडा ज्यादा ही दिया है । कथानक बुने जाने हेतु यह आवश्यक था ।
-विगत दस वर्षों से मेरे मन में इस उपन्यास का कथानक सजीव हो रहा था । बीते पाच वर्षो में मै यह उपन्यास पूर्ण कर पाया । सच तो यह है कि इस कहानी को लिखना मेरे लिए थोडा कठिन था । क्योंकि इसका नायक बालक होकर भी यह बच्चों के लिए लिखा गया बाल उपन्यास न होकर , वस्तुतः यह बड़ों के लिए लिखा गया है । इस एक नये प्रयोग में एक कथा के साथ अनेक कहानियां है । ‘ मै था मै नहीं था ‘ के अबोध और मासूम बाल नायक को उसके रिश्तों की खोज में जो रिश्ते मिलते है वें रिश्तें भी अपनी असीम वेदना लिए जी रहे है , और उन सभी की कहानियाँ भी इसमें शामिल है ।
– बिन माँ के इस नन्हे नायक का जीवन वेदनामय ही है । अपनी परिस्थितयों से वो अपनी क्षमता के अनुसार संघर्ष कर रहा है । और नियति से ही क्यों न हो आधेअधूरे अपने प्रारब्ध के साथ कुछ अपने उसके हमसफ़र भी साथ हो लिए है । उसके सुख दु:ख के पलों को बाटना चाहते है । परन्तु निष्ठुर नियति किसे छोड़ती है । तो भी ये मासूम नसीब से दो दो हाथ करने को सदैव तत्पर है ।
– मूलरूप से मराठी में लिखे गए ‘ मी होतो मी नव्हतो ‘ इस उपन्यास को फरवरी २०१६ में ठाणे , मुंबई के अनघा प्रकाशन , द्वारा प्रकाशित किया गया है । इसका विमोचन महाराष्ट्र के जलगाव में दिनांक १६ फरवरी २०१६ को मराठी के अनेक प्रतिष्ठित साहित्यकारों , श्री मधु मंगेश कर्णिक , भारत सासने , अरुण म्हात्रे , प्रकाशक पिता पुत्र , श्री मुरलीधर नाले एवं अमोल नाले , तथा अनेक गणमान्य मान्यवरों के तथा , महाराष्ट्र के तत्कालीन मंत्री माननीय एकनाथजी खडसे की उपस्तिथि में सम्पन्न हुआ था । तबसे ही मै इसके हिंदी अनुवाद के बारे में सोच रहा था । इस उपन्यास को महाराष्ट्र में उत्तम प्रतिसाद मिला । इसीलिए अब इस मराठी उपन्यास को , सुधारित और अनुवादित किए जाने की जरुरत महसूस हुई । और इस तरह इस उपन्यास की मूलभावना को सहेजते हुए एक तरह से यह मौलिक रचना हिंदी प्रेमियों के समक्ष प्रस्तुत है ।
-विश्वनाथ शिरढोणकर

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