प्रतिशोध–कामिनी कामायनी

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“घर भर मेहमान ,इधर मेहमान ,उधर मेहमान ,ड्राईंग रुम भी बेड रुम बन गया है । ऊपर से इनलोगों की फरमाईश ,जैसे पूर्वजों की जमींदारी रही हो । किसी को पाँच पाँच मिनट पर चाय चाहिए ,किसी को गरम गरम कौफ़ी । कोई हलवा पूड़ी से नीचे नाश्ता सोच भी नहीं सकता ,किसी को रबड़ी जिलेबी चाहिए । पूरे दिन दोनों रसोईये किचन में एक पाँव पर खड़े रहते हैं ,और मैं उनकी बेगमों को बाहर घुमाने में जुटी रहती हूँ । बच्चों को ठीक से देख भी नहीं पाती ,क्या खा रहे हैं ? क्या पढ़ रहे हैं । आखिर यह मेला कब तक जमा रहेगा ?’ धधकती ,सुलगती पत्नी आखिर एकदिन अपने उच्चाधिकारी पति के समक्ष आगबबूला हो बैठी थी । सर्दी की गुनगुनी  धूप में अपने सरकारी बंगले के लॉन में बैठ कर काफी पीते हुए पति ने बड़े ही कातर दृष्टि से उसे देखा था । फिर उनकी नजरें सामने के पेड़ पर बैठे चिड़ियों पर ठहर गई थी ।पत्नी सहम गई ,क्या उनके रिशतेदारों के विषय में मैंने कोई चुभने वाली बात कह दी ।मन ही मन सोचा।  चंद लमहों के खौफ़नाक चुप्पी के बाद पति ने कहा था ‘मौली! तुम्हें पता है न ,जब मैं धरती को छुवा भी नहीं था ,मेरे सिर से पिताजी का  छाया हट चुका था ।अत्यंत बुजुर्ग दादा-दादी का सहारा बना ,और सब लोग थे सब रिश्तेदार थे ,मगर पिता नहीं थे । इसका तीखा और लोमहर्षक असर माँ को झेलना पड़ा था ,किसने उसे किशोरावस्था में ही प्रौढ़ बना दिया था ।परिवार की महिलाएं मुझे देख कर घी ,दूध छुपा लेती थी ।घर के बाहर फेंके गए डिब्बों से पता चलता ,घरमें मिठाई आया था ।  मै किससे पूछता ,माँ दिन भर रसोई घर में ,नौकरों के स्थान पर खटती रहती । चाची हमेशा अपने विशेष कामों से हरिया ,मनुआ को कहीं कहीं भेजती रहती ,ताकि मेरी माँ को रसोई में काम करना पड़े ।दादी बिस्तर पर ही लेटी रहती ,उन्हें न जाने कौन सी बीमारी हो गई थी । इतने सारे बच्चों के दौड़ धूप ,उछलकूद ,मस्ती के बीच में मैं एकदम खामोश रहता । माँ मुझे देखती और अपनी मलिन साड़ी से अपना आँख पोंछ लेती।  जमींदारी तो परबाबा के साथ ही चली गई थी ,मगर रुतबा तो फिर भी कायम था । घर में आने जाने वाले लोग मेरी ओर जिस निगाह से देखते ,मैं घबड़ा कर भाग जाता था वहाँ से । फिर एक बार जब बाहर रखकर पढ़ने की बात चली घर में,तो घर के अन्य बच्चों के साथ माँ भेजी गई थी ,शहर में लिए गए भाड़े के मकान में ,भोजन बनाने के लिए सबका । ललन,बबन और मंतू जो मुझसे साल दो साल बड़े चचेरे भाई थे ,उनके पैंट के पाकेटों में नोट भरे रहते ,और अनाप शनाप जो मर्जी होता ,खरीदते ,खाते । यहाँ भी मैं माँ की ओर देखता ,तो वो मुझे अपने कलेजे से लगाकर रो पड़ती । मैं उन्हें चुप कराता,न जाने कब बड़ा हो गया । अपनी सारी अभिलाषा ,ऊर्जा पढ़ाई में लगा दिया था । मैट्रिक में तीनों भाई फेल कर वापस गाँव लौट गए थे । मै प्रथम श्रेणी में पास होकर वजीफा लेकर बड़े शहर के छात्रावास में आ गया । पढ़ता गया ,परीक्षाएँ देता रहा आज यहाँ हूँ । वे सब कहाँ हैं? गाँव के लोग आज फिर पिताजी के पुण्य और दादा परदादा के समान ख्यातिवान मुझे समझने लगे हैं । घर के अंदर सबका रवैया बदल गया है ।अब माँ की पूछ और इज्जत कितनी बढ़ गई है,देख ही रही हो  । तुम आ गई बच्चे आ गए ,और चाहिए क्या मुझे ? हाँ ,इन लोगों को इतना खिलाओ ,इतना आवभगत करो ,कि मेरे  अतीत का हर जख्म भरता जाए”।
पत्नी की आँखों में भी बड़े बड़े आँसू आ गए थे । “जी अब कभी भी शिकायत नहीं करूंगी” ।उसने इतना ही कहा था ।
कामिनी कामायनी ।

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