“कछहुँ करमवा बाकी “—सुखमंगल सिंह

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“कछहुँ करमवा बाकी “————————-

डगरी – नगरी ठोकर तारे 

भरि – भरि घूसा मारयो री 

झाड़ि कलाई  मोहन मारो 

कछहुँ करमवा बाकी तारो| 

 या माया कही जंजाल हौ यहां मोह के

फाँस निराले तु फूला फसल ,

नहीं समाता झूमत द्वारे -द्वारे प्यारे ||  

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