आरक्षण और उसकी सार्थकता – शशांक मिश्र भारती

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आरक्षण शब्द के अर्थ को हम देखें तो सामान्यतः किसी के लिए कुछ सुरक्षित करना आता है। हमारे देश में जब स्वतंत्रता के बाद भारतीय संविधान लागू करने का अवसर आया तो संविधान निर्माताओं ने अनुभव किया कि देश में जातीय विभेद के कारण कुछ जातियों को पिछड़ना पड़ा आगे आने का अवसर न मिला। अतः सरकारी सेवाओं और संस्थानों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व न रखने वाले वर्गों और समुदायों का सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ापन दूर करने के लिए भारतीय संसद ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए प्रावधान रखा। इससे अल्पसंख्यक संस्थानों और निज क्षेत्र को अलग रखा। फिर सरकार के प्रतिनिधियों को लगा कि पिछड़े वर्ग का प्रतिनिधित्व कम है तो मंडल आयोग के माध्यम से उन्हें भी आरक्षण दिया। अभी-अभी केन्द्र सरकार को लगा कि सवर्णों में कुछ गरीब ऐसे हैं जो आगे नहीं बढ़ पा रहे तो उनके लिए भी आर्थिक आधार पर आरक्षण का प्रावधान किया गया। दूसरी ओर सर्वोच्च न्यायालय ने यह तय कर रखा है कि पचास प्रतिशत से अधिक आरक्षण नहीं किया जा सकता। आरक्षण के सम्बन्ध में कई राज्यों व केन्द्र का सर्वोच्च न्यायालय में मुकदमा भी चल रहा है। आरक्षण सम्बन्धी प्रावधान सरकारें भारतीय संविधान में समय-समय पर संशोधनों के माध्यम से करती रही हैं। अदालतों ने साल 1951 1963-1970-1992-1996-1999-2001-2005 आदि में बार-बार इसमें हस्तक्षेप किया कई बार राज्यों व केन्द्र के फैसले बदले भी। चाहें तमिलनाडु कर्नाटक आन्ध्र का मामला हो या महाराष्ट्र राजस्थान आदि का।

अब प्रश्न यह है कि क्या आरक्षण उचित है या अनुचित। सामाजिक दृष्टि से देखा जाये तो उचित। वहीं आर्थिक दृष्टि से देखें तो अनुचित। कारण समाज के विविध वर्ग व समुदाय सामाजिक दृष्टि से तो कमजोर पिछड़े अथवा वंचित हो सकते हैं पर आर्थिक रूप से देखा जाये तो गरीब मजदूर पिछड़ा वंचित हर वर्ग जाति में मिल जायेगा भले ही संख्या कम ज्यादा हो जाये। कुछ वर्गों समुदायों में इनकी संख्या अधिक बहुत अधिक भी हो सकती है तो कुछ में कम अत्यन्त कम भी। इसके साथ ही यह भी आवश्यक है कि जिसके लिए यह प्रावधान किया गया है उसको लाभ मिल भी पा रहा है या नहीं अथवा कुछ ही लाभ उठा पा रहे हैं या यहां भी चालाकी हेरा-फेरी अपना कमाल दिखा जा रही है। कई बार मैंने देखा कि योग्य व्यक्ति कई बार चालाकों के मध्य फंसकर अवसर खो देता है। अपने आसपास दृष्टि डालता हूं तो पाता हूं जो परिवार पहले सरकारी सेवा में थे आज भी हैं चार चार पीढ़ियां लगाता आगे बढ़ रही हैं दूसरी ओर विपन्न गरीब वंचित पिछली चार पीढ़ियों से वहीं पर हैं यह केवल एक वर्ग समुदाय का हाल नहीं है अपितु प्रत्येक स्थान पर दिख रहा है।

जिसके लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई वह कितना लाभान्वित हुआ कितना नहीं और किसको अब आरक्षण की आवश्यकता नहीं है। कौन सामान्य स्थिति में आकर स्वयं आगे बढ़ सकता है। इसका समय-समय पर मूल्यांकन होता रहना चाहिए। यहीं नहीं इस तरह के मामले सामाजिक न्याय के रूप में देखकर आखिरी व्यक्ति तक इसका लाभ पहुंचाने का कार्य होना चाहिए। यहीं भारतीय गणतंत्र की मूल अवधारणा है और राष्ट्र पिता महात्मागान्धी का सपना भी। आरक्षण की व्यवस्था में आजादी के सात दशकों के बाद भी यदि हम अन्तिम व्यक्ति को सामाजिक न्याय नहीं दे पा रहे हैं तो कहीं न कहीं खामी है और हम या हमारा कोई अंग इसके लिए उत्तरदायी है। उसको सचेत करना पड़ेगा। अन्यथा हमारे और हमारी व्यवस्थाओं के प्रयास अगले सात सौ साल तक भी ढाक के तीन पात से अधिक न हो पायेंगे। जैसाकि इसको लागू करते समय अथवा संविधान निर्माताओं की मंशा रही थी उसके अनुसार काम होना चाहिए था पर ऐसा नहीं हुआ और राजनीतिक सोच व स्तर के साथ- साथ सबके अपने अपने सत्ता स्वार्थ हित जुड़ते गये परिणाम हम सबके सामने है कि जिस लक्ष्य को पाने का समय योग्य संविधान विशेषज्ञों द्वारा लगभग दस साल निर्धारित किया गया था वह एक सौ दस साल में भी पूरा होता नहीं दिख रहा है। जैसाकि वर्तमान में राजनीति का स्तर है और राजनेताओं के प्रति जनमानस की अवधारणा उससे आरक्षण की पूर्णतया सफलता पर सन्देह होना स्वाभाविक है।

ऐसे में हम सब यदि आरक्षण को यर्थाथ में सार्थक करना चाहते हैं तो एक जागरूक ही नहीं जागरूक मतदाता भी बनना पड़ेगा इससे ही राजनीति में अच्छा सन्देश जायेगा। जाति वर्ग की आरक्षण की केवल सत्ता या अपने व अपनों के निजी हित के लिए राजनीति करने वाले व्यक्ति और संस्थायें कमजोर होंगी। समग्र विकास का भाव रखने वाले मजबूत होकर आगे बढ़ेंगे। यह देश और समाज के साथ-साथ सामाजिक न्याय के लिए भी महत्वपूर्ण प्रमाणित होगा।

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