भूखा कूड़ेदान—डा प्रवीण कुमार श्रीवास्तव

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प्रथम प्रहर में स्वास्थ्य लाभ हेतु भ्रमण के लिए मनोज निकला । प्रात : की शीतल वायु, सुबह के धुंधलके को शांत व मधुर बना रही थी । रास्तों पर लगी स्ट्रीट लाइट एकाएक बुझ कर प्रात :के आगमन की सूचना उसके मानस पटल पर अंकित करती है । जनपद के चर्च गेट स्थित रास्तों पर तीव्र गति से चहल –कदमी करते युवा –युवतियाँ उसका साथ दे रहीं हैं ।

उसने इंगित किया कि , रोज की तरह उपेक्षित कूड़ादान आज भी मुंह बाये पड़ा है । उसे ऐसी अनुभूति हुई , जैसे कोई बालक अपनी भूख मिटाने के लिए भोजन के कौर को ग्रहण करने को आतुर है , किन्तु भोजन परोसने वाले की कुटिलता वश भोज्य पदार्थ रूपी कूड़ा कूड़े- दान रूपी भूखे बालक के आस –पास बिखरा दिया गया है , और कूड़े दान रूपी बालक का पेट आज भी रिक्त है ।

उसके मन में आया कि , यही कुटिल कार्य उसने भी कई बार किया है , जब स्वच्छता का दम भरते हुए उसने कूड़े को कूड़े दान में न डाल कर आस –पास बिखरा दिया , और कूड़े दान में कूड़ा न डालने का आरोप पूर्व वर्ती लोगों पर मढ़ दिया ।

ऐसा लगता है , कि स्वच्छ भारत अभियान कि मंशा सार्थक हो, हम नहीं चाहते , स्वच्छता का मूल्य जानते सब हैं , पर मानते कितने नागरिक हैं ?

बाह्य स्वच्छता के साथ आंतरिक स्वच्छता भी आवश्यक है ।

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