पिता की दास्तां —-डां नन्द लाल भारती

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कौन कहता है

पिता दौलत का भूखा होता है

अफवाह फैलाने वालो

पिता ऐसा जीव है जो

खुद को तबाह कर देता है

औलाद के स्वर्णिम भविष्य के लिये

पिता भूखे पेट भी औलाद को

निहार कर

सकूं की सास भर लेता है

फटेहाल पिता भी औलाद की खुशी के लिए

कभी भी गरीब नहीं होता

दर्द में भी औलाद की आहट से

खुश हो लेता है

हाय रे पिता का भाग्य

वही औलाद पिता मर्यादा को

खाक मे मिला देती है

पिता के संघर्ष रूपी तपस्या का

चीरहरण कर देती है औलादें

त्याग को भूला देती हैं औलादें

पिता के दर्द को अनदेखा कर

अपयश का पहाड़

पिता की छाती पर पटक देती हैं औलादें

औलाद के भविष्य मे खुद को

स्वाहा किया पिता

औलाद के सुखद जीवन का

बुनता रहता है ताना बाना

औलाद मढती रहती है

पिता के माथे दोष पर दोष

सन्तोष का चोला ओढे पिता का

हर सपना होता है औलाद के लिए

हाय रे पिता तुमको सुख नहीं मिलता

तुम दर्द मे जीते दर्द में मर जाते हो

अब तो और बुरा हाल हो गया है

जब से वाईफ लाईफ हुई है

बेचारे मांता- पिता जैसे

लावारिस हो गये है

मांता पिता प्यार के भूखे होते है

लोभी मत बनाओ

अरे नवजवानों होश मे आओ

मांता पिता जीवित भगवान हैं

धरती के भगवान को न ठुकराओ….

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