किस की इबादत करूँ— सुशील शर्मा

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विषधरों की बस्ती में प्यार ढूंढने चले हो
बड़े दीवाने हो ये किस की इबादत करने चले हो
बंगलों के गमलों में उगे बोनसाई के पौधे बोध बृक्ष नहीं होते।
किश्तों में मर रहे आदमी जिन्दा नहीं होते।
आत्मा का अक्षांश कितना झुका है
इंसानियत के वृत पर कितना रुका है
देह की इबादत का अहसास मुस्कुराता है
देश की इबादत का अहसास पीछे छूट जाता है।
इबादत करूँ उस खुदा की जो आसमानों में हैं।
या सेवा करूँ उस गरीब की आसमान के आशियानों में है।
इबादत उस महल की जहाँ हर तरफ उजेरा है।
या उस झोपड़ी की जहाँ अंधेरों का डेरा है।

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