अन्नदाताओं_को_समर्पित_गीत–अनुराग ‘अतुल’

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जिसके कारण सब जिन्दा हैं,
वो आज बहुत शर्मिंदा है!
तुम छोड़ो , अजी अंधभक्तों,
तुमको लगती ये निन्दा है !
पर सच्चे , वीर सपूतों को
उच्चार रही भारत माता !
उठ चलो , लड़ो निज मान हेतु
ललकार रही भारत माता!

जो सर्दी गर्मी सहते हैं
खेतों पर मेहनत करते हैं
निज हाड़ गलाकर माटी में
जो पेट सभी का भरते हैं
रहते हैं छप्पर छानी में
छोटी सी राम कहानी में
वो अपने हक़ के लिये आज
हैं भटक रहे रजधानी में।

उनका विरोध करते, उनको
दुत्कार रही भारत माता!
उठ , चलो , लड़ो निज मान हेतु
ललकार रही भारत माता!!

वो नीति नियंताओं तुमको ,
क्या लाज शर्म कुछ बची नहीं!
आदेश सुनाने के पहले
क्यों जीभ तुम्हारी नुची नहीं ?
भोले भाले कृषकों पर
अत्याचार किया ये असहनीय !
है कृत्य तुम्हारा ठीक नहीं
ये बहुत बुरा है निन्दनीय!
ओ दुष्ट, दोगले नेताओं,
धिक्कार रही भारत माता!
उठ चलो , मरो निज मान हेतु
ललकार रही भारत माता !

बदहाली में जीने वाले
आश्वासन लेकर क्या करते
पानी की इन बौछारों से
निर्भय किसान हम क्या डरते?
हम अपने सारे सपनों को
अपने हाथों ही मार चुके !
अब अश्रु गैस से क्या डरते,
आँसू खुद हमसे हार चुके !
विंध्वस देखकर भीषण ये

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