अग्नि , समर , सृजन —-अनूप सिहं

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जल पावक
हर तत्व धरा का
तू शुद्ध कर ।

बरसो मेघ
चिनगारी की बूंद
जलें बाधायें ।

समर करो
मानव जीवन को
नहीं नाश को ।

धर्म सृजन
जीवन अभिलाषा
है सनातन ।

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