कृष्ण जन्माष्टमी और भक्ति का उदय—-प्रभा पारीक

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गोकुल दर्शन जैसी मनोहर झंाकी, नंद यशोदा जैसा घर , पालने में तेजस्वी बालक ,दूर यमुना का किनारा, मथुरा का कारावास ,वसुदेव देवकी कंस व पूतना संहार के द्रष्य और भक्ति की लीला, मल्ल के करतब और वृदावन,गोकुल की गायें आर गोपियां, मुरली और वनमाला छोटी सी झांकी में कितना कुछ हैं नजरों के समक्ष कृष्ण का जीवंत चरित्र।
आज घर के सभी लोगों ने गोकुल गांव बनाने में मदद करी थी। हर वर्ष की तरह मां ने सभाल कर रखी हुयी मूर्तियां बाहर निकाली पिताजी एक आध नई मूर्ति भी तो लायें हैं ंघर के नौकरों ने टेबल बाजट से बडा गांव का मैदान जैसा बना दिया हैं । बालको ने पेड़ की डालियों से हरा भरा वातावरण बना दिया और प्रकाश व्यवस्था के लिये लाईटें तो थी ही, खिलौने के रथ हाथी घेाड़े छोटा सा गोकुल और उसके पास दिखता मथुरा और फिर सभी इन्तजार करने लगे मध्य रात्री का… जन्म उत्सव मनाने का सही समय का ह्रदय में सभी के आनन्द ही आनन्द और देह में व्रत उपवास की पवित्रता। दादाजी व पिताजी ने षेाडशोपचार पूजा करी दीप अचर्ना हुयी ,दोलोत्सव हुआ किर्तन हुआ और भगवत गीता का वाचंन विष्णुसहस्त्र नाम का पाठ के बाद सभी को दिव्य आनन्द की अनुभूति हो रही थी
इतने पर घर का सबसे छोटा माधव जाग गया था सब कुछ उन्नीदी आॅखों से देख रहा था कुछ वर्षेा से वह यह उत्सव देख रहा हैं पता नही कितना समझता हैं पर बालक रूप ,िखलौने प्रकाश देख देख कर बालक ही क्यो बडे भी मेाहित हो जाते हैं
नन्हे माधव ने दादी की गोदी में बैठे बैठे ही अपनी मां से पूछा मां क्या कान्हा हर साल आते हंेै। क्या वह हर साल जन्म लेते हैं…? बालक का प्रश्न उचित… उत्तर देना भी हैं और उसकी क्षमता भी समझना जरूरी हैं मां ने कहा हाॅ बेटा…..हर वर्ष आते हैं श्री कृष्ण हमारे पास आतंे हैं ,कारण हैं कि हम अब उनसे दूर जो हो गयें है।ं इसलिये वह बार बार हमारे पास आते है। क्यों मां….? हमारे भले के लिये….बेटा खेतों को पानी चाहिये पर क्या एक बार की बरसात के बाद अगले वर्ष नहीं चाहिये। जैसे वर्षा ऋतु प्रति वर्ष आती हैं हमारे खेत सूख जाते हैं ठीक वैसे ही हमारे दिल भी सूख जाते हैं रस हीन हो जाते हैं इस लिये वर्षा भी चाहिये और जन्माष्टमी भी चाहिये … अच्छा नन्हा माधव न जैसे सब समझ गया हो ….
और फिर दादी ने कहा अब सब सुनो…….हमें प्रति वर्ष इस गोकुल गांव को और सुन्दर बनाने का प्रयास करना चाहिये जैसे हम सदा अपना आगे का जीवन प्रगति भरा उज्जवल बनाने का प्रयास करते हैं यह सरल काम नही जिस तरह मानव स्वयं का पतन करने में लगा हुआ हैं उससे धर्म की भी अधोगति हो रही है।
पर भगवान की जितनी दया, जितना चातुर्य, उतना ज्ञान किसमें हैं उन्हाने ही प्रेम का मार्ग ठूंठ निकाला हैं….देखों ना भगवान के बाल रूप को निहारो, उसे अपने अंतर में महसूस करो तो भगवान् की पूजा ही गिनी जाति हैं बाल स्वरूप हैं ही ऐसा… जिसे देख कर सभी प्रेममय हो जाता हैं भगवान को पुकारना अर्थात रामनाम लेना । बालक को प्रसन्न करना मानव की सेवा इस तरह धर्म का मार्ग सरल हो जाता हैं । किसी भी उपदेश की आवश्यक्ता नही पडती, बालक का हास्य ,स्मित, दर्शन सभी गोकुल समान ही तो हैं
जिस तरह प्रेम होने से सभी मार्ग सरल हो जाता हैं घर्म भी उतना ही सरल हो जाता हैं किसी कष्ट व भार के बिना भी ईश्वर भक्ति संभव हैं यही प्रेम का प्रताप हैं भक्ति का चमत्कार हें और इसी भक्ति को जगाने, प्रेम को उत्पन्न करने के लिये बालक का रूप उत्तम साधन हैं मोहक निर्दोश आकर्षक बालक दिल में वातसल्य जगा देता हैं और यही भक्ति का सरल रूप हैं
भगवान् को भी लगा होगा की, घर्म के पीछे लोगों ने कितनी मैहनत करी हैं ,पंडितो ने शास्त्रों की रचना की तपस्वीयों ने तपस्या की उपदेशको ने उपदेश दिये…. उनका आदर हैं मान हैं।… यह उनका पुन्य हैं पर अब जनता के समक्क्ष मार्ग खुला हैं। लोग शास्त्र पठ नही सकते सिद्धियां प्राप्त करना भी आसान नहीं हैं इस लिये सरल साधारण जनता के लिये के जीवन में सरल भक्ति के भाव में कितना पुन्य हो सकता हैं अधिक सि़िद्ध प्राप्त हो सकती हैं वह मार्ग हैं सरल प्रेम वातसल्य सौन्दर्य का।
भगवान का विचार था कि कैसे उनके जन्म लेने मात्र से उनके सरल हास्य से पूरा गांव हँसने लगा खिलखिलाने लगा । दादी ने कहा मैं इसी लिये कहती हुं कि इस दुनियां को भक्ति भरे प्रेम आन्नद स्नेह पवित्रता की अभी आवश्यक्ता हैं और इसी लिये कृष्ण को बार बार जन्म लेना होगा और अपने मनोहर रूप से वातसल्य जगा कर जगत को प्रेम का संदेश देते रहना होगा।

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