हिन्दी काव्य-यात्रा—–डॉ. श्रीमती तारा सिंह

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प्रत्येक भाषा के साहित्य के अतीत और वर्तमान में,काल प्रवाह के साथ और सांस्कृतिक परिणतियों के फल:स्वरूप कुछ शताब्दियों के साथ प्राचीन और नवीन का भेद स्पष्टत: लक्षित होने लगता है | इतिहासकार इस काल प्रवाह को स्थान-स्थान पर अलग-अलग खंडित कर, आदि, मध्य और आधुनिक नाम देकर, किसी भाषा और साहित्य की गतिविधि ,प्रगति परम्परा और विकास को उपस्थित करता है | हिंदी साहित्य का प्राचीन , नवीन अतीत और वर्तमान केवल भावधारा के आवर्त्त और परिवर्त्त , मोड़ और दिशा के भेदों के कारण ही भिन्न नहीं हैं , बल्कि आर्यावर्त्त के अधिकांश में व्याप्त ,समय-समय पर भाषा की दृष्टि से भी जो काव्य क्षेत्र में ; जो विविध प्रयोग हुए हैं | परिणाम हुआ , कि हिंदी का प्राचीन ( मध्यकालीन काव्य ) , आधुनिक काव्य से अधिक भिन्न लगता है , जब कि दूसरे अन्य भाषाओं के काव्य में इतनी भिन्नता नहीं है |
भारत के किसी अन्य आधुनिक भाषा में उतनी काव्य रचनाएँ नहीं लिखी गईं , जितनी कि हिंदी में रचित हुईं | यही कारण है कि हिंदी के अनेक भाषा रूपों में रचे मध्य- काल के काव्य, हिंदी की व्यापकता के सबसे पुष्ट प्रमाण हैं | आदिकाल में , जब अपभ्रंश का साहित्य जीवित था, उसके कुछ उपरान्त ही, ऐसी रचनाएँ मिलने लगती हैं , जिसे हम हिंदी का प्रारम्भिक रूप मानकर, हिंदी की आरम्भ रेखा को , बहुत पीछे खींचने लगते हैं | सातवीं से चौदहवीं शती तक भाषा की, जिसका कहीं कोई ठोस प्रमाण नहीं है, हिंदी का आदिकाल मानते हैं |
इतिहास कहता है , हिंदी का मध्यकाल ही आदिकाल पड़ता है | इस काल में एक से अधिक भाषा रूप में काव्य प्रणयन का आरंभ हुआ | इनमें ब्रजभाषा और अवधि का विशेष महत्त्व है | इसका बड़ा कारण धार्मिक और संस्कृति था ,क्योंकि अवताराश्रित सगुन भक्ति के उपास्यदेव कृष्ण और राम की जन्मभूमि की ये भाषाएँ हैं | इसके पूर्व राजाश्रित काव्यों की भाषा पर राजपूत राजाओं के सत्ता केन्द्रों के परिपार्श्व प्रदेश की भाषा का प्रभाव स्पष्ट झलकता है | विद्यापति द्वारा रचित ‘कीर्तिलता’ , अपभ्रंश परम्परा के अंतर्गत आता है; रस-मैथली के पदावली में भी झलकता है | इस तरह मध्यकालीन काव्य के अनेक स्थानीय और जनप्रयोगों का दर्शन होता है | हिंदी के जनभाषा होने के बावजूद तब के सुशिक्षित -सुसंस्कृत पंडितों ने काव्य भाषा के रूप में इसे नहीं अपनाया |
हिंदी के महाकवि चंद अपने भाषा ज्ञान और प्रचंड पांडित्य का प्रदर्शन पहले ही कर चुके थे | मध्यकाल के अनेक भाषा रूपों में रचे मध्यकाल के काव्य , हिंदी की व्यापकता के पुष्ट प्रमाण हैं | लगभग 1857 वि० तक मुख्यत: ब्रजभाषा हिंदी क्षेत्र की काव्यभाषा बनी रही , लेकिन खड़ी बोली हिंदी प्रदेश की नागर जनता की बोलचाल में पहले ही प्रचार हो चुका थी | मुसलामानों का इसमें प्रवेश हो जाने के कारण यह व्यवहार की सार्वजनिक भाषा बन गई | 1800 वि० जब यहाँ अंग्रेजी शासन था , तभी खड़ी बोली को लोक-व्यवहार में स्थान मिल चुका था | यही कारण है कि खड़ी बोली में गद्य रचना करने में ब्रजभाषा से कोई विवाद नहीं करना पड़ा और हिंदी गद्य-पद्य , दोनों में द्रुतगति से अपनी बुलंदी का झंडा गाड़ दी | बिक्रम की बीसवीं शताब्दी में प्रवेश के साथ ही हिंदी-प्रदेश में , परिस्थितियों की प्रेरणा से , आवश्यकता पूर्ति के लिए ‘आगरा दिल्ली की खड़ी बोली ‘ का एकक्षत्र राज स्थापित हो गया |
1857 के आसपास जब यह महसूस हुआ कि उत्तर भारत में अंग्रेजी राज, जड़ पकड़ रहा है | अब सत्ताशक्ति तथा व्यापार का केंद्र अंग्रेजों की राजधानी में रहेगा | ऐसे में मध्यकाल का अवसान होने वाला है, ऐसा उस काल के दूरदर्शी महानुभाव अनुभव करने लगे | आधुनिकता की सतत प्रेरणा ‘’ निज भाषा -उन्नति को सब उन्नति का मूल ‘‘ मानने में ,अखंड विश्वास रखने वाले , काशी के ‘कवि हरिचंद’, भारतेंदू के रूप में साहित्याकाश पर उदित हुए और हिंदी के धरातल पर अमृत-वर्षा कर, यह विश्वास दिलाने में समर्थ रहे , कि हिंदी आधुनिकता में चरण रख चुकी है | इस तरह हिंदी का मध्यकाल ही स्वर्णिम काल है; सर्वाधिक समृद्ध काल है | विद्यापति से हरिश्चंद्र तक साढ़े पांच सौ वर्षों की अवधि में ही उन महाकवियों का उदय हुआ , जिन्होंने हिंदी को फर्श से अर्श तक पहुँचाने में काफी मदद की | इस हिंदी भाषी समाज की भावनाओं और आकांक्षाओं का धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना का स्वर मुखरित हुआ |
मध्यकाल के पूर्व एक ही कवि हुए, जिनका नाम था, चंदबरदाई | उन्होंने ‘ पृथ्वीराज रासो’ नामक महाकाव्य लिखकर बहुत नाम कमाया , लेकिन इस महाकाव्य को लेकर पक्ष -विपक्ष में लेखकों की तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ आईं | किसी ने इसे शुद्ध, तो किसी ने मिथ्या करार दिया | हिंदी नाम किसी प्रदेश की भाषा का नहीं है , बल्कि उस क्षेत्र की बोलियों का एक व्यापक नाम है , जो क्षेत्र हरियाणा -सीमा के पूर्व से आरम्भ होकर बंगाल के पश्चिमी छोर तक और दक्षिण में मध्य प्रदेश के हिंदी-भाषी क्षेत्र तक फैला हुआ है | इस विशाल भाग में मध्यकाल में , मुस्लिम शासन काल में इसे हिन्दुस्तान भी कहा जाता था | उसी हिन्दुस्तान के कारण आज भी बंगाल में, दक्खिन में हिंदी भाषी को हिन्दुस्तानी कहा जाता है |
पृथ्वीराज के पराजय के बाद ,हिंदी क्षेत्र में कोई ऐसा प्रतापी राजा नहीं हुआ चूँकि यह राजवंश संस्कृत और वैदिक धर्मानुयायी था | हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार, यही कारण है कि वे लोग अपने प्रदेश में हिंदी भाषा और उसके साहित्य को आश्रय नहीं दिए | इसी कारण , हिंदी क्षेत्रों में कवियों को राजाश्रय नहीं मिला | अत: हिंदी भाषा धीरे-धीरे लोगों से दूर होती चली गई | बावजूद हिंदी लोकाश्रय पाकर , प्रचारित और प्रसारित होती चली गई | राजाश्रय में जो कवियों को संरक्षण मिलता है , उससे अधिक धर्माश्रय और लोकाश्रय स्थाई है | भक्तिकाल में भक्तों और संतों का साहित्य लोकाश्रय और धर्माश्रय पाकर समस्त हिंदी क्षेत्र में फैला | हिंदी क्षेत्रों में भक्ति आन्दोलन के पूर्व सबसे अधिक प्रभावशाली धार्मिक सम्प्रदाय गोरख पंथी नाथ योगियों का था | लगता है, उस काल में अपनी सिद्धियों और चमत्कारों के कारण हिंदी क्षेत्र पर गोरखपंथियों का ही सबसे अधिक प्रभाव था | कबीर को गोरखपंथ, भक्ति से विरहित होने के कारण पसंद नहीं था, कारण इस मार्ग में भक्ति से अधिक ज्ञान और योग का महत्त्व है | तिब्बत से जो चौरासी सिद्धों की सूचि मिली है , उससे पता चलता है कि गोरख और मलयेन्द्रनाथ को बौद्धों की सूचि में भी स्थान मिला है | सिद्ध साहित्य की भाषा अपभ्रंश है, पर ‘गोरखवाणी’ जिस रूप में उपलब्ध है, वह पुरानी हिंदी है |
जब तक कोई बोली साहित्य रचना द्वारा ,पूर्णत: भाषा के रूप में प्रतिष्ठित नहीं हो जाती, और उसमें किसी महान कृति की रचना नहीं हो जाती, तब तक वह भाषा स्थिर नहीं होती कि प्रचंड प्रतिभा के लेखक के उदय होने के बाद ही ,उसकी भाषा मापदंड बन सकती है | खड़ी बोली गद्य के इतिहास से यह पता चलता है ,कि हरिश्चन्द्र जैसे लेखक का उदय होने के बाद से ही खड़ी बोली सँवरने और निखरने लगी | कवि रूप में गोरखनाथ से कबीर बहुत ऊँचे हैं | उसके बाद विद्यापति और जायशी आते हैं , जिन्होंने पद्मावत की रचना जनभाषा अवधि में की | कबीर में भोजपुरी बोली की विद्यमानता के प्रमाण मिलते हैं | उनके साहित्य में संस्कृत को भी यह सौभाग्य प्राप्त है | हिंदी वस्तुत: उस बड़े क्षेत्र की अनेक उपभाषाओं का एक समुच्चयबोधक नाम है , जहाँ अवधि ,ब्रजभाषा और खड़ी बोली , राजस्थानी , मैथली और भोजपुरी में समय -समय पर रचनाएँ होती रहीं | हिंदी एक छोटे सीमित क्षेत्र की भाषा नहीं है | अत: इन्हें अनेक भाषा का साहित्य होने के कारण , एकरूपता का प्रश्न उठाना उचित नहीं है |
मध्यकाल में हम देखें ,तो हिंदी काव्यक्षेत्र अनेक बोलियों या विभाषाओं के जल से उर्वर हुई है | ‘हिंदी’ नाम वस्तुत: किसी प्रदेश विशेष कि भाषा का नहीं है | यह तो हरियाणा सीमा के पूर्व से होकर बंगाल के पश्चिमी छोर तक और दक्षिण में मध्यप्रदेश के हिंदी भाषी क्षेत्र तक फैला हुआ है | इस विशाल भाग को मुस्लिम शासन काल में हिन्दुस्तान भी कहा जाता था | हिन्दुस्तान नाम के कारण ही बंगाल और दक्खिन में हिंदी-भाषी लोगों को हिन्दुस्तानी कहा जाता है | साहित्य के इतिहास में आदिकाल और मध्यकाल की सीमाएँ भाषा भेद, अवस्था भेद और साहित्यगत प्रवृति भेद आदि के आधार पर निर्धारित होती है | ऐसे तो काल अनादि -अनंत चिर प्रवाहमान है , इसे टुकड़ों में कोई बाँट नहीं सकता ; पर मनीषियों ने चिंतनक्षण को भूत, वर्तमान, और भविष्यत् कहकर इसे परिभाषित किया |
कहा तो यह भी जाता है ,’पृथ्वीराज रासो’ अपभ्रंश में ही रचा गया था | बाद में उसकी भाषा का अनुवाद डिंगल में कर दिया गया | ब्रज और अवधि में रचित काव्यों को कभी राजाश्रय प्राप्त नहीं हुआ | अवध के जायसी , काशी के कबीर , ब्रज के अष्टछाप कवि , तुलसीदास और नाभादास इत्यादि संत महात्माओं को न तो राजाश्रय की अभिलाषा थी , और न ही उनके काल में कोई स्वतंत्र प्रतापी हिन्दू राजा हुआ | ब्रजभूमि अवध और पूरब के काशी अंचल, सब पर तुर्कों का आधिपत्य था, केवल मिथिला में विद्यापति के समय एक हिन्दू राजा का राज बना रहा | फलस्वरूप वहाँ राजभाषा में संस्कृत और स्थानीय बोलचाल की भाषा मैथली को राजाश्रय में फलने-फूलने का मौक़ा मिला |
दिल्ली में चूँकि सुदृढ़ मुस्लिम शासक था, अत: उसके आश्रय में खड़ी बोली पर फ़ारसी रंग चढ़ने लगा , और धीरे-धीरे फ़ारसी लिपि का जामा पहनाकर , मुस्लिम शासक-वर्ग हिंदी को जनभाषा के रूप में अपना लिये | अब हिंदी मुस्लिम लिवास में , फ़ारसी आवरण में ‘हिन्दुई’ लगने लगी ,जो हिन्दू कवि का प्रिय नहीं बन सका | जब मुसलमान शासक दक्खिन में पैर बढाया , और वहाँ के हिन्दू राजाओं को हराकर अपना शासन केंद्र स्थापित किया, तब, उत्तर भारत के मुस्लिम राजाओं ने धर्म के साथ इस बोली को भी स्थापित कर दिया | वहाँ उत्तर की यह खड़ी बोली दखिन के नाम से राजा के सामान्य वर्ग की भाषा के रूप में प्रचलित हो गई | मुसलमान, फ़ौज, सरदार सिपाहियों , सौदागरों , अमल हाकिमों के द्वारा इस हिंदी बोली का, मुस्लिम केन्द्रों में प्रवेश हुआ, और धीरे-धीरे हिंदी, मुस्लिम के शिष्ट- वर्ग में सम्मान पाने लगी , मुस्लिम शासक के सहयोगियों के साथ इसका व्यवहार बढने लगा | इसके बाद हिंदी, काफी संघर्ष के बाद दिल्ली, आगरा , लखनऊ , निजाम राज्य में हैदराबाद , गोलकुंडा , पटना , मुर्शिदाबाद , कलकत्ता आदि शहरों में, हिन्दू-मुस्लिम समाज में व्यवहार और पारस्परिक सम्पर्क की भाषा बन गई |
राजा बिक्रमादित्य , राजाभोज , हर्षवर्धन इत्यादि की राजभाषाओं की परम्पराओं से हम परिचित हैं , जहाँ कवियों की काव्य परीक्षा होती थी | हिन्दू राजाओं की छत्रछाया में यह सब मध्यकाल में भी चलता रहा | अकबर के समय दरवार में दर्जनों हिंदी-कवियों को सम्मान मिला , जिनमें गंगकवि , बीरबल, टोडरमल, रहीम इत्यादि प्रमुख थे | इन्हें पुरस्कृत भी किया गया | इस प्रकार हिंदी अपनी यथा-व्यथा और चुनौतियों के साथ बढ़ती रही , लेकिन यह अपनी मंजिल को तब पायेगी, जब हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा होगी |

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