शिव उवाच ——सुशील शर्मा

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पूजन तुम्हारी कैसे स्वीकार करूँ।
मन मैला तन का कैसे आधार करूँ।
भाव नही पूजन के तेरे मन में फिर।
भोग को बोलो कैसे अंगीकार करूँ।

हर तरफ मुखोटों की भरमार है।
जिसको देखो वही गुनाहगार है।
अब नही ईमानों का मौसम यहां।
हर शख्स पैसों का तलबगार है।


हर शख्स से मैं जब भी मिला।
अंदर से मुझको वो टूटा मिला।
हर चेहरे का एक अलग विन्यास है।
हर चेहरे के ऊपर मुखोटा मिला।

हर जगह मंदिरों में पत्थर रखे।
मेरी सूरत मैं मुझको मुखोटे दिखे।
सोने चांदी में मेरी पूजन बिकी।
मन के कौने मुझे सब खाली दिखे।

दीन दुखियों का कष्ट हरता हूँ मैं।
टूटे दिलों की मदद करता हूँ मैं।
एक विल्वपत्र बस चढ़ाना मुझे।
जीवन को सुखों से भरता हूँ मैं।

सबने पूजा मुझे अलग ताव से।
सबने मांगा मुझे अलग चाव से।
जिसका दामन था जितना बड़ा।
उसको ज्यादा दिया उसी भाव से।

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