(ii) मर्त नर को देवता कहना मृषा है—डॉ. श्रीमती तारा सिंह

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तोड़कर युग के बंद कारागारों को
सभी बंदियों को बाहर निकाल
क्या पता ,यहीं कहीं मिल जाये हमारा
खुदीराम , भगत सिंह और आज़ाद

खिसक गई है शृंखला सितारों की
वणिक तुला पर चढ़ी हुई है,बुधिलोगों की
ध्वनि में है शब्दों का अर्थाभाव
शब्दों के भीतर से आविष्कृत कर
नया कोई शब्दों का तलवार , उसे
थमा दो भगत सिंह के फौलादी हाथों में
आतंकियों के आतंक से मूर्च्छित है संसार

गाँधी के शिष्य –सखा-सहचर ,जवाहर को पुकारो
कहो, भारत की वायु संग आज उड़ता है पावक-कण
जिसकी तप्त उमस से,छटपटा रही जीवन की डाल
मानव मन का सूख चला हृदय प्रशांत , इसलिए
जीवन का झंडा खोजकर किसी भगीरथ को थमा

संस्कृति के नये – नये कोपलों को भेदकर
उभर रहा है नया-नया प्रभंजन महानाश का
आकांक्षाओं के मधुपों से , शाश्वत गुंजित
मानव जीवन के कानन में कलियाँ अब रोदन करतीं
मानवकृत भ्रांत बुद्धि की प्रेत समस्याएँ
रक्त – पित्त – सित कमल खिलातीं




अश्रु सजल रहने लगा भारत का आनन
तुम निःस्वर सहज मधुरिमा के अंतर पथ से
एक बार फिर धरती पर उतरो, इन आतंकियों
को आगाही दो , इन्हें समझाओ , इनसे कहो
मानव जीवन की इस कनकपुरी में मानवता ही
परम धर्म है , बाकी धर्म धोखा और छल है

अगर सचमुच धर्म ही उनका ध्येय है
तो अपने बल – वीर्य को आहों में न तौले
दानी रक्त से सभी पाप धुल जाते हैं
अपना रक्त ,देश और देश की सम्प्रभुता को दे दे
नहीं मानें तो , सोचकर किस्मत की नाराजगी
यह खेल मरण का हम भी खेलेंगे , दंश मारने
विरच रहे हैं जो सर्प , उसका सर कुचलेंगे
ऐसे भी जब अवनी को आलिंगन में व्योम कसेगा
तब यह आप ही आप अपना फन तोड़ेगा

हमें सुर समझकर , यह असुर हम पर हँसता है
मगरमच्छ नोचता देह का मांस ज्यों,हमें नोचता है
जब यह जानेगा, मर्त नर को देवता कहना मृषा है
देवता सदैव शीतल होता , नर अंगार होता है
समय की पुकार पर,दस्यु- शेर को भी हूल सकता है
यह देश आज भी वीर शिवाजी और आज़ाद का है

जिसके दहाड़ को सुनकर पहाड़ डोलता है
जिसे देखकर क्षितिज का अंतस्तल हिलता है
जिससे सहमकर समंदर चुप , शांत रहता है
उसके भारत माँ की छाती को बंदूकों से भेदना
आसान नहीं,बल्कि जय-जयकार करना श्रेयस्कर है

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