माँ आती है तुम्हारी बहुत याद —— डॉ० श्रीमती तारा सिंह

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तुम संग बिताई हर वो लम्हें
आती है मुझे बहुत याद
छिल जाता है कलेजा
आँखों से होने लगाती बरसात
माँ, मुझे आती है बहुत याद

वो बाबू के संग बरामदे में बैठकर
काँसे की थाली में गरम-गरम
मक्के की रोटी और चने का साग
कुँए का पानी , कांसे का गिलास
माँ, मुझे आती है बहुत याद

वो मिट्टी के विरवे में
काली गाय, रमिया का दूध
उपले की आंच पर उबलता हुआ
चूल्हे के ऊपर कांटी से लटकता
वो फुकनी और लोहे का चिमटा
माँ, मुझे आती है बहुत याद

वो टपकता छप्पर
और वो पौष की ठिठुरती रात
आटे का खाली कनस्तर
ठाठ से दीखता आकाश
माँ, मुझे आती है बहुत याद

वो आँगन बीच तुलसी-चौरा
और तुम्हारा छोटा – सा बाग़
जिसमें खिलता था पूजा का फुल
चम्पा , गेंदा , चमेली , गुलाब
माँ, मुझे आती है बहुत याद

वो छोटा सा तुम्हारा रसोई घर
जहाँ होता था बटन और वो लालटेन
जिसे नानाजी ने दिया था
तुमको शादी पर उपहार
माँ , मुझे आती है बहुत याद

गोबर से सना वो तुम्हारा
ममता वाला प्यारा हाथ
जो दिन भर करता था उपले तैयार
और मैं थी गोद के लिए उतारू
तुम्हारे कंधे पर सवार
माँ, मुझे आती है बहुत याद

घर- गृहस्थी , बच्चे, परिवार
सब के संग अपना अंग बाँट
आज तुम कहाँ गम हो गई ,माँ
फटी-पुरानी एलबम में चंचल
लड़की -सी दीखने वाली माँ
आती हो तुम बहुत याद

आधी सोई ,आधी जागने वाली माँ
हर आहट पर कान धरने वाली माँ
भड़कते शोलों से भी सुख की
ठंढक निकाल कर देने वाली माँ
मुझे आती है, तुम्हारी बहुत याद

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