जिस निगाह से बचने में मेरी उम्र गुजरी–डॉ. श्रीमती तारा सिंह

Facebook
Twitter
LinkedIn

जिस निगाह से बचने में मेरी उम्र गुजरी
शामे-जिंदगी मुझे उसी से मुहब्बत हो गई

गमे दो जहां क्या कम थे
जो राहत में एक और मुसीबत हो गई

उसके नजदीक तसलीमों-रजा1 कुछ नहीं
मुझे सितम पर सब्र करने की आदत हो गई

जिसने दिल खोया,उसी को कुछ मिला,फ़ायदा
जब देखा नुकसान में तब दिक्कत हो गई

इश्क आग नहीं जो राख में दवा देता,मुहब्बत
की इबादत2 में शराब पीने की आदत हो गई


1. आत्म स्वीकृति 2. पूजा

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Social media & sharing icons powered by UltimatelySocial