इंटरभ्यू का चक्कर — अंकुश्री

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‘विजय बाबू का पता ठीक से रख लिया है न ? उन्हीं के डेरा पर ठहरना – – -.’’ पिताजी ने चलते समय उसे फिर हितायद कर दी.
इंटरभ्यू लेटर मिलने पर हर बार की तरह इस बार भी उसे नौकरी की एक आषा हो गयी है. उसकी नौकरी के लिये उससे अधिक उसके पिताजी चिंतित हैं. वह अपनी नौकरी के लिये इसलिये चिंतित है, क्योंकि वह पढ़-लिख चुका है और हर छोटी-बड़ी आवष्यकता के लिये पिताजी पर आश्रित है. पढ़ने-लिखने के बाद लोग नौकरी करते हैं, इसलिये वह भी करेगा. लेकिन उसके पिताजी इसलिये चिंतित हैं कि उनका लंबा-सा पूरा परिवार केवल उन्हीं पर आश्रित है और वे जल्द ही रिटायर करने वाले हैं. इतने दिनों से सरकारी सेवा में रहने के बावजूद उसके पिताजी परिवार चलाने में कर्ज से ढ़के रहते हैं. यदि वे रिटायर कर जायेंगे तो उनके परिवार का क्या होगा ! उसके पिताजी इसी चिंता में घुलते रहते है. जब-जब उसके नाम इंटरभ्यू लेटर आता है, उसके पिताजी उम्मीदों की दुनिया में खो जाते हैं. घर से निकलने पर उसके पिताजी तब तक लकड़ी के टूटे गेट के पास खड़े रहते हैं, जब तक वह गली के मोड़ से मुड़ कर उनकी आंखों से ओझल नहीं हो जाता है.
उसे बस पकड़नी है. रिक्षा से बस डिपो जाकर वह काउंटर पर टिकट कटाने के बाद जब बस में चढ़ता है तो देखता है कि उसमें काफी भीड़ है. खचाखच भीड़ में वह अपने को भी ठूंस लेता है. उसे लग रहा है कि गोदाम में लगे बोरों की छल्ली में वह भी एक बोरा है, ऊपर-नीचे से तो नहीं, मगर अगल-बगल से पूरी तरह दबा हुआ. दमघूटन के वातावरण में वह खड़ा है. सड़क के दोनों किनारों पर खड़े पेड़ों को पीछे छोड़ती हुई बस आगे बढ़ी जा रही है.
जब वह बस से नये शहर में उतरता है तो लोगों की भीड़ तो उसके शहर की तरह ही दिखायी देती है, लेकिन उसके शहर की भीड़ में कुछ चेहरे उसके परिचित हुआ करते हैं और यहां सभी अनजाने हैं. यहां के लोग तो लोग, सड़कें भी अनजानी हैं, गलियां भी अनजानी हैं. यहां की हवा अनजानी है, पूरा वातावरण अनजाना है. अनजाने लोगों से पूछपाछ कर वह अनजानी सड़कों पर चल पड़ता है.
अपने पिताजी के विभागीय मित्र विजय बाबू के यहां पहुंच कर उसे खुषी होती है. उसके पिताजी का नाम सुन लेने के बाद जब विजय बाबू को यह पता चलता है कि वह उनका लड़का है तो वे उसका स्वागत करते हैं. वे अपने पड़ोसी के असोरे में उसके ठहरने की और नज़दीक के एक होटल में उसके खाने की व्यवस्था कर देते हैं. यह व्यवस्था उसे काफी अच्छी लगती है, क्योंकि इस्पात नगरी कहे जाने वाले इस शहर में, जहां उसे कोई जानता तक नहीं, यहां तक विजय बाबू भी उसे नहीं जानते, कम से कम रात काटने के लिये उसे एक सुरक्षित जगह तो मिल जाती है.
दूसरे दिन बहुत सबेरे उसकी आंखे खुल जाती हैं. चारों ओर फैले हुए घुप्प अंधकार में लौह-धमन भट्ठी से निकल रहा प्रकाष आकाष में सूर्य की लालिमा फैलने का भ्रम पैदा कर रहा है. लग रहा है कि सूर्य अब निकलने ही वाला हो. लेकिन कुछ देर बाद विजय बाबू उठ कर आते हैं तो उसके भ्रम का निराकरण कर देते हैं. वे बताते हैं कि जिधर लाली दिखायी दे रही है, वह दिषा उसके पूर्व में नहीं, पष्चिम-उत्तर के कोने में है.
विजय बाबू अपने साथ ले जाकर उसे शौचालय दिखा देते हैं. लंबी-सी कतार में कई शौचालय बने हुए हैं. वहीं पर वह एक पार्कनुमा स्थान पर खड़ा हो जाता है. उससे पहले आये बहुत से लोग अपनी बारी की प्रतीक्षा में पंक्ति में खड़े हैं. करीब घंटा भर बाद उसकी बारी आती है. शौच से फारिग होकर जब वह पास के नल पर धमन भट्ठी से निकली छाई वाली मिट्टी लेकर हाथ मांजने जाता है तो उसे वहां भी पंक्ति में खड़ा होना पड़ता है. अपनी बारी आने पर वह स्नान भी कर लेता है, लगे हाथ.
जब विजय बाबू तैयार हो जाते हैं तो वे उसे साथ लेकर बस स्टैंड तक पहंचा देते हैं. बस आती है तो वह उस पर चढ़ जाता है और बस खुलने पर विजय बाबू को प्रणाम करके अपना हाथ हिला देता है.
तीस पैसे में एक स्टाॅपेज तय कर लेने के बाद वह दूसरी बस पकड़ने के लिये सड़क की दूसरी ओर मुड़ जाता है. वहां से बस पकड़ कर तीस पैसे में वह ‘एनेमल’ पहुंच जाता है. यहीं आठ बजे से उसका इंटरभ्यू होने वाला है. वह समय से डेढ़ घंटा पहले ही पहुंच गया है. अहाते के बाहर दो लड़के खड़े हैं. पूछने पर पता चला कि वे दोनों भी उम्मीदवार हैं. उन्हीं दोनों के साथ वह भी खड़ा हो जाता है.
धीरे-धीरे और उम्मीदवार आने लगते हैं. कुछ देर में पच्चीस-तीस उम्मीदवार आ जाते हैं. ज्यादा लड़के हैं. तीन लड़कियां भी हैं. कुछ देर में दरबान आकर फाटक खोलता है तो सभी उम्मीदवार अंदर चले जाते हैं. लाॅन की मखमली दूब ओस की बूंदों से भरी हुई है. सूरज का प्रकाष पड़ने से दूब पर गिरे ओस मोती की तरह चमक रहे हैं. लड़के लाॅन में इधर-उधर चहलकदमी करने लगते हैं.
कुछ देर में धूप कुछ तेज हो जाती है जिससे जाड़ा कम होने लगता है और ओस भी सूखने लगती है. लड़कों की चहलकदमी से भी कुछ ओस सूख गयी है. आधा घंटा बाद सिमसिमायी हुई घास पर लड़के जहां-तहां बैठने लगते हैं. दो-दो, चार-चार और कहीं-कहीं अकेले ही बैठ कर लड़के शाॅर्टहैंड की प्रैक्टिष करने लगते हैं. कहीं-कहीं किसी दूसरे विषयों पर ही गुलछर्डे़ उड़ रहे हैं.
आठ बजते-बजते काफी भीड़ इकट्ठी हो जाती है. करीब डेढ़ हजार लड़कों की भीड़ में वह भी चार लड़कों के साथ बैठा हुआ है. बैठे हुए लड़कों में से एक उसी के शहर से आया है. बाकी दो कलकत्ता शहर के हैं. चारों लड़कों के साथ बैठा वह भी प्रैक्टिष कर रहा है. प्रैक्टिष कर लेने से जाड़े के कारण ठिठूर गयी अंगुलियों में गर्मी-सी आ जाती है और वे गतिमान हो जाती हैं.
इंटरभ्यू शुरू होते-होते नौ बज गया है. तीस-तीस लड़कों के क्रमांक एक साथ पुकारे जाते हैं. उसका क्रमांक 176 है. वह छठे बैच में पुकार लिया जाता है. उसके बैच के तीस उम्मीदवारों में मात्र इक्कीस उपस्थित हैं.
चार मिनट का इंगलिष डिक्टेषन होता है. उसके बाद पूरे बैच के साथ उसे एक अलग कमरे में ट्रांसक्राइब करने के लिये ले जाया जाता है. ट्रांसक्राइब कर लेने के बाद टाइप के स्पीड टेस्ट के लिये दस मिनट का एक पैसेज दिया जाता है. टाइप के बाद वह बाहर निकल आता है. उसके बाद कुछ दूर हट कर एक कमरे में अकेले में बुला कर उसका सर्टिफीकेट देखा जाता है और कुछ पूछताछ की जाती है.
उसे पता चलता है कि इंटरभ्यू में डेढ़ हजार लड़के उपस्थित हुए हैं. पदों की संख्या मात्र छह है. चयन किये जाने वाले छह नामों में क्या उसका भी एक नाम रहेगा ? यह सोच कर वह थोड़ा असंतुष्ट हो जाता है. लड़के, जो उसके बाद के बैच में जाने वाले हैं, उससे पूछते हैं – कैसा रहा ? पैसेज कैसा था ? स्पीड कैसी थी ? जवाब देते हुए वह लाॅन के पास पोर्टिकों में आ जाता है. अगले बैच में जाने वाले उम्मीदवार उसे वहां लाॅन तक घेरे रहते हैं. टेस्ट देकर निकलने वाले अधिकतर लड़कों के साथ ऐसा ही हो रहा है. वह तेज कदमों से चल कर दो मिनट में ही इंटरभ्यू के पूरे माहौल से बाहर आ जाता है.
अब उसे भूख लग रही है. सुबह आठ बजे थोड़ा जलपान करके अंदर घुसा था. अब साढ़े बारह बज रहा है. पास के एक ठेला के नज़दीक जाकर वहां खड़े लोगों में वह भी शामिल हो जाता है. कुछ देर ताकने के बाद उसके हाथ में भी समोसा का एक प्लेट आ जाता है. इस बीच ठेले वाले को चाट बनाते और वहां खड़े लोगों को खाते देख कर उसके मुंह में पानी भर आया है. हाथ में प्लेट आते ही मुंह का पानी वह घोंट जाता है. चमच से समोसे को तोड़ कर उसमें छोला मिलाने के बाद वह जल्दी-जल्दी खाने लगता है.
प्लेट खाली हो जाने के बाद वह एक प्लेट और लेने की सोचता है. मगर मिर्च-मषाला अधिक होने से दूसरे प्लेट लेने की उसकी इच्छा खत्म हो जाती है. गिलास के पानी से हाथ-मुंह धोकर बचा हुआ पानी गटगटा जाता है. पास में रखे पानी का दूसरा गिलास भी वह उठा कर खाली कर देता है. पैसा चुकाने के बाद वह पास वाले चैराहे पर आ जाता है. मिनी बस से एक स्टाॅपेज चल कर वह बस स्टैंड पहुंच जाता है. डेढ़ दिनों में ही इस्पात नगरी के बहुत-से चैराहे, बहुत-सी सड़कें, बहुत-सी दुकानें, जहां से कल से अब तक वह गुजर चुका है, उसे जानी पहचानी-सी लगने लगी है.
अभी डेढ़ बजा है. तीन घंटे में वह राज ट्रांसपोर्ट की बस से वापस अपने घर पहुंच सकता है. वह सोचता है कि यदि चार या पांच बजे भी यहां से चलेगा तो सात-आठ बजे तक घर पहुंच जायेगा. इस तरह तीन-चार घंटे का उपयोग वह नया शहर घूमने में कर सकता है.
पहले वह बस स्टैंड के पास एक होटल में जाता है. वहां खाने के लिये बस के कंडक्टर, ड्राइवर और खलासियों का नंबर लगा हुआ है. होटल में स्टाफ के अलावा कुछ बाहरी लोग भी बैठे हुए हैं. वह भी एक प्लेट चावल मांग कर खाली पड़े एक टेबुल के सामने पड़ी बेच पर बैठ जाता है. बेंच काफी पुरानी है, जो उसके बैठते ही हिल जाती है.
कुछ देर में दाल खत्म हो जाती है और फिर सब्जी भी. वह सोचता है कि दाल और सब्जी के लिये उसे चिल्लाना पड़ेगा. खाते समय घटे हुए सामान के लिये वह कभी चिल्लाया नहीं है. खिलाने वाला खुद ही उसे पूछ-पूछ कर खिलाता है. खाने के समय उसे चिल्लाने का मौका कभी-कभी आया जरूर है. लेकिन ऐसे मौके पर वह बिना खाये ही उठ गया है, चिल्लाया नहीं है. मगर यहां बिना चिल्लाये उसे दाल या सब्जी मिलने को नहीं है. आधा पेट खाकर उठना ठीक नहीं है. यही सोच कर वह चिल्लाना चाहता है. तभी उसके बगल के सज्जन की थाली की दाल खत्म हो जाती है और वे चिल्लाने लगते हैं. तीन-चार हांक लगाने पर उन्हें दाल मिल जाती है. बेयरा जब बगल में दाल देने आता है तो उसका प्लेट खाली देख कर एक प्याली दाल उसके प्लेट में भी लाकर उड़ेल देता है. उसे सब्जी भी मिल जाती है.
खा चुकने के बाद वह हाथ-मुंह धोकर दो रुपये आठ आने कांउटर पर जमा करता है और अपना हैंड बैग लेकर पास की पान-दुकान पर चला जाता है. पान खाते समय वह दुकानदार से उस शहर की किसी घूमने या देखने लायक जगह की जानकारी लेता है तो पता चलता है कि एक झील है. लेकिन नये आदमी को वहां दिन के दस-ग्यारह बजे तक चला जाना चाहिये. देर से जाने पर लौटते-लौटते रात हो जाती है और उघर का इलाका ठीक नहीं है. पान वाले की बात सुन कर वह घूमने जाने का अपना इरादा बदल देता है.
बस स्टैंड में जाकर टिकट लेता है और पास खड़ी बस में बैठ जाता है. डेढ़ बजे बस खुलने का समय है. मगर दो बजे तक बस नहीं खुल पायी है. पता चलता है कि कंडक्टर अपने घर में सोया हुआ है. सवारियों से लदी समूची बस कंडक्टर के घर से होती, उसे लेती हुई आगे बढ़ती है. वह कंडक्टर और कंडक्टरी के बारे में सोचने लगता है. सोचते-सोचते वह अपनी नौकरी की बात पर आकर रुक जाता है.
वह सोचता है कि नौकरी के लिये वह कितना लालायित है. कोई क्लर्कियल जाॅब उसे किसी तरह मिल जाये – इसके लिये लगातार तीन वर्षों से वह परेषान है. पहले मात्र अंडर ग्रेजुटट था, अब तो उसने हिन्दी और अंग्रेजी में शाॅर्टहैंड और टाइप सीख कर उसमें अच्छी गति भी हासिल कर ली है. मगर उसे नौकरी नहीं मिली है.
बस रास्ते में दो-तीन जगहें रुकती है. एक जगह लोग चाय-नास्ता के लिये उतरते हैं. वह भी उतर कर टहलने लगता है. उसे भूख नहीं है. कुछ करना चाहिये, इसी टेंपोरेरी इंगेजमेंट के खयाल से वह पान की दुकान पर खड़ा हो जाता है. सात-आठ मिनट खड़ा रहने के बाद उसे भी पान मिल जाता है. दो काला-पीला-सेंका खाकर चूना लेने के बाद वह बस के पीछे छाया में खड़ा हो जाता है.
एक बूढ़ा भिखारी खड़े अन्य सवारियों से कुछ मांगते-मांगते उसके सामने आकर हाथ पसार देता है. वह अपनी जेब में हाथ डाल लेता है. तभी दो तरफ से एक-एक और भिखारी आ जाते हैं. पांच-पांच पैसे के दो सिक्के हैं. वह दो भिखारियों में बांट देता है. तीसरे को देने के लिये दस पैसे का सिक्का हाथ में आता है. उसे वही दे देता है. तीनों भिखारी चले जाते हैं. कभी भी वह भिखारियों को लौटाता नहीं है – शायद यह सोच कर कि उसे भी किसी के आगे जाने पर निराष न होना पड़े. लेकिन उसे अब तक के जीवन में निराषा के अलावा कुछ मिला ही नहीं है. हां, कुछ लोगों से कुछ आष्वासन जरूर मिल जाता है, कुछ आषाएं जरूर मिल जाती हैं.
संबंधियों ने उसे हमेषा आष्वासन ही दिया है. उसके संबंधी लोग अच्छे पदों पर हैं. एक-डेढ़ हजार रुपये से कम वेतन वाले तो हैं ही नहीं. लेकिन इस बात पर उसे अफसोस ही करना पड़ता है कि वह अब तक बेकार है. अब तक अपने संबंधियों से नौकरी के नाम पर उसे क्या मिला है ? परेषानी और खर्च के अलावा उसे और कुछ मिला है तो वह है आष्वासन और उपेक्षा. इसी कारण अब वह अपने साथियों को यह सीख देने लगा है कि उन्हें जिंदगी में यदि कुछ करना है तो वे यह भूल जायें कि उनका कोई संबंधी भी है, जो उसके काम आयेगा.
खलासी के सीटी बजाते ही लोग बस में बैठने लगते हैं. वह भी अपनी सीट पर बैठ जाता है. बस खुलने पर वह किनारे के पेड़ों को देखने लगता है. कुछ पेड़ों पर चार-चार, पांच-पांच मीटर ऊंचाई तक दीमक की मिट्टी ढ़ंकी हुई है. उन पेड़ों पर उसे तरस आ जाता है. बेचारा कितनी बुरी तरह दीमकों के चंगुल में फंस कर नीचे से ऊपर तक ढ़ंक गया है. उसे अपने पिताजी की दयनीय स्थिति की याद आ जाती है. वे भी अपनी पारिवारिक आवष्यकताओं को पूरा करने के लिये दीमक से ढ़ंके पेड़ की तरह कर्ज से ढ़ंक गये हैं. पिताजी को कर्जखोर बनाने में उसका भी हाथ कम नहीं है.
मात्र आवेदन करने और जांच तथा साक्षात्कार के लिये जाने-आने में ही वह अपने ऊपर पिताजी का अच्छा खर्च करा देता है. आवेदन करने में पांच-दस रुपये के पोस्टल आर्डर तो हर विभाग का नेग हो गया है. किसी-किसी जगह तो बीस या इससे अधिक भी देने पड़ते हैं. आवेदन टाइप करने-कराने के लिये कागज, कार्बन आदि का खर्च तो लगता ही है, रजिस्टर्ड पोस्ट से भेजने में भी ढ़ाई-तीन रुपये लग जाते हैं. फोटो चाहिये सो अलग. शाॅर्टहैंड की प्रैक्टिष कंटीन्यू रखने के लिये इंस्टीच्यूट का फीस भी देना पड़ता है. और जब इंटरभ्यू आता है तो यात्रा का दूसरा ही खर्च माथे पर आ जाता है. वह सोचता है, पता नहीं, कब तक रिटायरमेंट की कब्र में पांव लटकाये अपने बूढ़े पिताजी को वह पैसों के लिये तंग करता रहेगा. वह करे तो क्या करे ? उसे समझ में नहीं आता है. नज़दीक हो या दूर, टेस्ट और इंटरभ्यू के लिये उसे जाना ही पड़ता है. बिना इंटरभ्यू दिये तो नौकरी मिलने से रही और इंटरभ्यू के लिये जाने-आने में खर्च का दिवाला निकल जाता है.
बस उसके ठीकाने के शहर में पहुंच गयी है. बस से उतर कर वह टैक्सी से अपने डेरा तक आता है. पिताजी सामने बैठे मिल जाते हैं. उसे देख कर पिताजी की निगाहों में प्रष्न उमड़ पड़ता है. लेकिन वे कुछ पूछते नहीं हैं. वह कपड़ा बदलते हुए स्वयं जिला-षरहद पर तैनात सिपाही की तरह इंटरभ्यू-यात्रा का दास्तान सुनाने लगता है.
तभी आफिस का चपरासी आकर उसके पिताजी को एक लिफाफा थमा जाता है. लिफाफा खोलते ही पिताजी कहते हैं – इंटरभ्यू लेटर है. पैंट के ऊपर से तौलिया लपेटे ही वह लेटर देखने लगता है. डाक-तार विभाग से टेस्ट और इंटरभ्यू के लिये बुलावा आया है. कल ही है. 120 किलो मीटर दूर से इंटरभ्यू देकर आते ही 420 किलो मीटर दूर से इंटरभ्यू लेटर आ गया है.,
अधूरा खोले हुए कपड़े को पुनः पहने कर अपनी निगाह पिताजी की ओर करके समर्पण के भाव से वह पूछता है – क्या किया जाये ! जाने में तो चैबीस रुपये एक तरफ से ट्रेन-फेयर ही लग जायेंगे, स्टेषन तक जाने-आने का रिक्षा या टैक्सी भाड़ा लगेगा सो अलग. फिर वहां ठहरने, खाने-पीने में भी तो कुछ लग ही जायेंगे. – – –
‘‘मैं एडम साहेब से उस बार चालीस रुपये लेकर तुम्हें दिया था. अब साठ रुपये और लूंगा तो एक नंबरी पूर जायेगी. रूको, जाकर देखता हॅू’’.
पिताजी के चले जाने पर वह सैंडिल खोल कर बाथरूम में घुस जाता है. कुछ देर में फ्रेष होकर आता है तो तौलिया से मुंह पोंछते हुए अपनी बहन से कुछ खाने के लिये मांगता है. कुछ देर में उसे बिना घी का, चीनी और आटे से बना हलवा स्टील की एक छोटी-सी थाली में मिल जाता है. चमच की सहायता से वह जल्दी-जल्दी हलवा को गले से उतारने लगता है.
पिताजी कुछ ही देर में आ जाते हैं. दस-दस के छह नोट उनके हाथ में लहरा रहे हैं. वह नोट लेकर अपनी जेब में रख लेता है. अभी गाड़ी में दो घंटे का समय है. वह अपने गंदा को गये तौलिये को झाड़ कर हैंड बैग में रखता है और पैंट और सैंडिल पर पड़ी धूल को एक कपड़ा से झाड़ लेता है. दीवार पर लगे भगवान् के चित्रों के सामने खड़ा होकर कुछ श्लोक बुदबुदाने के बाद वह सिर झुका कर प्रणाम करता है. बायें हाथ में बैग लेकर दाहिने हाथ से पिताजी के पैरों को छूकर प्रणाम करने के बाद आगे बढ़ जाता है.
पिताजी जाते-जाते उसे एक बार फिर याद दिला देते हैं कि वहां जाकर वह अपने चाचा या मौसी के यहां ठहरेगा. जिसके यहां तकलीफ हो, उनके यहां से दूसरे के यहां चला जायेगा. – – – इंटरभ्यू के बाद दो-तीन दिन रूक कर सेक्रेटारियट वाला काम भी करा लेगा – – .
कुछ दूर गली पार कर चुकने पर उसे याद आती है कि जल्दी के कारण डेरा पर वह अपने छोटे भाई से मिल भी नहीं सका. डेरा पर उसने पीछे की ओर उसकी आवाज जरूर सुनी थी. मगर घर में घुसते ही पिताजी से बतियाने और दूसरा इंटरभ्यू लेटर आ जाने के चक्कर में पड़ जाने से वह अपने भाई से भेंट नहीं कर सका.
वह सोचने लगा कि जब उसके भाई को यह मालूम होगा कि भैया आये थे और उससे मिले बिना चले गये तो उसे कितनी तकलीफ होगी ! अपने भैया से कहने के लिये उसने दो दिनों में कितनी बातें संजो कर रखी होगी ? मगर नौकरी के लिये इंटरभ्यू में जाना जरूरी था और जाने के लिये जल्दीबाजी भी जरूरी थी – वह अपने को समझाना चाहता है. एक बार उसका मन हुआ कि वापस जाकर अपने छोटे भाई से मिल आये. लेकिन तब तक वह काफी दूर निकल चुका है. अब समय भी कम बचा है. सामने एक रिक्षा जा रहा था, जिसे रोक कर वह वह बैठ जाता है. कहता है – स्टेषन. रिक्षा चल पड़ता है.
अपनी नौकरी की आषा में उस आषा के साथ जुड़े अनेक सपनों को संजोये वह रिक्षा पर बैठा चला जा रहा है. हर बार की तरह वह सोचते जा रहा है कि इस बार उसकी इंटरभ्यू-यात्रा का यह अंतिम दौर है. भगवान् इतनी लंबी यात्रा इस बार अवष्य पूरी कर देंगे, तीन बरस से आ रही यात्रा, जब तक रोजगार नहीं मिल जाये तब तक की यात्रा – – -.
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अंकुश्री

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