रिसते जख्म—–डॉ. श्रीमती तारा सिंह

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वषंत के प्रात:काल में तालाब के किनारे मंद-मंद मुस्कुरा रहे फ़ूलों को देखकर , शंकर भावुक को उठा, और अपने मित्र शम्भू से कहा—- शम्भू ! देखो, इन फ़ूलों को । इनका कनक वर्ण देखकर ऐसा लगता है ना कि ये फ़ूल की साक्षात सौम्य मूर्ति हो जिसे अंशुमाली खुद अपनी किरणों से निर्मित किया हो ।
शंकर के मुख से इस तरह की रोमांटिक बातें सुनकर शम्भू कुछ देर तक अवाक हो गिद्ध-दृष्टि से उसके मुख की ओर ताकता रहा, फ़िर खुद को संयमित कर बोला —- मित्र , आज तुमको हो क्या गया है , तबीयत ठीक तो है ?
शंकर दर्द की एक मुस्कान अपने होठों पर लाते हुए कहा— क्यों, मैं तुमको बीमार दीख रहा हूँ ?
शंभू दोनों हाथ जोड़कर क्षमा माँगते हुए बोला— नहीं, मित्र, तुम तो आज भी , इस साठ की उम्र में ,किसी देव-कथा का पात्र दीख रहे हो ।
शंकर—-तो फ़िर तुमने यह क्यों पूछा, कि तुम्हारी तबीयत तो ठीक है न ?
शम्भू – वो इसलिए कि, तुम्हारे मुँह से ऐसी बातें कभी सुनने नहीं मि्ली थीं । आज तो तुम मधुर कामना के भिखारी हृदय –हंस से लग रहे हो , इसलिए मैंने पूछा ।
यह सुनते ही ,शंकर की धमनियों में रक्त का तीव्र संचार हो गया । वह चेष्टा करके भी अपनी मानसिक स्थिति को चंचल होने से नहीं रोक सका और एक भारी साँस छोड़ते हुए कहा—- जानते हो मित्र , एक दिन मेरा भोला-भाला हृदय इसी तालाब के किनारे बैठी, एक मायाविनी के हाथों लुट गया, तब से मैं जिंदा तो हूँ, मगर उसी दिन से मैँ यहाँ मरे अजगर की तरह बिना हिले-डुले बैठा रहता हूँ । आज तीस साल बीत गये, नित उसकी राह जोहता थक गया, मगर वह है कि लौटकर यहाँ फ़िर कभी नहीं आई ।
शम्भू—क्या तुम जानते हो,कि वह रहती कहाँ है ?
शंकर —– हाँ, वह बगल के गाँव में रहती है, कोई दलित की बेटी है ।
शम्भू— — देखने में कैसी है, जिस पर तुम्हारा दिल फ़िदा है ।
शंकर—- बिल्कुल चाँद का टुकड़ा , सर से पैर तक देवलोक की परी ; इतना बोलकर ऐसे चुप्पी साध लिया, जैसे साँप सूँघ गया हो ।
शम्भू स्वाधीन भाव से कहा —-दोस्त ! तुम चुप क्यों हो गये,आगे बोलो ?
शंकर, अपने व्यथित हृदय पर हाथ रखते हुए कहा— उस ज्योतिर्मयी दिव्यमूर्ति रमणी की पवित्रता का ज्वलंत प्रमाण केवल यौवन से ही नहीं, उसके हाव-भाव से भी दृष्टिगत होती थी ।
शंभू, शंकर की बात सुनकर हँस पड़ा और बोला—- तो चलो, एक बार जाकर उससे मिल लेते हैं ।
शंकर उदास होते हुए कहा — गया था मित्र उसके घर उससे मिलने, लेकिन उसने मिलने से इनकार कर दिया और कहलवाया—- ’ तुम्हारे प्रेमातुर शब्द मेरे कानों के लिए बज्र से भी ज्यादा हृदय-भेदी हैं. इसलिए तुम मेरे मन-मंदिर से निकल जाओ । यह जगह तुम्हारे प्रेमाश्रय के योग्य नहीं है , क्योंकि मैं जाति और धर्म की रस्सियों से बंधी हुई हूँ , और जो तुम यहाँ से नहीं गये तो एक दिन सुन लेना, यही रस्सी मेरे गले की फ़ांस बन गई । इसलिए मैं नहीं चाहती कि तुम अपनी आकांक्षा के कल्पित स्वर्ग के लिए, इस निष्ठुर संसार की जातीय विषमता को मिटाने की कोशिश करो । कारण, इस राह के मुसाफ़िर को मंजिल तक पहुँचने के पहले ही मिटा दिया जाता है ।
शम्भू कुछ न बोलकर , सिर्फ़ इतना कहा—- आगे ?
शंकर,विप्लवी की तरह तनता हुआ बोला— मैंने उसे समझाते हुए कहा—-’ देखो, इस व्यवस्था के अनुमोदक यह सोचते हैं, कि वर्तमान स्थिति अटल, अमर है, तो ऐसा नहीं है । ये सब समीर के झोंके हैं, जो स्थिर जल को हल्का-हल्का आभूषित कर देते हैं । वे प्रचंड झोंके नहीं जिससे सागर विप्लव क्षेत्र बन जाता है ; लेकिन वह यह कहकर वहाँ से चल दी कि यह सब तुम्हारे भावुक हृदय की अमंगल कल्पनाएँ हैं । आगे कुछ न बोलकर शंकर फ़िर उदासी में डूब गया ।
शम्भू ,अपने पैर की जूती उतारकर दूसरी ओर रखते हुए शंकर से पूछा— शंकर तुम चुप क्यों हो गये ?
शंकर रुआँसा हो बताया—- जानते हो, उसी दिन मेरे गौरव का दुर्ग टूट गया, और तभी से यह दिल खंडहर और निर्जन पड़ा है ।
शम्भू, तालाब की जल लहरियों संग कूद-कूदकर क्रीड़ा कर रहे कमल फ़ूलों की ओर देखते हुए शंकर से पूछा —- इन फ़ूलों को देखकर तुमको क्या प्रतीत होता है कि सुन्दरता केवल भोग की वस्तु होती है, उपासना की नहीं । अगर ऐसी बात है, तब तो तुम्हारी उदासी सही है, लेकिन मेरी मानो, तो यह कमजोर दिल का भटकाव है । फ़िर आकाश की ओर देखते हुए कहा— इस मनोहारिनी चाँदनी को मनोविनोद की सामग्री मान लो, तो उसे छूने की व्याकुलता क्यों हो ?
शम्भू की बातों को सुनकर, शंकर का हृदय-गत प्रेम, उग्र रूप धारण कर लिया; वह विह्वल हो बोला— मुझे माफ़ कर दो, मैं गलत जगह हूँ ।
शम्भू चकित होकर कहा— शंकर, तुम तो बुरा मान गये दोस्त ! मेरी बातों से तुमको दुख पहुँचा हो तो मुझे माफ़ कर दो । मैं काफ़ी शर्मिंदा हूँ, जो तुम्हारी प्रेम-मर्यादा के वृक्ष को जड़ से उखड़ जाने की वेदना को अपने दिल की तराजू पर तौल न सका । यह जानते हुए भी कि जीवन हिसाब, काल्पनिक गणित पर चलता आ रहा है । इसमें आदमी अपना पावना पहले ही निकाल लेता है , यही कारण है कि हिसाब सही नहीं बैठता ।
शंकर कुछ क्षण अनिश्चित दिशा में निहारता हुआ, शम्भू को देखता रहा, फ़िर बोला—- इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है । हर आदमी अपने मनोनुकूल अर्थ निकालकर उसे अपने ढंग से विचार रखने के लिए स्वतंत्र है ।
शम्भू, आँखें नीची कर कहा — वो तो ठीक है, मगर जहाँ जो करना चाहिये, वहाँ वह नहीं करना भी तो अपनी जिम्मेदारी से भागना है ।
शंकर ,अपनी साँसों को अपने हृदय लहरियों से स्वर –सामंजस्य बनाते हुए कहा—- शम्भू, मैं तुमको अपना शुभचिंतक और हृदय1-2–रक्षक समझता हूँ । तुम्हारे प्रति मेरे मन में कोई मैल नहीं है, बल्कि मैल तो मुझे अपनी योग्यता पर है । जरूर मुझमें उसे कोई कमी दिखी होगी, जो उसने मुझे ठुकरा दिया ।
शम्भू , शंकर का विशाल वक्ष थपथपाकर कहा—- तुम असफ़लता का कारण अपनी अयोग्यता क्यों समझते हो, प्यार को योग्यता और विद्वता से कोई मतलब नहीं रहता; तुम क्यों अपने अंतस्थल में ऐसी विकीर्णता के प्रकाश को उदय होने देते हो, जैसा आदमी को जीवन की अंतिम घड़ियों में उदय होता है ।
फ़िर अपने जाँघ पर हाथ मारकर शम्भू ने कहा— मुझे देखो, मैंने भी कभी किसी से प्यार किया था, लेकिन जब कुल-मर्यादा की बात आई, तब मैं खुद ही उसके रास्ते से हट गया । ऐसे प्यार सोचकर नहीं किया जाता ; हो जाता है । मैं प्रेम सम्बंध को कुत्सित सम्बंध नहीं मानता । रईसों में तो यह प्राचीन प्रथा रही है , कि वह रईस ही क्या, जो अपनी विवाहिता को महल में रखकर कोठे का सैर न किया हो । जानते हो, फ़िर भी वे धर्म को नहीं छोड़ते थे । धर्म छोड़ना यानि समाज की मर्यादाओं को तोड़ना माना जाता था और यहाँ तो तुम दोनों का धर्म ही अलग है । फ़िर भी मैं कहूँगा कि तुम दुखी मत हो, ये जाति-पाति, सब कुछ गलत तवारीखें पढ़कर लोग एक दूसरे से खुद को भिन्न मानते हैं, लेकिन देखना, जल्द ही मजहब की यह दौड़ खत्म हो जायगी । तब अमीर और गरीब, यही दो कौम यहाँ राज करेंगे । हाँ, इनमें कोई ज्यादा खूंरेजी, तो कोई ज्यादा तंगदिली होगा, मगर दुनिया में संतलत इन्हीं की रहेगी ।
शंकर उदास हो, विद्रोह भाव से कहा—- तो मुझे उस जमाने का इंतजार करना चाहिये ।
शम्भू—- मेरे कहने का मतलब दुनिया में प्रेम और विश्वास का अस्तित्व ही नहीं, ऐसी सोच तुम जैसे भावुक प्राणियों की कल्पना-मात्र है । यौवन का आनंद लूटना मात्र प्यार नहीं होता; सच्चा प्यार आकाश की निर्जनता में चमक रही उस चाँदनी की तरह होता है, जो मनोविनोद की सामग्री होकर भी छूआ नहीं जाता ,फ़िर भी लोग उससे जीवन भर प्यार करते हैं ।
शंकर का संयम, शम्भू की बेतुकी बातों से , आशा से निराशा में परिणत हो गया । जीवन मध्याह्न की इस आलस्यमयी शांति में , किसी चाह वॄक्ष की छाया में लेटे रहना ठीक नहीं, बल्कि साँझ ढ़लने से पहले अपना घर पहुँच जाना उत्तम और निरापद होगा; संभवत: मेरा पथ नहीं खोया था, मैं ही पथ में भटक गया था ।

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