मैं हिन्दू हूँ—डॉ. श्रीमती तारा सिंह

Facebook
Twitter
LinkedIn

मस्तक पर चंदन-टीका लगाकर, बरसों से फ़ूलों का व्यवसाय करता आ रहा, जमुना का पति बिरजू, अपने दुकान के सामने गाय को तीन दिन पुरानी रोटी खिला रहा था । वह उधर से गुजरने वाले हर व्यक्ति से जताना चाह रहा था,कि वह हिन्दू है ,और हिन्दुओं के दिल में इन्सान क्या जानवरों के लिये भी दया रहती है । तभी तो हम मंदिर के भीतर देवता की पूजा कर बाहर आकर गाय और बंदर की पूजा करते हैं , उसे खाना खिलाते हैं; उसका मस्तक चूमकर उससे आशीर्वाद माँगते हैं । उसी क्षण एक बूढ़ी भिखारिन उधर से गुजर रही थी । वह बिरजू के हाथ में रोटी देखकर रूक गई और बोली—’ बाबू ! मुझे भी एक रोटी दे दो; दो दिन से कुछ खाया नहीं, ईश्वर तुम्हारा भला करेगा ।’
भिखारिन की बात सुनकर बिरजू झुँझला उठा और तिरस्कार भरी हँसी हँसते हुए बोला —’ आ गई सुबह-सुबह मुझे आशीर्वाद देने । मेरा भला भगवान करेगा, तू तो नहीं करेगी , तो तेरे को रोटी खिलाकर क्या होगा ? भगवान को ऐसे भी मेरा भला तो करना ही होगा । देखती नहीं, मैं गाय को रोटी खिला रहा हूँ । तू जा, कहीं और जाकर रोटी जुगार कर ; बड़ी आई, मेरा भला करवाने वाली । जब ऊपर तेरी पहुँच है, तो खुद का भला क्यों नहीं करवा लेती ? ’
फ़टे आँचल के छिद्र से गिरे जा रहे पोटली के चावल को संभालती हुई भिखारिन बोली—’ बाबू ! रोटी नहीं, तो एक पैसा ही दे दो । बहुत भूखी हूँ ।’
बिरजू अपना खाली हाथ दिखाता हुए कहा —’और रोटी तो है नहीं,तुझे कहाँ से दूँ ?’,

भिखारिन ,बिरजू की बातों से मर्माहत होकर, ऊपर की ओर मुँह उठाकर बोली—’ अब तुम्हीं बताओ ऊपरवाले, मैं इसे क्या जवाब दूँ ; अरे ! तुमको भी धन देते वक्त पात्र को देख लेना चाहिए । सच पूछो तो इसके लिए तुम भी कम खतावार नहीं हो ? ऐसे पात्र को धन देकर क्या फ़ायदा , फ़िर भी तुम्हारी मरजी ? ’ इतना कहते-कहते बूढ़ी भिखारिन का कंठ –स्वर जैसे गहरे जल में डुबकियाँ खाने लगा ,और वह आँसुओं को वेगपूर्ण रोकती हुई, दुकान की ओर मुँह कर बैठ गई । लेकिन पुण्य संचय कर रहे बिरजू को बुढ़िया का इस प्रकार दुकान की ओर मुँह कर बैठ जाना अच्छा नहीं लगा । वह उठकर भिखारिन के पास गया, और कहा—’यहाँ क्यों बैठी हो,जाओ ,कहीं और देखो ।’
बिरजू की सलाह पर, भिखारिन की बूढ़ी आँखें मुस्कुराती हुई कही —’ बाबू ! परेशान मत होओ ,चली जाऊँगी । शुक्र करो कि मैं अभी जिंदा हूँ । अगर भूख से अब तक मर गई होती, तब कैसे जाने कहते ।’
बिरजू अपने दलील का अनादर सह न सका; उसने चिल्लाकर कहा—’ जाती हो कि मैं अपना आदमी बुलाऊँ ।’
बुढ़िया बीरजू की ओर आद्र दृष्टि से देखती हुई बोली—-’ बाबू ! एक रुपया दे दो,बड़ी भूखी हूँ ।’
बुढ़िया का बार-बार एक रुपये की रट ,बिरजू के गुस्से को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया । उसने गुस्से से आँख लाल करते हुए कहा –’ एक रुपया, मुफ़्त आता है क्या, जो तुझे दे दूँ । पता है तुमको, इस एक रुपये के लिए हम व्यवसायियों को कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है । अगर उतनी परेशानियाँ ,भिखारियों को झेलनी पड़े, तो भीख माँगना छोड़ दे, धनोपार्जन के लिए खून जलाना पड़ता है । साँस सुखाना पड़ता है, जो कि हर किसी के लिए संभव नहीं है । तुम तो सोचती हो कि ये व्यवसायी लोग ,कहीं पैसे फ़ेंके रहते हैं, वहाँ से बटोर लाते हैं; और जब इतनी आसानी के पैसे हैं, तो दान क्यों नहीं करेंगे ?’
भिखारिन ,बिरजू की बातों का जवाब न देकर, वहाँ से चले जाने में ही अपनी भलाई समझी । भिखारिन को वहाँ से गये , कुछ मिनट ही हुए होंगे, कि मेरे पति और मैं,बिरजू की दुकान में फ़ूल खरीदने गये । बिरजू , अपने नौकर से कह रहा था—’रामू , देखो तो ,यह गाय मर तो नहीं गई ? सब जगह से घूमकर मेरे दुकान के सामने आकर सो गई ।’
बिरजू का नौकर, एक डंडा उठाकर , गाय को धक्का देते हुए बोला —’ नहीं सेठ, इसे पानी चाहिये । हर दुकान में जाकर पानी की खाली बाल्टी में मुँह घुसाकर देखती है, इसे प्यास लगी है ।’
वहाँ खड़े मेरे पति ने कहा —’ पानी चाहिये , तो एक बाल्टी पानी दे क्यों नहीं देता, बेचारी प्यासी मर जायगी । यह ठीक नहीं होगा , आखिर हमलोग हिंदू हैं । हिन्दू शास्त्र के अनुसार ,गाय का प्यासा मरना, देखने वालों के लिए भी पाप होता है ।’
तभी गाय जोर से कराहकर ,दूसरी तरफ़ करवट लेकर सो गई , जिसे देखकर ,हम दोनों और परेशान हो गये । लेकिन नौकर यह कहकर पानी नहीं दिया, कि गंगा दो मील दूर चली गई है, हमलोग दो बाल्टी पानी बड़ी मसक्कत से ला पाते हैं । एक बाल्टी, फ़ूल पर छींटे मारने के लिए, दूसरा पीने के लिए । इसे पिला देने से हमें आज दिन भर पानी की तकलीफ़ हो जायगी । इसलिए साहब, आप उधर मत देखो, बल्कि अपना रास्ता देखो । यह सब यहाँ रोज चलता रहता है; लगता है आप बाहरी हो । पहली बार यह सब देख रहे हो ।’
मैं झट से बोल पड़ी— ’ हाँ, हमलोग मुम्बई से आये हैं ।’
नौकर, हमारी तरफ़ मुस्कुराता हुआ देखा और बोला –’ तभी इतनी तकलीफ़ आपलोगों को हो रही है ।’
मेरे पति,नौकर की बेतुकी बा्तें सुनकर उत्तेजित हो उठे, और विस्मित होकर बोले — ’इसकी आहें आसमान तक पहुँच रही हैं : ये आहें एक दिन
किसी ज्वालामुखी की तरह फ़टकर हमें निगल जायगीं । देखना, एक दिन आयगा, जिस फ़ूल को देवताओं के गले में माला बनाकर डालने के लिए आज तुम पानी सहेजकर रखे हो, कल कंकर—पत्थर की तरह उठा-उठाकर गलियों में फ़ेंक दिये जायेंगे , उन्हें पैरों से ठुकरायेंगे । गाय हमारी देवता है; वह भी जीवित, तुमने साक्षात जीवित देवता पर अत्याचार किया है ।’
नौकर, मेरे मेरे पति की बात पर तिलमिला उठा । उसने कहा—’ ठीक है , आप यहाँ मुम्बई से पुण्य कमाने आये हैं, तो पुण्य कमाइये न , बेकार का झंझट क्यों मोल ले रहे हैं ?’
तभी मेरे पति की नजर ,उसकी दुकान में सजे , वाटर-बोतलों पर पड़ी । उन्होंने नौकर से पूछा—’ क्या ये पानी –बोतल बेचने रक्खे हो ?’
नौकर सहज भाव से उत्तर देते हुए कहा– ’हाँ, खरीदनी है आपको, कितनी बोतलें चाहिये ।’
मेरे पति ने कहा —’सब के सब !”
नौकर धन्यवाद देते हुए कहा —’ और चाहिये, तो कहिए ,बगल की दुकान से मंगवा दूँगा ।’
मेरे पति तीक्ष्ण स्वर में बोले—’ देखता हूँ, वह पीती कितना है ?’
उसके बाद नौकर ,बोतल का सील तोड़ता गया , और मेरे पति गाय को पानी पिलाते गये । लगभग बीस बोतल पानी पिलाने के बाद ,एक बार उसने आँखें खोलीं, फ़िर सदा के लिए मूंद लीं । यह देखकर,मेरे पति के सिर से पाँव तक स्वाभिमान की एक बिजली दौड़ गई और उनकी आँखों से भक्ति के आँसू छलक पड़े ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Social media & sharing icons powered by UltimatelySocial