मुहब्बत की इबादत—-मदन मोहन सक्सेना

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नजरें मिला के नजरें फिराना ,ये हमने अब तक सीखा नहीं है
बादें भुलाकर कसमें मिटाकर ,वह कहतें है हमसे मुहब्बत यही है

बफाओं के बदले बफा न करना ,ये मेरी शुरू से आदत नहीं है
चाहत भुलाकर दिल को दुखाकर ,वह कहतें है हमसे मुहब्बत यही है

बफाओं के किस्से सुनाते थे हमको,बादें निभाएंगें कहते थे हमसे.
मौके पे साथ भी छोड़ा उन्ही ने ,अब कहते है हमसे जरुरत नहीं है

कहतें है दुनिया में मिलता है सब कुछ ,गम ही मिला है मुझे इस जहाँ से
कहने को दुनिया बाले कहें कुछ, मेरे लिए तो हकीकत यही है

खुश रहें वह सदा और फूले फलें ,गम का उन पर भी साया न हो
दिल से मेरे हरदम निकलती दुआ है,खुदा से मेरी इबादत यही है

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