“बिखरा हूँ मोहब्बत में इस तरह” : शबाना के आरिफ़

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बिखरा हूँ मैं कुछ इस तरह कि ये ज़िंदगी नहीं
टूटा हूँ मोहब्बत में इतनी दफ़ा कि ये ज़िंदगी नहीं

निबहाई हमने रस्म-ए-मोहब्बत खुद फ़ना होकर
तोडा दिल फिर ज़र्रों को समेटा ये बंदगी नहीं

गुज़रा हूँ मैं उस दौर से दीवाना होकर ऐ मोहब्बत
फिर भी ख़ताबार हूँ तेरा कि ये ज़िंदगी नहीं

ज़हन भी अब क़ाबू में नहीं शक़ में जीना नहीं
गर तन्हाई मुक़द्दर है मेरा कि ये ज़िंदगी नहीं

इक बुझता हुआ चिराग़ हूँ मैं तेरे शक़ में ‘आरिफ़’
तेरी नफ़रत मेरा नसीब है कि ये ज़िंदगी नहीं

टूटा हूँ मोहब्बत में इस तरह कि ये ज़िंदगी नहीं
बिखरा हूँ मैं कुछ इतनी दफ़ा कि ये ज़िंदगी नहीं

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