” फ्रेंडशिप डे “—–विश्वनाथ शिरढोणकर

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दुश्मन है तो क्या मेरी कब्र पर नहीं आएगा ?
आता तो देख लेता दोनों में कोई फर्क नहीं !

जहा उसकी दोस्ती ख़त्म हुई वही मेरी दुश्मनी
अब उसका मेरा कोई हिसाब बाकी नहीं !

दावों और वादों का तू कितना करेगा हिसाब ?
देख इस खाक में अब कुछ भी बाकी नहीं !

ग़मगीन कितना हो गया गमख्वार देखो सदमे से
कम्बख्त फिर भी कहता है कोई जख्म बाकि नहीं !

दुश्मनी भी वह दोस्ती की तरह निभाएगा
जानता हूँ मै उसे दिल्लगी पसन्द नहीं !

बनाके बहुत बड़ी मजार रोज दिया जलाएगा
इबारत इबादत की होगी, दोस्ती दुश्मनी की नहीं !

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