भैया का आँगन—डॉ. श्रीमती तारा सिंह

भैया का आँगन—डॉ. श्रीमती तारा सिंह   भैया का आँगन   हाड़-मांस  कंपा  देने  वाली  पौष  की  ठिठुरती रात में,रोज की तरह आज भी बुधना अपने छोटे-छोटे बच्चों को ,एक कोने में छाती से चिपकाये, सिकुड़ा-सिमटा सुबह का इंतजार कर Read More …

सबेरा(बालगीत) —-शशांक मिश्र भारती

सबेरा—-शशांक मिश्र भारती   हुआ सबेरा चिड़िया चहकीं जागो बच्चों और आंखें खोलो निकल स्वप्न लोक से बाहर जल्दी से अपना मुंह धोलो नित्य कर्मों से शीघ्र निपट लो मां से लेकर कुछ खा लो और उठाओ बस्ता अपना जल्दी Read More …

समय( बालगीत) —-शशांक मिश्र भारती

समय                  शशांक मिश्र भारती समय का महत्व समझ लो फिर न लौट कर आएगा जिसने समय व्यर्थ गॅंवाया पीछे से वही पछताएगा सफल न होगा जीवन में न कार्य  पूर्ण कर पायेगा समय का पालन कर ही मंजिल तक Read More …

भज गोविन्दम(गीत) —-सुशील शर्मा

Sushil Sharma 3:27 PM (3 hours ago) to me भज गोविन्दम(गीत) सुशील शर्मा भज गोविन्दम राधे राधे जीवन की नैया को साधे भज गोविन्दम राधे राधे। भज गोविन्दम राधे राधे। जीवन रूप विषम अनुरूपा सुख दुख कष्ट विपत्ति कूपा।। कुछ Read More …

चाहती हूँ ,मैं भी अमर हो जाऊँ—-डॉ. श्रीमती तारा सिंह

चाहती  तो  मैं  भी  हूँ, अमावस  की अमर  गोद  में डूबकर, अमर हो जाऊँ अंगारे  को  गूँथकर  गले   में  पहनूँ अणु-अणु में संचित कर वेदना का गान युग-युग  की तुम्हारी पहचान बन जाऊँ   अपने   मृदु  पलकों   को  मुँदकर दुख Read More …

चाहते हो अगर मुझे जानना—डॉ. श्रीमती तारा सिंह

  चाहते हो अगर मुझे जानना—डॉ. श्रीमती तारा सिंह   तुम  चाहते  हो, अगर  मुझे  जानना तब  पहले विश्व संगर की अदभुतभूमि अजय योगियों का धाम,भारत को जानो जिसे  अपने प्रीति-पाश में बाँधने सूरज क्षितिज  पर टकटकी लगाये बैठा रहता निशि Read More …

दिशि-दिशि में उदासी भरी रहती—डॉ. श्रीमती तारा सिंह

  दिशि-दिशि  में  उदासी  भरी  रहती—डॉ. श्रीमती तारा सिंह   प्रिये ! कैसे बताऊँ,मुझ पर क्या- क्या गुजर  रहा, तुम्हारे  जाने से उस पार दिशि- दिशि  में  उदासी  भरी  रहती झंझा झकोर गर्जन करता, तन जलता मन गलता, विकलता से लिपटा Read More …

देख जग ललचा—डॉ. श्रीमती तारा सिंह

  देख    जग   ललचा—डॉ. श्रीमती तारा सिंह      जीवन  वन  का  यौवन  घट, जब शून्य   दिशि   से  मैं  भर  लायी तब   देख    जग   ललचा , पूछा अरि वो निर्धन सुकुमारी,चिर अतृप्त उद्भ्रांत  महोदधि  जीवन  था  तेरा ये  रंगों  की Read More …

तारों में रहती मेघों की प्यास—डॉ. श्रीमती तारा सिंह

तारों में रहती मेघों की प्यास—डॉ. श्रीमती तारा सिंह   निज साँस की गर्म उसास से, पिघल- पिघलकर मिटता जा रहा मानव तन सोचता , अग्निपथ   के  उस  पार स्वर्ण   मृगों  का  है  गंध  विहार मगर इस  पार, तारों  में Read More …

सियासत-ए-फ़िरदौस—Sparsh Choudhary

सियासत-ए-फ़िरदौस—Sparsh Choudhary फ़िल्म ‘आँखों देखीं’ के संजय मिश्रा हर चीज़ को अपनी आँखों से देख कर ही उस पर विश्वास करते हैं .सही भी है . तो इस दफे एक जलते सच को जानने की कवायद की हमने जब बीते Read More …