दीन-हीन मजबूर, हुए बार-बार हम—-Deepak Patel

घनाक्षरी                       दीन-हीन मजबूर, हुए बार-बार हम ,फिर भी है आज मेरी,एक पहचान है । खून देके शूर वीर, हरते पराई पीर,हो रहा है आज नित ,ज्ञान का विहान है।                            जल थल वायु और, शशि रवि मेंघ तारें,सब पे  विजयी हम, Read More …

लगता है सामने हो और मुस्कुरा रहे हो.—Aakash Wani

April 2 जाने क्यूँ आज रह रह के याद आ रहे हो.., लगता है सामने हो और मुस्कुरा रहे हो..! चुप्पी सी छायी है होठों पर जाने क्यूँ.., खामोश नज़रों से क्यूँ दिल जला रहे हो..! मौसम चल पड़ा है Read More …