”निर्देयी समय“—सुषमा देवी

कविता ”निर्देयी समय“ निरन्तर चलता समय का चक्र, कभी नहीं यह रूकता जीये- मरे कोई परवाह न इसको, कभी निदर्य नहीं झुकता । अंधियारों से नही है डरता ,न डर आँदी ,तूफान, बाढों का इस बेरहम को डर नही लगता, Read More …

चाहती हूँ ,मैं भी अमर हो जाऊँ—-डॉ. श्रीमती तारा सिंह

चाहती  तो  मैं  भी  हूँ, अमावस  की अमर  गोद  में डूबकर, अमर हो जाऊँ अंगारे  को  गूँथकर  गले   में  पहनूँ अणु-अणु में संचित कर वेदना का गान युग-युग  की तुम्हारी पहचान बन जाऊँ   अपने   मृदु  पलकों   को  मुँदकर दुख Read More …

चाहते हो अगर मुझे जानना—डॉ. श्रीमती तारा सिंह

  चाहते हो अगर मुझे जानना—डॉ. श्रीमती तारा सिंह   तुम  चाहते  हो, अगर  मुझे  जानना तब  पहले विश्व संगर की अदभुतभूमि अजय योगियों का धाम,भारत को जानो जिसे  अपने प्रीति-पाश में बाँधने सूरज क्षितिज  पर टकटकी लगाये बैठा रहता निशि Read More …

दिशि-दिशि में उदासी भरी रहती—डॉ. श्रीमती तारा सिंह

  दिशि-दिशि  में  उदासी  भरी  रहती—डॉ. श्रीमती तारा सिंह   प्रिये ! कैसे बताऊँ,मुझ पर क्या- क्या गुजर  रहा, तुम्हारे  जाने से उस पार दिशि- दिशि  में  उदासी  भरी  रहती झंझा झकोर गर्जन करता, तन जलता मन गलता, विकलता से लिपटा Read More …

देख जग ललचा—डॉ. श्रीमती तारा सिंह

  देख    जग   ललचा—डॉ. श्रीमती तारा सिंह      जीवन  वन  का  यौवन  घट, जब शून्य   दिशि   से  मैं  भर  लायी तब   देख    जग   ललचा , पूछा अरि वो निर्धन सुकुमारी,चिर अतृप्त उद्भ्रांत  महोदधि  जीवन  था  तेरा ये  रंगों  की Read More …

तारों में रहती मेघों की प्यास—डॉ. श्रीमती तारा सिंह

तारों में रहती मेघों की प्यास—डॉ. श्रीमती तारा सिंह   निज साँस की गर्म उसास से, पिघल- पिघलकर मिटता जा रहा मानव तन सोचता , अग्निपथ   के  उस  पार स्वर्ण   मृगों  का  है  गंध  विहार मगर इस  पार, तारों  में Read More …

बाबू …डां नन्द लाल भारती

कविता ः बाबू …प्रकाशनार्थ Inbox x Nandlal Bharati 8:42 AM (8 hours ago) to me कविता ः बाबू सफल होना बस दाल रोटी और एक घर का इंतजाम भर नहीं औरो को खुश रखना बड़ा नपना है बाबू………… औरो के Read More …

कभी-कभी तू मुझे एक झूठ सा लगता है–Preeti Jaiswal

Preeti Jaiswal 10:32 AM (8 hours ago) to me कभी-कभी तू मुझे एक झूठ सा लगता है पर अपना सा लगता है कि कोई मुझे ऐसा प्यारा कैसे मिल सकता है कि क्या सच में तू मुझे इतना समझता है Read More …

देह से इतर —-सुशील शर्मा

Sushil Sharma 8:54 AM (10 hours ago) to me देह से इतर सुशील शर्मा औरत की देह से इतर औरत को किसी ने न जाना पति के लिए देह सौंदर्य की मूर्ति पुत्र के लिए स्तनों से निकला अमृत। भाई Read More …

सुलगते अरमान —डा० श्रीमती तारा सिंह

सुलगते अरमान                 —डा० श्रीमती तारा सिंह साँझ  ढ़ल  आई ,रात  काली  है  बिछनेवाली नील  गगन  में  विहग बालिका-सी उड़नेवाली थकी   किरण   नींद  सेज  पर  सोने  चली मेरी  भी झिप-झिप आँखें,जो पलकों में काटती आई रातें,झुकी झुर्रियों के नीचे सोना Read More …