एक चीत्कार —- सुशील शर्मा

एक चीत्कार सुशील शर्मा गोली मार देते उसको उसकी इज़्ज़त तो बचा लेते। किसी औरत का मुंडन पचास हज़ार या कुछ कम के बीच चीत्कार करते लोग बेहोश होते लोग कितना भयावह सरकारी बलात्कार और फिर भी चारों ओर सन्नाटा Read More …

वर्तमान परिवेश/देशद्रोह पर-विनोद कुमार यादव

विनोद ‘निर्भय’ March 1, 2016 वर्तमान परिवेश/देशद्रोह पर …………………………………. आतंकी नायक बना,संसद चाटे धूल उपवन को ही रौंदता,इक अदना सा शूल कैसे-कैसे लोग हैं,दुनियाँ में भगवान बेशर्मीं से कर रहे,देशद्रोह का गान मानवता लाचार है,दवा चले ना जोग सज्जन को Read More …

कैद में धूप —- सुशील शर्मा

कैद में धूप सुशील शर्मा अंतर्विरोधों, अंधविश्वासों से ग्रस्त, शोषण पर आधारित तुम्हारा सड़ा गला घृणा से अभिसिंचित तंत्र क्रूर छदम सहानुभूति खलती है तुम्हारी कृत्रिम हंसी निर्धनता, शोषण, बेकारी और असुरक्षा में घिरा गण आखरी छोर पर खड़ा।  निरर्थक, Read More …

पीत अमलतास —-सुशील शर्मा

पीत अमलतास सुशील शर्मा पीत अमलतास नीरव सा क्यों उदास है। सत्य के सन्दर्भ का , चिर परिवर्तित इतिहास है। सर्जना को संजोये , दर्द का संत्रास है। अहं की अभिव्यंजना उपमान मैले हो गए। अनुभूतियाँ निसृत हुईं बिम्ब धुंधले Read More …

आज तुम्हें राज़ की बात एक बताते हैं—दीपक शर्मा

आज  तुम्हें राज़ की बात एक  बताते हैं ,  कैसे हँस-हँसके हम अपने ग़म छुपाते हैं,  तन्हा   होते   हैं तो जी भर कर रो लेते हैं,  सर-ए-महफ़िल बस आदतन मुस्कुराते हैं।,  और होंगे जो झुक जाते हैं रुतबों के आगे Read More …

वो उन्मुक्त बचपन—Blogger

वो खेलता बचपन पतंग उड़ाता बचपन तितलियां पकड़ता बचपन न पढ़ने के बहाने ढूंढता बचपन याद आता बचपन बस अब सबकी सुनते हैं अपने मन की कहां कर पाते हैं अफसर की झिड़की पत्नी के ताने संवारना है बच्चों का Read More …

जिंदगी भर जिंदगी की तफ्तीश करता रहा —धर्मेन्द्र मिश्र

Poetry … जिंदगी भर जिंदगी की तफ्तीश करता रहा . जिंदगी मेरी थी मगर कोई और जीता रहा . खुद को खुद से ही दूर रख कर , सफर जिंदगी का करता रहा . ताल्लुक-ए-खातिर ज़माने से थी , मगर Read More …