तुझे मैं भुलाऊँ कैसे. —संदीप अलबेला_

Sandeep Kumar Albela May 1 at 7:28am · तू कहता है कि मैं भूल गया तुझको, अपने जज्बात बताऊँ कैसे??? तू जिन्दगी का खूबसूरत हादसा है, तुझे मैं भुलाऊँ कैसे. _संदीप अलबेला_

ऐ जिन्दगी क्या कहूँ तेरी हर अदा पर रोना आया–संदीप अलबेला

Sandeep Kumar Albela May 3 at 6:17am ऐ जिन्दगी क्या कहूँ तेरी हर अदा पर रोना आया, ऐसा नहीं कि तुमने बस सितम ही ढाये हैं मुझ पर, ये भी नहीं कि हर बार खुद के लिए रोया हूं, अपने Read More …

जीवन प्रवाह–प्रभा पारीक

जीवन प्रवाह चलते रहो तुम बहते हुये पानी की तरह, दृढ संकल्प होे उड़ते हुये पांखी की तरह, टकराओं तूफानों से ऊंचे पर्वतेंा की तरह, दो रोशनी उगते हुये सूरज की तरह, शीतल करो , बहती ठंडी हवा की तरह, Read More …

फिर से मधुशाला—चन्द्शेखर मल्ल

शीर्षक:: फिर से मधुशाला ये दिल बावड़ा निज त्याग दिया है मधुशाला जो हर रात है पीता प्रयेसी के आखो मे मधुशाला जो तूने बन्द किये इन आखो के मैखाने ये मधुबाला तो ये दिल माग रहा है चिल्ला चिल्ला Read More …

बदले है रंग क्यों ,,,- हुसैन गाहा ,” हुसैन”

Husen Gaha shared Chand Ghazalean meree.‘s post. March 14 Chand Ghazalean meree. March 13 बदले है रंग क्यों ,,, ————————- बदले है रंग क्यों तूं हां ? मौसम की तरहा ! हमने चाहा हैं तुझको धड़कन की तरहा। उलझ़ गया Read More …

जाने क्यूँ आज रह रह के याद आ रहे हो..Aakash Wani

Aakash Wani April 2 at 12:14pm जाने क्यूँ आज रह रह के याद आ रहे हो.., लगता है सामने हो और मुस्कुरा रहे हो..! चुप्पी सी छायी है होठों पर जाने क्यूँ.., खामोश नज़रों से क्यूँ दिल जला रहे हो..! Read More …

परछाई पकड़ी नहीं जा सकती–कश्मीर सिंह

गज़ल परछाई पकड़ी नहीं जा सकती। सौर मण्डली गति रोकी नहीं जा सकती।। एक दफा निकल गई आत्मा षरीर से। दोबारा कभी लौटाई नहीं जा सकती।। जो गुजर गया दिन तो फिर ऐ बन्दे। लौट के रंगत उसकी लाई नहीं Read More …

पेट की आग गर चूल्हे से आई न होती—सुशील शर्मा

ग़ज़ल सुशील शर्मा Add New पेट की आग गर चूल्हे से आई न होती। तो जिंदगी कभी इतनी पराई न होती। कुछ और बेहतर बना लेते जिंदगी को। गर तिरी वो मुस्कान हरजाई न होती। दुश्वारियां जिंदगी की नासूर बन Read More …

क्या कयामत है, सभी हमीं को बुरा कहते हैं –डॉ० श्रीमती तारा सिंह

क्या  कयामत है, सभी  हमीं को  बुरा कहते हैं हमारी  नेकी  को  छोड़, बदी  की चर्चा करते हैं   प्रलय  के  दिन  भी, वे  हमारे  विरूद्ध खड़े रहे देखना  है, आगे  वे, और  क्या तमाशा करते हैं   मिटती  नहीं, Read More …

उजड़ी पड़ी दिल की बस्ती को,तुम बसा दो —डॉ० श्रीमती तारा सिंह

  डॉ० श्रीमती तारा सिंह उजड़ी पड़ी दिल की बस्ती को ,तुम बसा दो या इस चरागे-सहर को अपने हाथों बुझा दो   गैर  की जिक्रे वफ़ा से जलता है दिल, खाक न  हो  जाये, इसे  न  और अधिक हवा Read More …