“तुम दोगला ईमान रखते हो साहिब—Deepak Sharma

Deepak Sharma Thu, Aug 23, 11:33 AM (22 hours ago) to me “तुम दोगला ईमान रखते हो साहिब। उस पर मुसलमान बनते हो साहिब।। क़ाफ़िरों को मार कर हूर,ज़न्नत मिलेगी। कैसी मियाँ तुम कुरान पढ़ते हो साहिब।। मासूम हाथों में Read More …

जिक्र मेरा मुझसे बेहतर है,उस महफिल में हो–डॉ. श्रीमती तारा सिंह

  जिक्र मेरा मुझसे बेहतर है, उस महफिल में हो जहाँ खाक में मिली हसरतें मेरी, उस दिल में हो है मुझे भी मालूम शम-अ-कुश्ता1, दरखुरे महफिल2 नहीं होता,मगर मेरे ख्वाबों के जलते दीये तो महफिल में हो राह दिखलाये Read More …

चाहा था इस रंगे- जहां में अपना एक ऐसा घर हो—डॉ. श्रीमती तारा सिंह

चाहा था इस रंगे- जहां में अपना एक ऐसा घर हो जहाँ जीवन जीस्त1 के कराह से बिल्कुल बेखबर हो मुद्दत हुई जिन जख्मों को पाये, अब उनके कातिल की चर्चा इस महफिल में क्यों कर हो मैं क्यूँ रद्दे-कदह2चाहूँ,मैंने Read More …

चमन में रहकर भी,बहार से दूर रहे हम—डॉ. श्रीमती तारा सिंह

चमन में रहकर भी, बहार से दूर रहे हम उश्शाक1 पा रहे जुर्म की सजा,सोच मगरूर2रहे हम मेरी जिल्लत ही, मेरी शराफत की दलील है मेरे खुदा, इस गफलत में जरूर रहे हम शिकवा उसकी जफा3 का हमसे हो न Read More …

गम की अँधेरी रात में तुम कहाँ हो—डॉ. श्रीमती तारा सिंह

  गम की अँधेरी रात में तुम कहाँ हो जहाँ भी हो , आवाज दो , तुम कहाँ हो मिटती नहीं दागी उलफत गुजर जाने के बाद भी , सोचकर तुम क्यों परेशां हो मुहब्बत में हसरतों की कमी नहीं Read More …

जिसके जल्वे से जमीं-आसमां सर-शार1 है, हमने–डॉ. श्रीमती तारा सिंह

  जिसके जल्वे से जमीं -आसमां सर-शार1 है, हमने उसी से तेरे लिए, चाँद-तारों की उमर माँगी है तेरे पाँव में जमाने के काँटे न चुभे कभी बहारों से हमने, तेरे लिए फूलों की डगर माँगी है फलक2 से भी Read More …

कोई तो दर्द-मंद, दिले-नासबूर बनकर–डॉ. श्रीमती तारा सिंह

कोई तो दर्द – मंद1, दिले – नासबूर2 बनकर मेरे साथ था, जो मैं अब तक मरा नहीं मगर मुझमें वह हौसला-ए-तर्के-वफा3 रहा नहीं जो बताऊँ, क्यों यह चिरागे-सहर4 बुझा नहीं मैं नहीं चाहता,किसी निगाहे-शौक5को रुसवा करूँ गुलशन – परस्त Read More …

खुदा करे, मेरी कसम का उसे एतवार हो—डॉ. श्रीमती तारा सिंह

खुदा   करे,  मेरी   कसम   का    उसे   एतवार    हो मुहब्बत    फ़िर     न     रुसवा1    सरे    बाजार   हो   आँख  उसकी जब भी तरसे, जल्वा-ए-दीदार2 को सामने     उसका    आजुर्दगी -ए- यार3   हो   छूट   न   जाए  हाथों  से  गरेबां  बहार  का मुहब्बते  इंतजार Read More …

तब और अब—विश्वनाथ शिरढोणकर

// तब और अब // ——————————- पल पल की खबर वों देते थे जमाने को हर खबर उन्हे अब बेगानों से मिलती हैं !! हवा का रुख बदला नसीब बदल गया पत्थर पे लिखी दास्तां आसुओं से भीगती हैं !! Read More …

कहते हैं मेरे दोस्त, मेरा सूरते हाल देखकर

कहते      हैं     मेरे     दोस्त,   मेरा    सूरते   हाल    देखकर कर  ले  न  ख़ुदा तुझको  याद ,तू  ख़ुदा  को  याद  कर   आदमी  खाक  का  ढ़ेर है, वादे-फ़ना1 कुछ भी नहीं मौत  का  सजदा2 हो, मौत से न कोई फ़रियाद कर   Read More …