चमन में रहकर भी,बहार से दूर रहे हम–डॉ. श्रीमती तारा सिंह

चमन  में  रहकर  भी, बहार  से  दूर  रहे  हम उश्शाक1पा रहे जुर्म की सजा,सोच मगरूर2रहे हम मेरी  जिल्लत  ही, मेरी  शराफ़त  की  दलील है मेरे   खुदा,  इस  गफ़लत  में  जरूर  रहे  हम शिकवा  उसकी  ज़फ़ा3 का हमसे हो न सका, Read More …

खुदा करे,मेरी कसम का उसे एतवार हो–डॉ. श्रीमती तारा सिंह

खुदा   करे,  मेरी   कसम   का    उसे   एतवार    हो मुहब्बत    फ़िर     न     रुसवा1    सरे    बाजार   हो आँख  उसकी जब भी तरसे, जल्वा-ए-दीदार2 को सामने     उसका    आजुर्दगी -ए- यार3   हो छूट   न   जाए  हाथों  से  गरेबां  बहार  का मुहब्बते  इंतजार  का  चढ़ा Read More …

कोई तो दर्द-मंद,दिले-नासबूर बनकर–डॉ. श्रीमती तारा सिंह

कोई तो दर्द – मंद1, दिले – नासबूर2 बनकर मेरे साथ था, जो मैं अब तक मरा नहीं मगर मुझमें वह हौसला-ए-तर्के-वफा3 रहा नहीं जो बताऊँ, क्यों यह चिरागे-सहर4 बुझा नहीं मैं नहीं चाहता,किसी निगाहे-शौक5को रुसवा करूँ गुलशन – परस्त Read More …

खुदा करे,मेरी कसम का उसे एतवार हो–डॉ. श्रीमती तारा सिंह

खुदा   करे,  मेरी   कसम   का    उसे   एतवार    हो मुहब्बत    फ़िर     न     रुसवा1    सरे    बाजार   हो आँख  उसकी जब भी तरसे, जल्वा-ए-दीदार2 को सामने     उसका    आजुर्दगी -ए- यार3   हो छूट   न   जाए  हाथों  से  गरेबां  बहार  का मुहब्बते  इंतजार  का  चढ़ा Read More …

कैसे कहूँ किस्मत,शबाब1 को क्यों ले आई—डॉ. श्रीमती तारा सिंह

कैसे कहूँ किस्मत,शबाब1 को क्यों ले आई आसमां से उतारकर बागे जहाँ की सैर पर मेरे  होते खाक-पे नक्शे -पा2 क्यों हो तेरा मैं कब से बैठा हूँ, पलकें बिछाये जमीं पर रुतबे में,मैं मेहर-ओ-माह3 से कम नहीं,फ़िर क्यों रखती Read More …

जिंदगी के सफ़र पे हम साथ चले थे–डॉ. श्रीमती तारा सिंह

जिंदगी  के  सफ़र  पे   हम  साथ  चले थे चलते  –  चलते   तुम   कहाँ    खो  गये अभी  तो  दास्तां- ए- जिंदगी  सुनाना बाकी ही था कि  तुम  सुनते –  सुनते   सो  गये अब  कौन  बचायेगा  मौज की तुफ़ां से मुझे नसीबा Read More …

जहाँ जिंदगी ज़ामे हलाल पीकर अमर हो

जहाँ    जिंदगी   ज़ामे  हलाल  पीकर  अमर  हो जाती   है , मैं    वहाँ   जाकर  रहना  चाहता  हूँ नींद   आ   जाये , मेरी  तकदीर  को,  मैं तदवीर  के  दीये, बुझाये  रखना चाहता  हूँ मुझे  गुमराही  का नहीं कोई खौफ़, मैं वक्त के  Read More …

आओ ! हम एक दूजे से लगकर बैठें–डॉ. श्रीमती तारा सिंह

आओ !  हम   एक   दूजे   से  लगकर  बैठें जिंदगी  की  ढ़हती  दीवार  को  पकड़कर बैठें दम   लिया   था   कयामत  ने  कभी  जहाँ उस   वक्ते-सफ़र    को   संवार  कर   देखें रिजवा1  से  हमारी  लड़ाई  नहीं, क्यों न हम उससे  खुल्द2   के  घर Read More …

खुदा तेरी बागे-जहाँ में बहती यह कैसी हवा है–डॉ. श्रीमती तारा सिंह

खुदा  तेरी  बागे-जहाँ1 में  बहती यह कैसी  हवा  है इसमें    न    तेरी  दुआ,  न   कोई   दवा   है तपे-हिज्रा2 की  गर्मी में झुलसता है प्राण- पक्षी कोई गुल ऐसा  नहीं, जो अपने पहलू में खार3नहीं रखा है इन्सां  तेरे  एक इशारे Read More …

कहते हैं मेरे दोस्त,मेरा सूरते हाल देखकर–डॉ. श्रीमती तारा सिंह

कहते      हैं     मेरे     दोस्त,   मेरा    सूरते   हाल    देखकर कर  ले  न  ख़ुदा तुझको  याद ,तू  ख़ुदा  को  याद  कर आदमी  खाक  का  ढ़ेर है, वादे-फ़ना1 कुछ भी नहीं मौत  का  सजदा2 हो, मौत से न कोई फ़रियाद कर तेरी  सूरत Read More …