किस्मत—डॉ. श्रीमती तारा सिंह

   ओ चित्रकार ! अपने कोरे कागज पर रंग-  विरंगे,   रंगों   से   सँवारकर                                                                                     तू   रेखाओं  में  मुझे  मत  उतार मैंने देखा है,धूमिल छायाओं में निठुर किस्मत  को, कैसे भाँवरी  दे- देकर मनुज  को  नचाती  विविध  प्रकार कभी   बाल – विहग Read More …

तारों में रहती मेघों की प्यास–डॉ. श्रीमती तारा सिंह

तारों  में  रहती मेघों की प्यास निज साँस की गर्म उसास से, पिघल- पिघलकर मिटता जा रहा मानव तन सोचता , अग्निपथ   के  उस  पार स्वर्ण   मृगों  का  है  गंध  विहार मगर इस  पार, तारों  में  छिपकर रहती, अतृप्त   मेघों  Read More …

चाहती हूँ,मैं भी अमर हो जाऊँ–डॉ. श्रीमती तारा सिंह

चाहती हूँ ,मैं  भी   अमर  हो   जाऊँ चाहती  तो  मैं  भी  हूँ, अमावस  की अमर  गोद  में डूबकर, अमर हो जाऊँ अंगारे  को  गूँथकर  गले   में  पहनूँ अणु-अणु में संचित कर वेदना का गान युग-युग  की तुम्हारी पहचान बन जाऊँ Read More …

भगवान ! तुम क्यों हो महान–डॉ. श्रीमती तारा सिंह

भगवान ! तुम इसलिए नहीं हो महान कि  तुम धरा मनुज के ज्वलित हृदय भूमि   में ,शाश्वत  ज्योतिवाह  बन जीवन  तम को स्वर्णिम कर नहलाते पीड़ा  को  अश्रु   का  भाव  बनाकर हृदय  से  निकाल,मन को करते शांत बल्कि भगवान,तुम इसलिए Read More …

धरा सुख में क्या रखा है —- डा० श्रीमती तारा सिंह,नवी मुम्बई

धरा  सुख   में   क्या   रखा   है                               —- डा० श्रीमती तारा सिंह,नवी मुम्बई मैंने  कब  चाहा  था, चंदन सुरभि सी लिपटी  प्राणों  की पीड़ा को समेटे तुम निस्सीमता  की  मूकता  में खो जाओ और  मैं  यहाँ, अवनि  सम देह तपाऊँ Read More …

नारी जीती विवश लाचार– ——- डा० श्रीमती तारा सिंह

              नारी  जीती  विवश लाचार                       ——- डा० श्रीमती तारा सिंह शून्य  से निकली वृतहीन कली को देख धरती  से आकाश तक,नर ने खींची रेख कहा, यह  पुष्प  नहीं है श्रद्धा का सुमन यह  तो  है  पुरुष  चरणों  का  उपहार Read More …

क्यों मनाते हैं होली और कैसे –शशांक मिश्र भारती

शशांक मिश्र भारती            भारत त्यौहारों का देश हैं यहां पर जितने त्यौहार सालों भर मनाये जाते हैं।विश्व में शायद ही कोई देश होगा।उसमें भी हिन्दुओं का तो हर दिन ही कोई न कोई त्यौहार रहता है।हिन्दुओं के चार प्रमुख Read More …

चमन में रहकर भी,बहार से दूर रहे हम–डॉ. श्रीमती तारा सिंह

चमन  में  रहकर  भी, बहार  से  दूर  रहे  हम उश्शाक1पा रहे जुर्म की सजा,सोच मगरूर2रहे हम मेरी  जिल्लत  ही, मेरी  शराफ़त  की  दलील है मेरे   खुदा,  इस  गफ़लत  में  जरूर  रहे  हम शिकवा  उसकी  ज़फ़ा3 का हमसे हो न सका, Read More …

खुदा करे,मेरी कसम का उसे एतवार हो–डॉ. श्रीमती तारा सिंह

खुदा   करे,  मेरी   कसम   का    उसे   एतवार    हो मुहब्बत    फ़िर     न     रुसवा1    सरे    बाजार   हो आँख  उसकी जब भी तरसे, जल्वा-ए-दीदार2 को सामने     उसका    आजुर्दगी -ए- यार3   हो छूट   न   जाए  हाथों  से  गरेबां  बहार  का मुहब्बते  इंतजार  का  चढ़ा Read More …

कोई तो दर्द-मंद,दिले-नासबूर बनकर–डॉ. श्रीमती तारा सिंह

कोई तो दर्द – मंद1, दिले – नासबूर2 बनकर मेरे साथ था, जो मैं अब तक मरा नहीं मगर मुझमें वह हौसला-ए-तर्के-वफा3 रहा नहीं जो बताऊँ, क्यों यह चिरागे-सहर4 बुझा नहीं मैं नहीं चाहता,किसी निगाहे-शौक5को रुसवा करूँ गुलशन – परस्त Read More …