“पुण्य की कमाई मे”–मोहन श्रीवास्तव

Mohan Srivastava Poet11 दिसंबर 2013 · संपादित ·  “पुण्य की कमाई मे”

कोई कैसे जी पाए,
इस घुटन भरी मंहगाई मे !
जो चाहे वो ना मिल पाए,
इस पुण्य कि देखो कमाई मे !!

हर एक चीज मे आग लगी है ,
चाहे राशन-तेल व गोभी हो !
फ़ल व दूध की बात ही क्या,
ये मिले तभी जब कोई रोगी हो !!

देशी घी के जगह अब,
बनस्पति घी से काम है चल जाता !
शरबत की जगह देखो अब,
चाय से काम है निकल जाता !!

पगार मिलने के पहले ही,
लम्बी लीस्ट बनी रहती !
मकान किराया व अनेको बिल से ,
लीस्ट हमेशा सजी रहती !!

पैसे खतम हो जाते है मगर,
फ़र्माईस खत्म नही होते !
इस कमर तोड़ मंहगाई मे ,
लोगों के दिल रोते रहते !!

सच्चाई पे चलने वालों का,
बुरा हाल है हो जाता !
पर बेईमानी के पैसों से ,
हर चीज सुलभ है हो जाता !!

पर हर पाप का अंत बुरा होता है,
और इसमें फूलों से कांटे उगते हैं ।
सत्य तो सत्य होता है मित्रों,
जहां कांटो से भी फूल ही खिलते हैं ॥
सत्य तो सत्य होता है मित्रों,
जहां कांटो से भी फूल ही खिलते हैं……

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
http://kavyapushpanjali.blogspot.in/2013/12/blog-post_10.html

मोहन श्रीवास्तव

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