हमने न महल रक्खे, हमने न किले रक्खे— ठाकुर दास ‘सिद्ध’

Thakurdas Siddh

1 दिसंबर को 11:58 अपराह्न बजे ·

हमने न महल रक्खे, हमने न किले रक्खे।
खुशियों की तरह हमने, जो दर्द मिले, रक्खे।
***
आया जो सितमगर तो, सर तुम ने झुकाया है,
ये बात नहीं अच्छी, तुम होंठ सिले रक्खे।
***
देखा न कहीं ऐसा, जैसा है हुनर उसका,
थैले में बड़ा है कुछ, जेबों में जिले रक्खे।
***
पैगाम मिला दिल को, आना है सनम तुम को,
कुछ काँटे हटाए हैं, कुछ फूल खिले रक्खे।
***
जो बात रही दिल में, सो ‘सिद्ध’ सुना दी है,
कुछ तुम भी सुना देते, जो शिकवे-गिले रक्खे।
***
– ठाकुर दास ‘सिद्ध’

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Facebook
Twitter
LinkedIn
INSTAGRAM