शिव वरदान से शूर्पणखा त्रेता में उद्धार–

शिव वरदान से शूर्पणखा त्रेता में उद्धार- -सुखमंगल सिंह

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Sukhmangal Singh 9:44 AM (8 hours ago)


शिव वरदान से शूर्पणखा त्रेता में उद्धार

सज धज के लखन पास
जब जा पहुची लंकिनी
प्रणव -प्रयास लिए मन में
पुलकित उमगत डंकिनी |

अस संयोग कहा जा सकता
भक्तिरूपा -वैरागी को छोड़
सीधे पहुंची ब्रह्म के पास
अहंकार में केवल विनाश |

इच्छा पूरी हो जाएगी
ऐसी की कामना सुंदरी
प्रणव -प्रसंग धारि मन हिय
प्रीतम कहहु खुश डंकिनी !

रूप की मलिका बन कर आयी
राम रूप को सिय छवि दिखायी
ब्यर्थ मनहिं मन गाल बजायी
उपमा सकल वरनि नहीं जायी |

फिर प्रणव प्रस्ताव लखन से कींन
तब शेषावतार ने उसे उत्तर दीन
हो यद्यपि अति सुन्दर -सुकुमारि
और देखन में एक पूरी तू नारि !

है तेरा रूप -भेष वैभव भी नीक
औ चंचल चितवन सुभग शरीर
लेकिन मैं तो हूँ उनकर दासा
सुंदरी सुनो तुम प्रेम पिपासा |

पूरी होती मेरी उनसे आशा
प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा
पराधीन मैं सेवक,नहिं राजा
करिहैं वही सब कुछ काजा |

जीवन साथी गर तुम्हें बनाया
सुख-संपत्ति ,नहीं अपनाया
प्रभु समक्ष जा सुकुमारी
वही समर्थ हैं राज कुमारी !

सेवक सुख चाहे मानो भिखारी
व्यसनी धन केवल व्यभिचारी
लोभीयों को चढ़ जात गुमान
अम्बर से दूध जस चाहे प्राणी |

सुख सेवक की इच्छा नाहीं
पूरी होती ना यहीं कहानी
सेवक की बस एक ही इच्छा
मालिक की सेवा औ भिक्षा |

भिखारी सोचे समाज से सम्मान
समझ लो उसमें भरा हुआ गुमान
सदा समाज धिक्कारता उसे जान
उठाना पड़ता है उसको अपमान |

व्यसनी इच्छा कभी पूरी नही होती
नशा की आदत सर्वदा अधूरी होती
कुबेर का खजाना भी खाली हो जाता
नशातल में अपना सब कुछ लुटाता |

शास्त्र भी व्यभिचार को पाप ही माना
सद्गति से ब्रह्मचारी को ऊपर जाना
जो पुरुष अवैध सम्बन्ध को बनाते
अंत भी बुरा उसको अपना अपनाते |

जब उसकी गुप्त बातें समाज में आती
भयंकर पीड़ाओं से तब वह घबराता
जो अपनी पत्नी -प्रति वफादारी निभाता
उसी का सुखमय जीवन जग में हो पाता|

लालची की लालसा धन की होती
पूरी उसकी यश-इक्षा नहीं होती
घर -परिवार-मित्रों से दूर रहता
धन की कामना लिये, वह बहता |

पूर्ति में अहित की करता कामना
सदा यश से दूर की करता साधना
यश-मान का भान स्वप्न सा मान
लोभी का तो इतना जरूर जानना |

उसमें दूसरों को तुच्छ समझना
घमंड की ही होती उसमे धारणा
जो दूसरों को कुछ नहीं जानते
वह स्वयं को ही श्रेष्ठ हैं मानते-

काम-मोक्ष,धर्म-अर्थ -फल पाना
ऐसे लोगों की धारणा बढ़ी
शास्त्र ऐसे को घमंडी है कहता
नाश-विनाश उसके सर चढ़ा |

रावण और कंस भी थे अभिमानी
विनाश हो गया ,राज-पाट-राजधानी
जब लखन ने यह बचन उसे सुनाया
पुनि राम से प्रणव प्रस्ताव को धाई|

नीति-रीति सुन, लखन लाल की
शूर्पनखा ने पुनि किया विचार
त्याग कर अपने चाव- भाव को
पहुची प्रभु श्री राम से करने बात |

फिर वैसा ही प्रणव -प्रस्ताव प्रसंग
राम जी को अपने मन की सुनायी
उसकी भाषा और भाव समझ कर
प्रभु ने शादी सुदा, खुद को समझाये

यह सब कहकर भगवान राम ने
जब वापस उसको भेजना चाहा
बात बनती नहीं देखा तो वह
राक्षसी का अपना वही रूप बनाया |

बड़ा भयंकर रूप बनाकर शूर्पणखा
जगत जननी जानकी को डसने धाई
सहनशील प्रभु राम नीति – रीति ने
असत्य की, नाक-कान को कटवाई |

पूर्व जन्म में वही शूर्पणखा
नयनतारा थी इंद्र लोक की
जस उर्वसी -रम्भा – मेनका
वही मान सम्मान उसकी |

इंद्र से सभा मध्य मार नयन
प्रेयसी उनकी बनी सुजान
तापसी वज्रा का तप भंग करने
उसे भेजे भूलोक इंद्र ,उस धाम |

ऋषि का तप भंग किया पर
वज्रा ने शापित उसे किया
घबराकर नयना ऋषिपद पे
सर अपना झट पटक दिया

क्षमा – याचना के बल से
ऋषि ने उसे वरद दिया
राक्षस जन्म में ही उसको
प्रभु दर्शन सौभागत मिला |

प्रभु का दर्शन पाकर मैं तो
उनको पा लूँगी ,ऐसी ठानी
उसने नयना वाली रूप बनाकर
राम -लखन के पास जो जानी |

अहंकार में ही राम को साधी
तुम सम कोई पुरुष न, बोली
मुझ सम न दूजी नारि ,अकेली
प्रणव -प्रसंग, ब्रह्म से नवेली |

नीक दीन्ह हरि तुमही रूपा
सुन्दर सुकुमार तोहि स्वरूपा
मुझ पर कृपा करिये स्वामी
पूजब मोहि ईश्वर सम जानी |

अंग अनंग छवि श्यामल किशोर
बट वन वनिता रचि सेज विभोर
मनभावन वफादारी वरासत मोर
भावन आवन प्रीती बतावन चितचोर |

प्रेम प्रसंग बात से तप्ती चित्त जननी
उदास मुख मन ही मन सुमुखि सूखती
काज वृथा इनको सजनी हरि हिय कहनी
बालम की लखि नैन विचारै जगत जननी |

मोहिं रूप गर्विता स्वरूपवती
तन रंग रस रंग नूतन प्रकटै
ढीली परती हौ घाघरि मोरी
यौवन आँगन अंग संग बहोरी|

लखत नष्ट संकेत लखन ने
बात घात सुनि भेद भेष देखि
कुपित लक्ष्मण किये विचार
देखन में भोली पर अत्याचारी |

नाक-कान जब लखन ने काटा
मिला ज्ञान और बढ़ा पिपासा
प्रभु प्राप्ति की लेकर मन आशा
पुष्कर जी में खड़े ‘शिव’ साधा |

जब वर्षों बीत गया तप को
भगवान शिव दर्शन देने आये
दर्शन पा धन्य हुयी शूर्पणखा
शिव शंकर से तब वह वर पायी |

द्वापर में राम का कृष्णावतार होगा
कुब्जा, पत्नी रूप सुख निखार होगा
कूबड़ पर जब क्रीं का पाँव होगा तो
नयनतारा मनमोहक तेरा रूप मिलेगा |
-सुखमंगल सिंह ,अवध निवासी
शब्दार्थ:- वनिता -प्रिया

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