‘हेल्दी टेबलेट’ हैं ‘लेख-अंजलि’ में अन्तर्निहित आलेख – –डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’

लेख अंजलि पुस्तक की समीक्षा।

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Praveen Kumar Fri, Nov 29, 9:41 PM (3 days ago)
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‘हेल्दी टेबलेट’ हैं ‘लेख-अंजलि’ में अन्तर्निहित आलेख – डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’_________________________________
लेखन किसी भी विधा में हो, या किसी भी रूप में हो किन्तु लेखन की सार्थकता तभी प्रमाणित होती है; जब लेखन समाज के हित में होता है। जब तक लेखन स्वान्त: सुखाय होता है और उसमें समाज की पीड़ा का प्रतिबिम्बन नहीं होता, तब तक वह लेखन तो हो सकता है किन्तु अपने लिखे होने की सार्थकता प्रमाणित नहीं कर सकता। जब लेखन हमें सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है, हमारे हित में खड़ा होता है तथा समस्याओं को इंगित करने के साथ-साथ समस्याओं के निदान तक पहुँचता है, तब वह सच्चा लेखन हो जाता है। इस दृष्टि से पेशे से चिकित्सक डॉ. प्रवीण कुमार श्रीवास्तव की सद्य: प्रकाशित पुस्तक लेख-अंजलि एक महत्वपूर्ण कार्य है। इंकक्विल्स पब्लिशिंग हाउस द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक चौबीस लघु लेखों का संग्रह है। प्रकाशित लेखों की संक्षिप्तता और प्रामाणिक तथ्यों का समावेश इस पुस्तक की विशिष्टता है। ये लेख जहाँ एक ओर जीवन के उद्देश्य और संस्कारों के प्रति जागरूकता पैदा करते हैं, वहीं दूसरी ओर चिकत्सकीय जानकारियाँ भी प्रदान करते है। हम यह भी कह सकते हैं कि उन्होंने लेखकीय कर्तव्य के साथ-साथ अपने चिकित्सकीय उत्तरदायित्व का भी पूर्ण निर्वाहन इस पुस्तक के माध्यम से किया है। 
पुस्तक का प्रथम आलेख ‘चिकित्सा और छन्द’ इस पुस्तक का एक महत्वपूर्ण और अति रुचिकर आलेख है। यहाँ पर लेखक ने छन्द को उपचार यानी सीधे-सीधे स्वास्थ्य सुधार से जोड़ दिया है। उनके अनुसार छन्द चिकित्सा एक प्रकार की कलात्मक अभिव्यक्ति है, जिसके द्वारा यह कल्पना की जाती है कि व्यक्ति का स्वास्थ्य सुधार हो सकता है, या तो कल्पना से या संगीत की विभिन्न अभिव्यक्ति से।” इसके अन्तर्गत उन्होंने छन्दों के माध्यम से हृदय रोग अनिद्रा, एसिडिटी, कमज़ोरी, याद्दाश्त, रक्तचाप तथा सिर दर्द आदि अनेक रोगों के उपचार बताये हैं। इससे सम्बन्धित सब कुछ समझने के लिए पुस्तक का यह आलेख पढ़ना ही पड़ेगा। यहाँ उदाहरण के रूप में एक अंश प्रस्तुत हैं- “हृदय रोग के लिए राग दरबारी एवं राग सारंग से समबन्धित गीत सुनाना लाभदायक हैं। तोरा मन दर्पण कहलाये (काजल) और राधिके तूने बंसरी चुरायी (बेटी-बेटा), वहीं अनिद्रा के लिए राग भैरवी एवं राग मोहिनी सुनना लाभकारी है- रात भर उनकी याद आती रही (गमन) तू गंगा की मौज मैं यमुना (बैजू बावरा) आदि।” 
समाज को दिशा देना और सचेत करना लेखकीय कर्तव्य का प्रथम सोपान है। ‘जीवन एक रंगमंच’ लेख के माध्यम से डॉ. श्रीवास्तव जी आज की शिक्षा व्यवस्था पर गहरा तंज़ कसते हैं- “बालपन खोकर प्रकाश पुंज के समक्ष बैठकर हमारे नौनिहालों को पाठ रटते देख सकते हैं। लेख शब्दश: कंठस्थ करना है, समझ में आये या न आये। परिणाम ‘आगे पाठ पीछे सपाट’।” इस क्रम में वह अभिभावकों को भी उनके उत्तरदायित्व के प्रति सचेत करते हैं- “पूरा वर्ष व्यतीत होने को आया, परन्तु माता-पिता अपने पुत्र की रुचि से अनभिज्ञ हैं। एक अच्छे माँ-बाप का फ़र्ज़ निभाते-निभाते माता-पिता खलनायक की भूमिका में आ जाते हैं। अन्त में निराशा में सब कुछ सूत्रधार के भरोसे छोड़ देते हैं।” (पृष्ठ- 14)
आगे के आलेखों में ‘प्रकृति से दूरी’, ‘संवैधानिक दायित्व एवं सामाजिक विषमता का आग्रह’ तथा ‘परतन्त्रता की विरासत स्वतन्त्रता के परिप्रेक्ष्य में’ अलग-अलग नींव पर खड़े हैं, किन्तु उद्देश्य की दृष्टि से अपने मौलिक आग्रह से इतर नहीं हैं। अन्य लेखों की भाँति लेखक यहाँ भी शिक्षक के रूप में उपस्थित है और सच यह है कि लेखक का दायित्व भी शिक्षक से इतर नहीं होता- “प्रकृति के असंतुलन के लिए, हमारी सामाजिक व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था, दैनिक दिनचर्या और सुख की तलाश में कृत्रिम संसाधनों पर निर्भरता हमें ग्रामीण परिवेश से दूर ले जा रही है। यह परिदृश्य हमें बताता है कि समय रहते हमें चेतना होगा, वैश्विक स्तर और राष्ट्रीय स्तर पर भी इसकी पहल में भाग लेना होगा इस पहल के लिए हमें शिखर से जड़ तक पहुँचना होगा।” (पृष्ठ- 18, 19)
एक अन्य लेख में श्रीवास्तव जी ने देश की अस्मिता और राष्ट्रवाद के चिन्तन के आलोक में प्रभावी विश्लेषण किया है। वास्तव में राष्ट्रवाद की अवधारणा जन-गण-मन की चेतना, संकल्प, अस्मिता तथा स्वाभिमान के लिए महत्वपूर्ण भी है और आवश्यक भी। यहाँ लेखक राष्ट्रवाद को सामाजिक संचेतना से जोड़कर व्यापक रूप दे रहे हैं। उनका कहना है कि “मेरे विचार से सामाजिक मूल्यों, सामाजिक दायित्वों, संवैधानिक अधिकारों के प्रयोग की नैतिक जिम्मेदारी देशभक्ति एवं मातृभूमि के प्रति समर्पण ही राष्ट्रवाद है।” (पृष्ठ- 46)नारी सशक्तीकरण एवं कुम्भ मेला पर आधारित आलेख भी पठनीय हैं।
मैंने उन पर भी लिखा है कि उन्होंने लेखकीय कर्तव्य के साथ-साथ अपने चिकित्सकीय उत्तरदायित्व का भी पूर्ण निर्वाहन इस पुस्तक के माध्यम से किया है और इसके प्रमाण देते हैं पुस्तक में सम्मिलित उत्तरार्ध के आलेख। वास्तव में इन लेखों को पुस्तक को द्वितीय खण्ड कहा जा सकता है। एक दृष्टि इन लेखों के शीर्षक पर डालते हैं- ‘हाइपोथाइरोडिस्म : रोकथाम एवं उपाय’, ‘मधुमेह : रोकथाम एवं उपाय’, ‘सर्पदंश से बचाव एवं रोकथाम’, ‘एड्स से ज्ञान बचाये जान’, ‘रक्तदान कर जीवन का उपहार दें’, ‘तम्बाकू मुक्त जीवन की शुरुआत करें’, ‘उच्च रक्तचाप : लक्षण और निदान’, ‘वही मृदु व्यवहार चिकित्सक से करो जो चिकित्सक से चाहते हो’। इन लेखों के शीर्षक ही स्पष्ट कर देते हैं कि इनमें क्या सामग्री लेखक ने दी होगी। वास्तव में ये लेख मानव जीवन के लिए बेहद उपयोगी एवं महत्वपूर्ण हैं। इन लेखों में लेखक अपने चिकित्सक रूप में साक्षात् साकार हो जाता है। प्रामाणिक तथ्यों का समावेश, विश्लेषण तथा चिन्तन इन लेखों की विशिष्टता है। 
लेख-अंजलि के रूप में सीतापुर नगर के वरिष्ठ चिकित्सक/लेखक डॉ. प्रवीण कुमार श्रीवास्तव जी ने आमजन को एक महत्वपूर्ण पुस्तक सौंपी है। यह सभी के लिए पठनीय, मननीय तथा समान रूप से उपयोगी है। यदि यह कहा जाये कि पुस्तक में अन्तर्निहित आलेख स्वयं में ‘हेल्दी टेबलेट’ हैं, जिनका सेवन सभी के लिए समान रूप से उपयोगी है; तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। एक शानदार कृति के लिए डॉ. श्रीवास्तव जी को असीम बधाई एवं शुभकामनाएँ।
– डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर'(अध्यक्ष- अन्वेषी संस्था)24/18, राधा नगरफतेहपुर (उ. प्र.)- 212601मो.- 9839942005
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