मित्रता—- डॉ. श्रीमती तारा सिंह

मित्रता—- डॉ. श्रीमती तारा सिंह

              जिस प्रकार हम अपने माँ-बाप और गुरु को उसी रूप में ग्रहण करते हैं,जिस रूप में वे होते हैं । मेरे कहने का अर्थ, हम इन्हें, इनका रूप-रंग या धन देखकर नहीं अपनाते । उसी तरह दोस्ती के लिए, उसका  पारिवारिक ब्योरा  हमें नहीं देखना चाहिये ; लेकिन हाँ, दोस्त बनाने के पहले, दोस्त का संस्कारी होना आवश्यक है । यह देख लेना अत्यावश्यक है, क्योंकि अच्छे मित्र की संगति में मनुष्य अच्छा बनता है, और बुरे की संगति में बुरा । जो सच्चा मित्र होता है , वह बुरे काम को करने से अपने मित्र को रोकता है , लेकिन दोस्ती में एक बात का ध्यान रखना हमें परमावश्यक होता है, वह है अपना विचार , जिसे मित्र पर नहीं थोपना चाहिये अन्यथा दोस्ती दीर्घायु नहीं होगी । न ही इसके पालन की आशा रखनी चाहिये, कारण सबों का आदर्श कभी एक जैसा नहीं होता । यह तो व्यक्ति-व्यक्ति पर निर्भर करता है । एक व्यक्ति सदा ही दूसरे से भिन्न होता है, बावजूद हम जिस आदमी को कभी नहीं देखे, उनके एक मित्र से मिलकर , बाकी मित्रों के विचारों, प्रवृतियों तथा आदतों का अनुमान कर सकते हैं । हम यह अनुमान लगा सकते हैं कि उसमें कितनी मनुष्यता है, कितना पौरुष और कितना साहस है ? हम यह भी बतला सकते हैं, वह कितना विश्वस्त या अविश्वस्त है ?

           अब सवाल यह है कि सच्चे मित्र की पहचान  कैसे हो, जिससे जिंदगी भर दोस्ती हमारी साँसें बनकर हमारे साथ रहे ?  धर्म –शास्त्रों में सच्चे मित्र के कुछ खास गुण बताये गये हैं ; ———

  •  मित्र का प्रेम ऐसा हो. जो मित्रता के बदले कुछ न चाहे ,
  •  मित्र सहयोग और जरूरत को पूरा करने के लिए, अपने लाभ-हानि की परवाह न करे,
  •  मित्र का व्यवहारिक और वैचारिक नजरिये से परिपक्व और कुशल होना जरूरी है ,
  •  मित्र के व्यवहार में सच्चाई हो, न कि केवल सच बोलने वाला हो,
  •  दुख और सुख , दोनों स्थितियों में समान रूप से खड़ा रहे,
  •  कथनी और करनी में अंतर न हो,
  •  संकट के समय माँ, पिता, भाई और गुरु बनकर रक्षा करे,कारण मित्रता का हमारे जीवन में बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है । यह हमारे जीवन को सुचारू रूप से चलने में सहायता करता है । इसलिए मित्र का सच्चा, स्वार्थहीन, गुणी और संस्कारी होना बहुत जरूरी है ।

जब भी, जहाँ भी, मित्रता की बात चलती है, कृष्ण और सुदामा की मित्रता की चर्चा किये बगैर पूरी नहीं होती । कृष्ण  राजा थे और सुदामा रंक ; लेकिन दोनों की दोस्ती,फ़ूल और सुगंध जैसी थी । दोनों एक दूसरे के पूरक थे, कुछ इस तरह कि एक के बिना दूसरे का कोई बजूद ही नहीं हो ।

            दूसरों को, अनजान ,अपरिचितों को अपने दिल के करीब लाने वाली यह मित्रता शब्द , एक अचूक वशीकरण मंत्र है ; सम्पूर्ण मानवीय संबंधों का व्याख्या-सूत्र है । इसलिए जो सच्चे मित्र होते हैं, वे अपने मित्र की कृति और मित्र के हितों की रक्षा के लिए, अपना प्राण तक हथेली पर लेकर तैयार रहते हैं । क्षणिक और स्वार्थ पर टिकी मित्रता मात्र एक पहचान के सिवा और कुछ नहीं हो सकती । ऐसे मित्र कभी-कभी बड़े खतरनाक भी हो जाते हैं ; ऐसे ही मित्र के लिए एक विचारक ने लिखा है,’ पहले हम कहा करते थे, ’भगवान ! हमें दुश्मनों से बचाओ ’, अब कहना पड़ता है,’ भगवान !  ऐसे दोस्तों से बचाना “ । आचार्य श्री तुलसी ने इसके लिए सात सुत्रों का निर्देश दिया है :– — मित्रता के लिए चाहिये, विश्वास, व्यवहार कुशलता,

स्वार्थ-त्याग, सहिष्णुता, क्षमा, अभय, समन्वय । यह सप्तपदी साधना, जीवन की सार्थकता और सफ़लता की पृष्ठभूमि है ।

               एक विचारक ने कहा है,’ सच्चा मित्र का प्यार , कंजूस और उसके धन जैसा होता है । जैसे कंजूस धन को, प्राणों से लपेटकर रखता है; मित्र को भी चाहिये, इसी तरह एक–दूसरे को प्राणों से बाँधकर रखना ।’ मित्रता करने के पहले जितना सोचना चाहते है, सोच लीजिये ; मगर मित्रता के बाद मित्र पर संदेह करना या ईर्ष्या पालना उचित नहीं ; क्योंकि मित्रता का अर्थ होता है, दिल के करीब होना’, और जो दिल के करीब होते हैं, वे जान से भी अजीज होते हैं ।’ इसलिए अपने अजीज पर संदेह करना, एक अपराध ही नहीं, अन्याय भी होगा । सच्चे मित्र उसे ही प्राप्त होते हैं, जो उदार , उ्दात्त और विशाल हृदय वाले तथा बलिदानी होते हैं । धन-दौलत के मदान्ध लोगों के पास सहायक स्वरूप दोस्त तो बहुत रहते हैं, मगर सच्चे दोस्त नहीं रहते ; क्योंकि धन के पीछे भागने वाले लोग, मित्रों की कोमल भावनाओं का ख्याल नहीं रखते । कारण वे मित्रता का व्यवसायीकरण करने लगते हैं । वे अपनी योग्यता, कार्यशक्ति तथा समय का अधिक मूल्य आँकने लगते हैं । परिणाम यह होता है, धन ही उनका उपास्यदेव बन जाता है ,और वे जीवन के अन्य मूल्यों से विमुख हो जाते हैं । इसलिए मित्रता में नि:स्वार्थ समर्पण की भावना जरूरी है ।

             मित्रता मानवीय रिश्तों का एक आदर्श एवं प्रायोगिक स्वरूप है । इस रिश्ते में द्वैतभाव नहीं रहता, इसलिए यहाँ अपने-पराये का भेद नहीं रहता , न ही स्पर्धा और न ही छोटे-बड़े की सीमा रेखा होती है । संत तुलसीदास जी ने रामचरित्र मानस में मित्र के विषय में बताया है —–

                 निज दुख गिरि सम, रज करि जाना

                 मित्र  का  दुख  रज  मेरु  समाना ॥

अर्थात जो सच्चा मित्र होता है, वह अपने पहाड़ समान दुख को रज-कण बराबर समझता है , और मित्र के छोटे से दुख को पर्वत समान समझता है । सुप्रसिद्ध लेखक डेल कार्नेगी ने लिखा है, ’ मेरी पूरी सम्पत्ति लेकर भी मुझे कोई एक सच्चा मित्र दे दे, तो मैं खुद को बड़ा भाग्यशाली समझूँगा । ’ अमेरिकी धन कुबेर हेनरी फ़ोर्ड ने लिखा है, ’ मेरे पास सभी सुविधाएँ मौजूद हैं, मगर मैं धन के नशे में एक भी सच्चा मित्र नहीं बना सका । मैं चाहता हूँ, कि ईश्वर के वरदान स्वरूप मुझे एक सच्चा मित्र मिल जाये, तो मेरे जीवन में थोड़ी बहुत जो रिक्तता बाकी है, वह भी भर जायगा ।’

                मगर दुख के साथ कहना पड़ता है, आजकल संसार में अधिकतर स्वार्थी मित्र ही मिलते हैं और स्वार्थ की तृप्ति होते ही मुँह मोड़ लेते हैं ; ज्यों फ़ल वाले वृक्ष की डाली पर बैठा पक्षी तब तक चहचहाता रहता है, जब तक उसे मीठे स्वादिष्ट फ़ल खाने मिलते रहते हैं । जैसे ही वृक्ष फ़लरहित होता है , वह दूसरे फ़लवृक्ष की ओर चल देता है । ऐसे मतलवी मित्र से तो अच्छा है बिना मित्र का रहना । एक कहावत है —–

                    ’’मिसरी  घोल झूठ की, ऐसे मित्र हजार

                   जहर पिलावे साँच की, वे विरले संसार ॥”

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