अयोध्या: सर्वोच्च न्यायालय का सर्वोच्च न्याय–हेमेन्द्र क्षीरसागर

hemendra kshirsagar 2:59 PM (3 hours ago)

   हेमेन्द्र क्षीरसागर 

(लेखक, पत्रकार व विचारक)
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अयोध्या: सर्वोच्च न्यायालय का सर्वोच्च न्याय

(हेमेन्द्र क्षीरसागर लेखक पत्रकार व विचारक)

आखिरकार! सर्वोच्च न्यायालय ने देश के सबसे ऐतिहासिक, मौलिक, महत्वपूर्ण, बड़े और प्राचीन अयोध्या विवाद का सर्वोच्च न्याय कर दिया। जो भारतीय न्यायपालिका के इतिहास और आमजन के मानस पटल में युगे-युगिन स्वर्ण अक्षरों में अमिट रहेगा। दिव्य न्याय में किसी की हार है ना जीत, फैसला है समुचित और सुरक्षित। या कहें ना हिंदू का, ना मुस्लमान का, ये फैसला है हिंदुस्तान का। जीता तो कानून जीता, न्याय  व्यवस्था जीती, संविधान जीता, इंसानियत जीती, देश जीता और हारा कोई भी नही। यही है सच्चा हिंदुस्तान। स्त्तुय देश ने इसे दिल से लगाया। चाहे वह पक्ष हो या विपक्ष सभी ने इंसाफ का मन से सम्मान किया। बेहतर शीर्ष अदालत ने देश की जीवंत लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति को रेखांकित करते हुए वतन की गंगा-जमुना तहजीब को और अधिक प्रगाढ़ किया है। जिसके के लिए देश का संविधान सदा वंदनीय और न्याय का मंदिर प्रार्थनीय रहेगा।

प्रत्युत, सरजमीं में अनादिकाल से प्रचलित पंच-परमेश्वर की न्याय पंरपरा को आगे बढ़ाते हुए उच्चतम न्यायालय के पंच न्यायमूर्तियों ने पंचनिष्ठा से अपने सर्व सम्मत फैसले में अयोध्या की विवादित ढांचे वाली 2.77 एकड़ जमीन राम लला विराजमान को देकर सरकार को मंदिर के लिए ट्रस्ट बनाने और मस्जिद के वास्ते पांच एकड़ जमीन उपयुक्त स्थान पर देने कहा। अदालत ने माना की सबूत है कि बाहरी स्थान पर हिन्दुओं का कब्जा था नाकि मुस्लिम का। लेकिन मुस्लिम अंदरूनी भाग में नमाज़ भी करते रहे। जबकि यात्रियों के विवरण से पता चलता है कि हिन्दू यहां पूजा करते थे। 1857 में रेलिंग लगने के बाद सुन्नी बोर्ड यह नहीं बता सका कि ये मस्जिद समर्पित थी। 16 दिसंबर 1949 को आखिरी नमाज की गई। विवरण को सावधानी से देखने की जरूरत है। वहीं गजट ने इसके सबूतों  की पुष्टि की है। अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट बोला की भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की रिपोर्ट में यह निष्कर्ष आया था कि यहां मंदिर था, इसके होने के सबूत हैं। भगवान राम का जन्म गुंबद के नीचे हुए था। प्रस्तुत, ऐतिहासिक तथ्य, प्रतिक, चिन्ह, और तर्क में प्रमाण मिले।

वस्तुत: श्री रामजन्मभूमि के मामले में सर्वोच्च न्यायालय का यह मत देश की जनभावना, विश्वास, आस्था एवं श्रद्धा से ऊपर न्यायप्रिय है। ना राम भक्ति, ना रहीम भक्ति बल्कि देश भक्ति से परिपूर्ण है। सालों तक चली लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद यह विधिसम्मत अंतिम निर्णय हुआ है। जिसकी बांट सभी देशवासी लंबे से जो हो रहे थे। जो अब जाकर मुकम्मल हुआ। दौरान, श्री रामजन्मभूमि से संबंधित सभी पहलुओं का बारीकी से विचार हुआ है। पक्षों के अपने-अपने दृष्टिकोण से रखे तर्कों का मूल्यांकन हुआ। मसले के समापन की दिशा में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुरूप परस्पर विवाद को समाप्त करने वाली पहल सरकार की ओर से अब जल्द होगी, ऐसा  विश्वास रखना होगा। अतीत की सभी बातों को भुलाकर हम सभी श्री रामजन्मभूमि पर भव्य मंदिर के निर्माण में साथ मिल-जुल कर हमें अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना चाहिए। अलावे नव मस्जिद के निर्माण में समर्पण भाव से सहयोग। कवायद हिंदू-मुस्लिम, सिख-ईसाई आपस में है भाई-भाई का बोध अनेकता में एकता भारत की विशेषता और अधिक परिलक्षित करेगा।

काबिले गौर, फैसले की खासियत यह रही कि सभी ने इसका इस्तकबाल छद्म-धर्मर्निपेक्ष को तोड़ते हुए किया है। एक पक्ष सुन्नी वक्फ बोर्ड ने भी सर्वोच्च अदालत के फैसले का स्वागत करते हुए आगे चुनौती नहीं देने की मंशा जाहिर की। और तो और दूसरे पक्ष ने भी रामादर्शों के मुताबिक इसका शालीनता, मर्यादित और सहिष्णुता से सजदा किया। इससे बढ़कर और क्या मिसाल इस देश में पेश की जा सकती है। जहां हर वर्ग खुले मन से अपने न्याय के मंदिर के आदेश को सर आंखों पर ले रहा है। येही सही अर्थों में अंखड हिंदुस्तान की पहचान है। ऐसा तो वाकई में भारत में ही मुकम्मल हो सकता है जहां शांति, अमन चैन, सौहार्द और सद्भाव के वास्ते सब सर्वस्व निछावर करने तैयार रहते हैं। जिससे आज सारे जग में हिंदुस्तान का माथा और गर्व से ऊंचा हो गया। इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय, देश की 130 करोड़ जनता, कानून व्यवस्था, सरकार और जुड़े हुए एक-एक परिश्रमियों का जितना भी शुक्रिया अदा किया जाए उतना ही कम होगा। बदौलत ही देश में राम-रहीम-रमजान और दीप-अली-बजरंगली साथ दिखाई पड़ते है। सत्यमेव जयते!

(हेमेन्द्र क्षीरसागर लेखक पत्रकार व विचारक)

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