तूने जो दिल पे लिखा है वो मिटाऊं कैसे–नासिर अख्तर इंदौरी

नाम – नासिर अख्तर इंदौरी

ग़ज़ल

तूने जो दिल पे लिखा है वो मिटाऊं कैसे?

आग सीने में लगी है तो बुझाऊं कैसे?

मैंने जुगनू से मेरे यार हुनर सीखा है,

अपने आँगन में चरागों को जलाऊं कैसे?

तू नयी जंग को आमादा नज़र आता है,

मैं गए दौर के ज़ख्मों को दबाऊं कैसे?

अब तो कोयल का चहकना भी बुरा लगता है,

तेरी आवाज़ के जादू को भुलाऊं कैसे?


मूल नाम – हेमंत मेहर

निवास – ११/२ संत कबीर नगर, मनोविकास केंद्र के पास, नानाखेड़ा, उज्जैन (म.प्र.) – ४५६०१०

कृति – नाला-ए-दिल (ग़ज़ल संग्रह) २००६

१५ से अधिक वर्षो से लेखन कार्य में सक्रिय, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में ग़ज़लें – नज़्मे प्रकाशित | पेशे से इंदौर के प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत. फ़िलहाल कहानी लेखन में सक्रीय |



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